Friday, 3 January 2014

अनंत के वही फटे पुराने कागज में से मिली और एक रचना...

आज चारो और ख़ामोशी सी  छाई हुई है , 
कोई आस पास नहीं है.
मेरे आस पास हु  सिर्फ मै . 
और मेरी तन्हाई.  
फनकार.... 
अजीब सी मस्ती हर वक्त उनके साथ होती हें. 
सबसे निराली फनकारो की हर ईक बात होती हें.    

दिन भर काम निपटाते हें एक जिमेवारी के साथ ,
उनके लिए दिन तब  निकलता है जब रात होती है.  

आम लोगो से कुछ हटके जीते है वो जिंदगी  अपनी. 
फनकारो  के जीवन में कुछ अजीब सी बात होती है .  

फनकारों का  कभी कोई अंतिम पड़ाव नहीं होता. 
हर एक पल हर एक सफर नई शुरुवात होती है.  

किसीकी नए चित्रसे,  किसीकी नए स्वरसे,  तो, 
किसीकी नए शब्दसे रोज नई मुलाक़ात होती हें. 

वो जब अपने किसी भी फन में डूब जाता है. 
तब इस दुनियासे उसका नाता टूट जाता है. 

ईक पागल जैसी  ही फनकारो की हालत होती है. 

अपनी इन मस्तीमे डूब के जब वो गाता बजाता.
या लिखता है ""अज्ञानी" ईश्वरसे उनकी बात होती है.

"अज्ञानी "

इस तरहे अज्ञानी खुद के साथ बात कर रहा था  जो की ,  

मैने बहार खड़े खड़े सुना .मुझे अनंत की आवाज नहीं आई . 

फिर दरवाजा खटखटाया , वो दोड के आया . 

मुझे अंदर खींचके जट  दरवाजा बंध कर लिया . 

हम दोनों भीतर जाके अपनी अपनी जगे बैठ गए . 

अनंत अपनी जगह संभाले बेठा था . मगर लेटा था , 

पास जाके  देखा तो पता चला वो तो सो रहा था .

अब में समजा आज अज्ञानी अकेला अकेला क्यों बडबडा रहा था . 

मैने अज्ञानी  से पूछा क्यों आज इतनी जल्दी ये लुडक गया ?

मै सोया नहीं परिया मै सोचता हु की,

अनंत आँखे खोले बिना बोला . 

क्या सोचता है रे तु . ?

मैने अनंत से पूछा, 

वो बोला ,जो तु सौचता है. 

चल अब जल्दीसे चाय पीला फिर  बतोका दौर हम आगे बढाए . 

मैने चाय की पियाली भरते भरते पूछा . 

यार अनंत मुझे ये बता की तुजे कैसे पता ,

की मै क्या सोचता हु ?

मुर्ख जैसे सवाल पूछ कर मुड खराब मत कर .

जल्दी से चाय भर  बड़ी तलब लगी है. 

फिर हम मर्द औरत से और औरत मर्द्से ,

क्या क्या  उमीद रखते है और क्या चाहते हें उनकी बाते करे. 

ओए मै तेरे पैर पडू यार यही बात मै सौच रहा था . 

आज तु दो पियाली पीले एक तेरी और एक मेरी भी आज तु पीले . 

यार मुझे बिना चाय पिए लज्जत आ गई.    

चल चल अब पागल मत बन मुझे मेरी चाय दे.

  तु अपनी ले और एक अज्ञानी को दे . 

ठीक है , मै उन दोनो  अपनी प्याली लेकर अपनी खुर्शी पर बैठ गया . 

कश्के चाय की चुश्की मारते  अनंत बोला ... 

"अनंत" सेक्स  क्षण भर रहे शरीरमा . 
प्रेम जीवन भर जिवंत रहे  झ्मीरमा. 

बोल अब आगे कुछ बोलू ? 

जोरसे चायकी चुश्की लगाके मेंने कहा.  

हां यार शुरुवात इतनी शानदार जानदार .

हुई है तो आगे जाने क्या क्या होगा . 

तो सुन परिया स्त्री हो या पुरुष,

 दोनों एक दूसरेमे पहेले रूप देखते है . 

हां वो तो है, ये तो प्रकृति गत है . 

सुंदरता को कभी नजर अंदाज नहीं किया जा शकता . 

नाही सुंदरता का ख़याल टाला जाता है . 

अगर सुंदरता का महत्व ना होता तो लोग बाग बगीचे के बजाय कूड़े कचरे पर भी हवा खाने बैठ जाते 

तो .. सबसे पहेले शरीर और सबसे आखिर शरीर. 

बीचमे जो आया वो झमीर. 

मगर फिरभी परिया कभी कभी ऐसा होता है 

सिर्फ जिस्म के भूखे मर्दोकी नौटंकी भी वो भली भाति जानती हें . 
फिर भी कभी कभी जिस्मानी तलब के आगे  औरत जुक जाती है .

"अनंत" अपनी गलतिका जब उसे अहेसास होता है वो संभल  जाती हें . 
फिर  हर कदम वो सोच समज कर उठाती है , बहेकने से पहेले रुक जाती है . 

जिश्म की भूख होना कोई गुनाह तो नहीं है , 
लेकिन प्रेम का नाम बदनाम हो ये गलत है .

फिर मर्द होते हुवे भी इस बातका स्वीकार करना जरुरी है की 

एक मर्द  औरत का जिश्म पाने के लिए .
प्रेमका खेल आसानी से खेल लेता है . 

मगर ये भी सही है की  वो मर्द अपने खेल में.
 तब ही कामियाब होता है जब औरत, 

अपने पुरुष से संतुष्ट ना हो ,

 ये बात शिर्फ  शरीर की ही नहीं और भी ऐसी चीज है , 
जो एक औरत अपने मर्द में हो ऐसा चाहती है   

और कभी कभी तो उस औरत के शरीर की रचना ही ऐसी बनी होती है,

 की उसे हर रात नए मर्द की जरुरत महेसुश हो . 

चल अब उठा कागज़ कलम और लिख ... 

मै कागज़ कलम लेने उठा देखा तो अज्ञानी सो चुका था . 

लो देखो अनंत ये साहब तो सो गए . 

अस्सल  में वो सोया नहीं परिया वो जाग गया है .

इस लिए वो सो गया है 

अनंत कुछ ऐसे बोला जो मेरी समजमे नहीं आया .. 

हें.... ? क्या बोला तु  में कुछ समजा नहीं .. 

रहेने दे परिया  तु नहीं समजेगा. 

अब लिख .. 

हां बोल .. 

दिलको बहेलाने के लिए आंखोके सामने  कोई हसीन रूप चाहिए . 
सिर्फ सुखसे काम नहीं चलता हमारा, हमें थोडासा दुःख चाहिए.   
   
ज्यादातर मर्द  अकसर  सिर्फ औरत के जिस्म में  उल्जे रहेते है
जब की  औरतको ईक मर्द्की बाहोमे सच्चे  प्रेमकी  हुन्फ़ चाहिए . 

जले तो जलाए , बुजे तो बजाए , एक चिंगारी  सी  होती हें  औरत. 
खुद जलने  या उसे  जलानेको को  बस एक  प्यार भरी  फूंक चाहिए .  

जिश्मानी सुख भी जरूरी है दोनों को जीवनमे ,पर वो  आता हें अंतमे . 
सबसे पहेले  तो औरत को  उसे जो समज शके ऐसा एक पुरुष चाहिए .

प्यारके इस नाजुक मोड पर अगर मर्द थोड़ी सी भी जल्द बाजी करे  तो 
ये हक्क है उन्हें की कहेदे वो अपने मर्द्से सो जाइए जनाब उठ जाइए.  

औरत की मरजी के खिलाफ ताकत नहीं की उन्हें कोई मर्द छु तक  शके .
कोई गैर कदम  बढाए तो आँखे  निकालके वो कहे शक्ति हें रुक जाइए. 

जिस्मानी सुख जो होता है सिर्फ दो चार पलका  बस इतनि  जरुरत  नहीं 
ईक औरतको इसके सिवा हसी खुशी और भी जीवनमे बहोत कुछ चाहिए .   

औरत सिर्फ मर्द्की  काली  या गोरी बाहोमे खुदको  लिपटानेका शोख नहीं  
रखती औरतको उनके भीतर उतरे, भीतरसे भी समज शके ऐसी रूह चाहिए .

जो पास हो वो सबसे खास हो  बस इतनी सी तमन्ना  रखती है  हर औरत.
जूठ मुठ का नहीं अपने मर्द्से औरतको प्रेम या प्यार भी सच मुच चाहिए. 

"उम्रभर ना मिटने वाली "अनंत  ये दो भूख , 
एक प्रेमिकी इच्छा दूजी प्रेमि से हूंफ
इस दुनियाकी हर एक  हसी औरत को .हसी मर्दोसे ईक अजीबसा सुख चाहिए .

"अनंत"  
चल भई चल छोड ये सारी बाते आखिर क्या रखा हें इन बातों में ... 

अनंत मजा  आ गया  यार चल अब में जाता हु ... 

अरे कही नहीं जाना यार आज यही पर सोजा, 

ठीक है फिर बिछा मेरी चादर ... 

मै वही पर अनंत की बगलमे सो गया..... 


       

1 comment:

  1. Zindagi ek jung hoti hai..., dusro se kam khud se jarur hoti hai...
    Har insaan main koi na koi fankarI chipi jarur hoti hai.
    Aachi -buri? Hum kaun hai kehne wale? Uski achi to apni buri hoti hai!!
    Har insaan ki ek fitrat hoti hai!!
    Sahi - galat bade baithe hai nyayadhish yahan, shayad inki hatheli ekdum saaf hoti hai
    Koi saza koi farman koi farak nahi padta in fankaaro ko
    duniya ke naaptaul kahan inko manzur
    sabse alag inke andaaz hote hai!

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