Saturday, 21 December 2013

सिर्फ और सिर्फ मेरी आवाज तक पहोंचानेका राज इन्हिमे कही छुपा है....

वैसे तो इस निर्जन खंडर मै... 
कोई नहीं आता जाता है सीवाए 
अनंत के शब्द जिनकी रूह को छु जाते है...   
यहां पर कुछ ऐसे ही खास लोग आते है ....  
और हम, हम तो सबको चाहते है ... 
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नौ , बजे के बाद हर रात।
चार ,आँखे मिले बार बार।
दो,आंखे देर रात तख रोये खूब रोये। 
फिर सुबह 
छे, बजे मै थक कर सो जाता हुं। 
नौ, बजे फिर मुजको, 
नौ,करी पर भी जाना होता है। 
आठ, घंटे तक बस काम ही काम। 
छे, दिन तक लगातार युं हुवा। 
हर शाम, 
सात, बजे और आंख भीगे। 
तिन, हम,  मै , अनंत, और 
अज्ञानी आधी रात के बाद जहां मिलते थे,  
अब तो वो जगह भी खंडर बन चुकी है।  
और वो दोनो अनंत और अज्ञानी भी नहीं रहें।
बस उन दिनो की और उन दोनो की 
यादे और बाते बाकि बची हें। 
सो मै,यहां आके उन्हें याद कर लेता हुं। 
उन्हि की कही बाते लिखता हुं। 
बस ऐसे ही मै जीता हुं । 
 और औउन दोनों को उन्हीके शब्दोमे 
मे जिन्दा रखता हू।
ये ऐसी जगह है, जहा बही लोग आते जाते है, 
जो उनके शब्दों को सिर्फ पढते नहीं।.! 
बल्कि, रूह से महेसुश भी करते है.! 
उन सभी की चाहत मेरी रूह को छु लेती है। 
और मै अपनी एक जिम्मेवारि के बाद, 
अपना जीवन यहां बीताता हुं और जीता हुं, 
  देर रात तक इस निर्जन खंडर के अंदर ....
यही मेरी मस्ती हें, 
  यही मेरा जीवन... 
अंत में 
"अनंत" की कही बात के साथ मे विदा लुंगा। 
खुद को भूल जाए ऐसी कल्पना हो। 
जो रूह को छु ले ऐसी रचना हो। 
"अनंत" शब्दों में भी जान होती है.! 
जो शब्द रूह को ना छु शके 
उन शब्दों को मिटा दो.!
"अनंत"
रूह से लिखे शब्दोमे हमारी सांस होती है..!  
शब्द भी रोते है हमारे साथ। 
श्ब्दोको भी आंख होती है। 
शब्द बोलते है, सुनते है , देख भी शकते है, दिलो के आरपार ... 
तभी तो पढ़ने वालो को लगता है हर शब्द अपना विचार....
 "अनंत"
इश्कमे जब कभी लगती है ठोकर...
हम चुप बैठे नहीं रहेते रो रो कर...
"अनंत" ऐसे हालमे हम लिखते है ... 
और जब लिखते उस वक्त ... 
हमारी आँखे भीगती है अक्सर... 
" अनंत "



       

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