अनंत ने
लिखा था हां इश्वर की बड़ी क्रिपा हे मुजपर...
तभी तो हूं में सुन्दर....
और कोई असुंदर हे तभी तो सुन्दर की पहेचान होती हे ..
लेकिन मेरा भीतर सायद उतना सुन्दर नहीं जितना में हु /दीखता हु ..
में भली भाति जानता और मानता हु की केवल बहारकी सुंदरता सुख नहीं देती ...
लेकिन भीतरकी सुंदरता भी भीतर उतर कर ही जानी जाती है...
फिर इस बात पे लोग बहोत सारी बहेस करेंगे ...
कई ऐसी मिसाले देंगे जिसमे सिर्फ भीतर की सुन्दरता का महिमा हो ...
लोग बहेस करते थे. करते है, और करते ही रहेंगे ...
में किसीको ऐसा करने से रोक नहीं शकता ....
लेकिन में वो आखरी सच कहेता हु जो कोई चाहकर भी नकार नहीं शकता ...
कोशिश होगी बहोत कोशिश होगी इस सच को नकार ने की ...
आखिर वो नाकाम रहेंगे ...
युगो से होती रही हे लड़ाई ....
एक राज्य पर दुसरे राज्य की चडाई ...
और लड़ाई की वजे जब खोजी तो हर लड़ाई में ...
किसी सुन्दर औरत को पानेकी ख्वाहिस नजर आई ...
और भी वजे थी ! वजे और भी होंगी ...
लेकिन ये वजे भी मूल में छिपी हुई देखि पाई गई हे ...
सच को कभी भी जूठी फिलोसोफी से दबाया या छिपाया नहीं जा शकता...
और ये सच हे की इस जहा में हर कोई सुन्दरता का दीवाना हे ...
और गर ऐसा ना होता तो एक सुन्दर विष कन्या की जाल में फसके
कभी कोई राजा अपना राज्य और जान ना गवाता ...
इस हिसाब से सुंदरता सुन्दर ना होते हुवे खतरनाक साबित होती है ...
हर सुन्दर चीज का दूर उपियोग हर समय में हवा हे ,
कभी कोई सुन्दर व्यक्ति खुद अपनी सुंदरताका
दूर उपियोग करती है तो कभी,
कोई और उसकी सुंदरता का फायदा उठता है...
ये सिलसिला कोई आज कालका नहीं हे ...
ये किसा तो सदियों पुराना है ...
हर कोई सुन्दर चाहता है...
इस बात से इनकार करना मतलब अपने आपको धोखा देना ....
और अपने आपसे सरासर जूठ बोलना ...
लोग खुद के बचाव करने में बड़े माहिर होते है ...
सब अपना अपना बचाव अलग अलग ठंग से करता है .
ना कोई सच बोलता हे ना स्वीकारता हे और नाही सुनता है..
जब की में वो भी स्वीकारता हु और ये भी !
अगर तुम्हे इश्वर की क्रिपा से अगर सुंदरता मिली हे तो ...
जरुर ख़ुशी और गर्व की बात हे ..
अपनी किसी खूबी पे इतराना , खुश होना या गर्व करना,
कोई बुराई नहीं .
लेकिन ....
उसका दुरुपियोग या घमंड करना ...
इसमें कोई भलाई नहीं
अपनी सुंदरता का ना कभी दुरुपियोग करे और ना ही घमंड ....
बाकी मिसाले और भी हे ...
जेसे की लोग कभी भी कूड़े कचरे वाली जगह जाके नहीं बेठेगा ...
कोई भी इन्सान चेंनसे और शांति के कुछ पल बिताने के लिए ...
किसी सुन्दर फुलोसे हरा भरा ...
जिस बाग़ की जमीपे फेला हो घास हरा हरा ...
वही पर कोई जाएगा ...
वहा कोई नहीं जाता हे ना जाएगा ...
जहा आसपास गंडकी और बदबू फैली हो ...
बड़े बड़े ज्ञानी रूशी मुनि भी ध्यान और ज्ञान की चाहमे ...
जंगल में ही सही लेकिन
खोजेगा कोई साफ़ सुथरी ही जगह ...
जहा हरे हरे पेड़ पोदे हो ,कही आसपास बहेती स्वच्छ नदी हो,
पंखियो का कलरव गूंजता हो ....
ऐसी ही कोई सुन्दर जगह वो खोजेगा गहेरे ध्यान और ज्ञान के लिए ...
क्या तुम सेसी जगा जाओगे ?
जहा आसपास गंडकी फेली हो जहा बदबू ही बदबू फेली हो
क्या तुम वहा जाओगे .. ?
तुम कुछ जवाब देने की सोच रही हो ,
में जानता हु ...
तुम क्या कहोगे में ये भी जानता हु ...
तुम कहोगे ,
में ऐसी जगा अकसर जाती हु ...
में सेसे लोगो के बिच रहेती हु जोकि सुन्दर नहीं हे ...
छोटे छोटे बिन माँ के बंदे हे जो गंदे हे ...
तुम ऐसे अनाथ आश्रम में जाती हो में जानता हु ...
लेकिन क्या वहा जाकर उस बच्चे को युही देखती ही रहेती हो ...?
क्या उस बच्चे को नहेला धुला कर साफ़ सुन्दर नहीं करती ..?
या क्या वहा आस पास कही गंदकी हे उसे तुम साफ़ नहीं करोगी ...?
बस में यही कहेना चाहता हु की अगर हिसाबके मुताबिक़ कुछ असुंदर
कुछ गंदा बदबुसे भरा सामने आता हे तब भी सुन्दर लोग उसे
सुन्दर करनेका प्रयास ही करता है ...
नाकि उसे और असुंदर बनाता है ...
अगर ऐसा नहीं होता तो,
मजबूरन ही कोई ऐसे असुंदर लोग के साथ जीवन बिताता है
या उस गंदी जगह पर ठहरता है ..
अगर कुछ मजबुरिया ना होती तो कोई भी वहा ना रुकेगा ...
चला जाएगा , भाग जाएगा ऐसे गंदे लोग और जगह लो छोडकर ...
ये बात और है और हे ये हिसाब की बात हे
की किसी को सुन्दर या असुंदर मिले.
किसी को सुन्दर बहारसे मिलता है कोई ..
तो किसीको भीतर से कोई सुन्दर मिलता है ...
बहोत कम ऐसे भाग्यशाली होते हे जिसे ...
बहारसे और भीतरसे भी सुन्दर कोई मिले ...
इस सच को कोई टाल नहीं शकता ...
और मिसाले हे लेकिन समजदार के लिए इतना काफी हे ...
जो स्वीकार करता हे उसके लिए इतना ही काफी है ...
बाकी अपनी बात को किसी भी तरहे से जो सच ठहेराना चाहते है ...
वो जूठी दलीले और फिलोसोफी का सहारा लेके सवाल उठाएगा !
सवाल जवाब करेगा ..
ऐसे लोगो को कितनी मिसाले दो कम पड़ेगी
और फर्क कुछ भी नहीं पड़ेगा उसे ...
सुंदरता के बारेमे इतना कुछ कहेने के बाद में ये कहेता हु ...
अगर दुनिया चमन होती तो वीराने कहा जाते ....
कोई असुंदर हे तभी तो कोई सुन्दर नजर आता हे ...
सुन्दर जो हे वो आखिर असुंदर की ही क्रिपा है ...
असुंदर कोई है तभी तो सुन्दर की पहेचान होती है ...
तभी तो हूं में सुन्दर....
और कोई असुंदर हे तभी तो सुन्दर की पहेचान होती हे ..
लेकिन मेरा भीतर सायद उतना सुन्दर नहीं जितना में हु /दीखता हु ..
में भली भाति जानता और मानता हु की केवल बहारकी सुंदरता सुख नहीं देती ...
लेकिन भीतरकी सुंदरता भी भीतर उतर कर ही जानी जाती है...
फिर इस बात पे लोग बहोत सारी बहेस करेंगे ...
कई ऐसी मिसाले देंगे जिसमे सिर्फ भीतर की सुन्दरता का महिमा हो ...
लोग बहेस करते थे. करते है, और करते ही रहेंगे ...
में किसीको ऐसा करने से रोक नहीं शकता ....
लेकिन में वो आखरी सच कहेता हु जो कोई चाहकर भी नकार नहीं शकता ...
कोशिश होगी बहोत कोशिश होगी इस सच को नकार ने की ...
आखिर वो नाकाम रहेंगे ...
युगो से होती रही हे लड़ाई ....
एक राज्य पर दुसरे राज्य की चडाई ...
और लड़ाई की वजे जब खोजी तो हर लड़ाई में ...
किसी सुन्दर औरत को पानेकी ख्वाहिस नजर आई ...
और भी वजे थी ! वजे और भी होंगी ...
लेकिन ये वजे भी मूल में छिपी हुई देखि पाई गई हे ...
सच को कभी भी जूठी फिलोसोफी से दबाया या छिपाया नहीं जा शकता...
और ये सच हे की इस जहा में हर कोई सुन्दरता का दीवाना हे ...
और गर ऐसा ना होता तो एक सुन्दर विष कन्या की जाल में फसके
कभी कोई राजा अपना राज्य और जान ना गवाता ...
इस हिसाब से सुंदरता सुन्दर ना होते हुवे खतरनाक साबित होती है ...
हर सुन्दर चीज का दूर उपियोग हर समय में हवा हे ,
कभी कोई सुन्दर व्यक्ति खुद अपनी सुंदरताका
दूर उपियोग करती है तो कभी,
कोई और उसकी सुंदरता का फायदा उठता है...
ये सिलसिला कोई आज कालका नहीं हे ...
ये किसा तो सदियों पुराना है ...
हर कोई सुन्दर चाहता है...
इस बात से इनकार करना मतलब अपने आपको धोखा देना ....
और अपने आपसे सरासर जूठ बोलना ...
लोग खुद के बचाव करने में बड़े माहिर होते है ...
सब अपना अपना बचाव अलग अलग ठंग से करता है .
ना कोई सच बोलता हे ना स्वीकारता हे और नाही सुनता है..
जब की में वो भी स्वीकारता हु और ये भी !
अगर तुम्हे इश्वर की क्रिपा से अगर सुंदरता मिली हे तो ...
जरुर ख़ुशी और गर्व की बात हे ..
अपनी किसी खूबी पे इतराना , खुश होना या गर्व करना,
कोई बुराई नहीं .
लेकिन ....
उसका दुरुपियोग या घमंड करना ...
इसमें कोई भलाई नहीं
अपनी सुंदरता का ना कभी दुरुपियोग करे और ना ही घमंड ....
बाकी मिसाले और भी हे ...
जेसे की लोग कभी भी कूड़े कचरे वाली जगह जाके नहीं बेठेगा ...
कोई भी इन्सान चेंनसे और शांति के कुछ पल बिताने के लिए ...
किसी सुन्दर फुलोसे हरा भरा ...
जिस बाग़ की जमीपे फेला हो घास हरा हरा ...
वही पर कोई जाएगा ...
वहा कोई नहीं जाता हे ना जाएगा ...
जहा आसपास गंडकी और बदबू फैली हो ...
बड़े बड़े ज्ञानी रूशी मुनि भी ध्यान और ज्ञान की चाहमे ...
जंगल में ही सही लेकिन
खोजेगा कोई साफ़ सुथरी ही जगह ...
जहा हरे हरे पेड़ पोदे हो ,कही आसपास बहेती स्वच्छ नदी हो,
पंखियो का कलरव गूंजता हो ....
ऐसी ही कोई सुन्दर जगह वो खोजेगा गहेरे ध्यान और ज्ञान के लिए ...
क्या तुम सेसी जगा जाओगे ?
जहा आसपास गंडकी फेली हो जहा बदबू ही बदबू फेली हो
क्या तुम वहा जाओगे .. ?
तुम कुछ जवाब देने की सोच रही हो ,
में जानता हु ...
तुम क्या कहोगे में ये भी जानता हु ...
तुम कहोगे ,
में ऐसी जगा अकसर जाती हु ...
में सेसे लोगो के बिच रहेती हु जोकि सुन्दर नहीं हे ...
छोटे छोटे बिन माँ के बंदे हे जो गंदे हे ...
तुम ऐसे अनाथ आश्रम में जाती हो में जानता हु ...
लेकिन क्या वहा जाकर उस बच्चे को युही देखती ही रहेती हो ...?
क्या उस बच्चे को नहेला धुला कर साफ़ सुन्दर नहीं करती ..?
या क्या वहा आस पास कही गंदकी हे उसे तुम साफ़ नहीं करोगी ...?
बस में यही कहेना चाहता हु की अगर हिसाबके मुताबिक़ कुछ असुंदर
कुछ गंदा बदबुसे भरा सामने आता हे तब भी सुन्दर लोग उसे
सुन्दर करनेका प्रयास ही करता है ...
नाकि उसे और असुंदर बनाता है ...
अगर ऐसा नहीं होता तो,
मजबूरन ही कोई ऐसे असुंदर लोग के साथ जीवन बिताता है
या उस गंदी जगह पर ठहरता है ..
अगर कुछ मजबुरिया ना होती तो कोई भी वहा ना रुकेगा ...
चला जाएगा , भाग जाएगा ऐसे गंदे लोग और जगह लो छोडकर ...
ये बात और है और हे ये हिसाब की बात हे
की किसी को सुन्दर या असुंदर मिले.
किसी को सुन्दर बहारसे मिलता है कोई ..
तो किसीको भीतर से कोई सुन्दर मिलता है ...
बहोत कम ऐसे भाग्यशाली होते हे जिसे ...
बहारसे और भीतरसे भी सुन्दर कोई मिले ...
इस सच को कोई टाल नहीं शकता ...
और मिसाले हे लेकिन समजदार के लिए इतना काफी हे ...
जो स्वीकार करता हे उसके लिए इतना ही काफी है ...
बाकी अपनी बात को किसी भी तरहे से जो सच ठहेराना चाहते है ...
वो जूठी दलीले और फिलोसोफी का सहारा लेके सवाल उठाएगा !
सवाल जवाब करेगा ..
ऐसे लोगो को कितनी मिसाले दो कम पड़ेगी
और फर्क कुछ भी नहीं पड़ेगा उसे ...
सुंदरता के बारेमे इतना कुछ कहेने के बाद में ये कहेता हु ...
अगर दुनिया चमन होती तो वीराने कहा जाते ....
कोई असुंदर हे तभी तो कोई सुन्दर नजर आता हे ...
सुन्दर जो हे वो आखिर असुंदर की ही क्रिपा है ...
असुंदर कोई है तभी तो सुन्दर की पहेचान होती है ...
बस यही वजे की जो
सुन्दर नहीं हे,
उनके लिए मेरे दिलमे अनुकंपा है...
और यही अनुकंपा मुझे ये लिखने कहेने को मजबूर करती हे ..
उनके लिए मेरे दिलमे अनुकंपा है...
और यही अनुकंपा मुझे ये लिखने कहेने को मजबूर करती हे ..
क्यों की
में जानता हु की ,
अ सुंदर
ता की वजह से कितने ही ,
लड़के लड़की ,औरत आदमी परेशान हे ...
लड़के लड़की ,औरत आदमी परेशान हे ...
लेकिन
सुंदरता सिर्फ चहेरे से हीजाहिर नहीं होती ...
कई
सुन्दर चहेरे वाले आदमी और औरतके भीतर...
ढेर सारी असुंदरता छिपी होती है...
ढेर सारी असुंदरता छिपी होती है...
और
असुंदर चहेरे के भीतर ढेर सारी सुन्दरता ....
इतना
लिखने के बाद लिखी थी अनंत ने एक कविता ...
में भी एक मिट्टीका मटका...
में भी
आप ही की तरहा मिट्टीका एक मटका हु...
हां में
जानता हु में बाहर से गंदा हु ...
लेकिन
भीतरसे साफ़ और ठंडा हु ...
मेरा
भीतर बिलकुल साफ़ है...
मेरे
अंदर ना कोई पाप हे ..
में ठंडा
हु तभी तो भीतर पानी ठंडा है...
और आखिर
प्यास बजाने के लिए हर कोई पानी ही तो पीता है..
प्यास
बजती नहीं कही किसीकी बिना पानी पिए पानी हर कोई पीता है ...
प्यास
बजाने के लिए क्या इतना काफी नहीं की साफ़ पानी मिले ....
और क्या
चाहिए बतावो भला प्यास बजाने के लिए ...
आखिर ये
जीवन पानी से ही तो चलता हे पलता है ..
ये फानी
दुनिया एक ना एक दिन शुध्ध पानी बिना ख़तम हो जायेगी ...
हां में भी आप ही की तरहा मिट्टीका एक मटका हु...
लेकिन हां में जानता हु में बाहर से गंदा हु ...
लेकिन मेरा भीतर साफ़ है में भीतर से ठंडा हु ...
सायद आज अभी तुम मेरे बहार के दिखावे पे जाओगे ...
तो एक ना एक दिन पछ्तावोगे ...
उस वक्त तुम्हे मेरी याद बहोत आएगी ...
उस वक्त होगा तुम्हे अहेसास ...
जब कड़ी धुप में तूम कही निकालोगी ...
और तुम्हे लगेगी जोरकी प्यास...
जब तुम्हारा गला सूखेगा तब जाके में आऊंगा तुम्हे याद ...
बहार से कोई मटका साफ़ होगा ...
और भीतर पानी गंदा होगा ...
तो क्या तुम अपनी प्यास बजा पावोगी ...?
बहेतर हे तुम अभी से मुझे जानलो ...
कड़ी धुप जब होगी और प्यास लगेगी तुम्हे "अनंत"
तब जाके तुम मानोगी...
"अनंत" ये मटका गर तुम्हारे पास होता तो ...

