खामौश
ईस शहेर में छोटासा एक घर...
यानी हमारी कबर....
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यहा मरके जिनसे वहा मरके जीना बहेतर होंगा.
फिर ना जिनेकी फिकर ना मौतका डर होंगा.
कई बे नूर चहेरे और ज़िंदा लाशकी इस,
बस्तिसे दूर खामोश सा इक शहेर होगा.
हम रहेने जायेंगे वहा जहा कोई अपना साथ
ना आएगा, सिर्फ हम होगे और हमारा घर होंगा.
ये दिल जो हर वक्त फिक्र्मे रहेताथा अपने,
बेगानेकी अब मगर ये दिल बे फिकर होगा
दोनों हाथ सीधे और पैर लम्बाये लेटे रहेंगे.
फिर तो आराम ही आराम शामो शहर होंगा
उम्रभर जो होता रहा दर्द अब ना उस दर्द्का
अहेसास, ना किसी गहेरे जख्मका असर होगा
कभी जो हमारे सिनेमे खिलतेथे फुल प्यारके अब
वो नाजुक प्यारे फुल बाद हमारे सिनेके ऊपर होगा.
चार कंधे और आठ गेरोके पेरोके बल पर हम
जायेगे जब वो सफर जिंदगीका आखरी सफर होगा.
“अनंत” होंगा उस खामौश शहेरका नाम कब्रस्तान
और उस शहेरमें बने हमारे घरका नाम कबर होंगा.
"अनंत"
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zinda is tan main tujse mile to kya mile..
ReplyDeleteaayenge wahan jahan tera aakhri ghar hoga !
kaid main rehna nahi hai anant mumkin
ghumenge us jahan main jahan aman hoga !
ek na hone diya hume ehsaane dosto ne
mitti hamari ek hogi..ek hamara ghar hoga !
tere apne to hum yahan bhi ban na paaye
wahan koi kisika nahi yehi sukun hoga !
har jagah koi padosi to hote hai
tere bagal main hi hamara bhi aakhri ghar hoga !
अच्छा लगता है , बड़ा प्यारा लगता है , मुझे आपका आना जाना यहां....
ReplyDeleteक्योकि आप की वजहसे मुझे अनंत के फटे पुराने...
कागजो से मुझे कुछ न कुछ ढुंढने का मन होता है ....
और ऐसे ही कुछ पुराने कागज़ का ढेर कम होता है...
मरनेसे पहेले सायद उसने मरनेके बाद की कुछ कल्पना की होगी.
जो आज में देख रहा हु उनके मरने के कुछ कुछ सच में बदल रही है ...
लेकिन अफ़सोश.....
उनके जाने के बाद....
"अनंत"इससे अच्छी किस्मत और क्या होगी भला ...
जीते जी जो सुख ना मिला वो मरनेके बाद तो मिला ...