Wednesday, 25 December 2013

ये कहानी कभी खत्म ना होंगी.....

उस दिन आज के जैसा शर्दिका  मौसम था रात काफी हो चुकी थी. 

और मै हमेशा की तरहा उसी पुराने घर की और चाय लेके चल पड़ा .

जहा अनंत और अग्यानिका बसेरा था... 

घर का दर खुल्ला ही था मै भीतर गया .

घना अँधेरा था और सिर्फ जीरो का लेम्प जल रहा था..  

आ गया ... आ यार आ तेरा ही इंतजार था आ बैठ .  

अग्यानिने  मुझे  मेरी कुर्शी पर बैठने  को कहा . 

अनंत और अज्ञानी अपनी अपनी वही पुरानी  कुर्शी  बैठे थे .. 

मे अपनी खाली कुर्शी पर  बैठ गया 

तीनों कुर्शी के बिच पड़ी जर्झारित टीपॉय पर.. 

पानी का लौटा और तिन प्याली पड़ी थी ... 

जो मैने चाय से भर दी...

चाय की पियाली आपसमे टकरा ते हुवे . 

हमने चियर्स किया और चुस्किय मारने लगे...  

मने अनंत से पूछा  किसी भी रिस्तो के बारे में तेरा क्या ख़याल है .. 

अनंत ने कहा ...किसीभी मतलब ? . 

क्या यार तू भी मतलब निकालना आता तो तुजे पूछता क्या ? 

अज्ञानी धीरे से बोला यार थोडा तो खुलके बताना पड़ेगा ना . 

एक काम कर तू ही बता मुझे बताना नहीं आता... 

अज्ञानी मेरी बात मानते हुवे बोला अच्छा चलो ऐसा करते है.. 

और अज्ञानी ने बात का दौर आगे बढ़ाते हुवे अनंत से कहा . 

अनंत अच्छा विषय है चलो हम ये सोचे रिश्ता किस चीज पर निर्भर करता है...

अनंतने कहा गर रिश्ता स्त्री और पुरुष का रिश्ता हो तो  प्रेम और प्यार पर निर्भर करता है 

वैसे तो इस दुनियाका हर एक रिश्ता किसिना किसी स्वार्थ पर ही निर्भर करता है..

अरे... एक मिनिट अनंत ठहर जरा मुझे लिख लेने दे.. 

मै झट से दीवार पर लटका पेड उतार लाया 

जिनमे कुछ रद्दी कागज़ दबे रहेते थे और साथमे धागा बांधे एक कलम 

पेड जो हमेशा  दीवार पर लटकता रहेता था

 अनंत और अज्ञानी को जब भी खोई ख़याल आये उनमे लिख देते थे. 

में वो उतार लाया और अनंत जो बोला था लिख लिया उनके नाम . 

"अनंत" गर रिश्ता स्त्री और पुरुष का रिश्ता  हो तो  प्रेम और प्यार पर निर्भर करता है 
वैसे तो इस दुनियाका हर एक रिश्ता किसिना किसी स्वार्थ पर ही निर्भर करता है..

अज्ञानी बोला लिख लिया ... 

हां लिख लिया ... 

अग्यानिने अनंत से कहा अनंत आज एक अच्छी रचना बनने का माहोल बन चूका है . 

अब इस रचना को ही आगे बढ़ा.. बात मै दम है.. 

हां अनंत अज्ञानी ठीक कहेता है बात में बिलकुल दम है .. 

में कागज़ कलम लेके बैठ गया ... 

अनंत की आँखे भीग रही थी ... 

भीगी आँखों को पोछते हुवे ... 

ठीक है तो आगे लिख परेश अब अनंत के अंदरसे दर्द उभर रहा था .... 

हर एक रिश्ता यहाँ किसी ना किसी मतलब पर निर्भर करता है. 
इस जीवन मे कुछ भी..! पाना खुदकी तलब पर निर्भर करता है.

 बे वजह  कुछ नहीं होता. ना बे वजह रिश्ता कोई बंधता है यहाँ.   
अगला हो या पिछला हर रिश्ता किसी सबब पर निर्भर करता है.

पढते ही रो पड़े कोई महेसुस हो दर्द उसे लिखने वालेका ऐसा होना.
लिखने वाले के दर्दो  असर और उनके गहेरे शबद पर निर्भर करता है. 

कोई लिख लिख कर उठ जाता है इस जहा से. कोई ऊपर दुनियामें  
उभर आता है. और किसीका जीवन जोरे कलम पर निर्भर करता है. 

देखते ही देखते दिलमे उतर जाना किसीके , कोई आसान काम नहीं. 
उतरना इस कदर किसीके दिलमे दोनोंकी नजर पर निर्भर करता है.

जीवनमे प्रेम का होना नमक जैसा है. चाहे कितने ही मसाले डालो चाहे. 
कीतना पकालो"अनंत" भोजन का स्वाद आखिर नमक पर निर्भर होता है.

हर एक रिश्ता यहाँ किसी ना किसी मतलब पर निर्भर करता है. 


इस जीवन मे कुछ भी..! पाना खुदकी तलब पर निर्भर करता है.

"अनंत"

एक ही सांसमे गझल पूरी करके अनंत चुप हो गया ..    

वाह वाह अनंत क्या बात कहेदी यार एक ही सांसमे पूरी गझल करदी ... 

अज्ञानी अनंत की आंखोमे देखते हुवे बोला तेरा दर्द बेकार नहीं गया अनंत 

आंसू खोते ही तुने एक हसीन, गमगीन और नमकीन गझल पाई हें.. 

अनंत एक ही घूंट में लोटे में बचा पानी पी गया और फिर बोला . 

हां यार .. मगर हमारी किस्मत तो देखो ... 

हम दर्द अपना गझल में गाये. 
चंद ही लोगो को समजमे आये.   

 और बाकि लोग बजाके तालिया . 
  देखो "अनंत" करे हें वाह वाहीया . 

"अनंत" 

सो तो है मेंने गमगीन माहोल को बदलने का प्रयास किया. 

और अनंत से पूछा क्या अनंत वाकय हर रिश्ता स्वार्थ से ही बंधता है. 

अनंत धीरेसे बोला अकसर ऐसा ही होता है . 

अज्ञानी बोला नहीं अनंत हर वक्त ऐसा नहीं होता. वैसे  तेरी ये सोच भी बे वजह नहीं . 

तू अपनी जगह सही है क्योकी तुजे अक्सर ऐसे ही लोग मिले है जीवनमे. 

 पर कुछ रिश्ते बिना स्वार्थ के भी बंधते है और लंबे अरसे तक निभाए भी जाते है. 

मै जानता हु अज्ञानी में ये भी जानता हु . 

कई बार मेरी ही गलती मुझे परेशान करती है.

मैने भी कई बार सिर्फ अपना स्वार्थ देखा है . 

कभी कभी में दुसरोकी परेशानी को नहीं समज पाता.

मै बीचमे बोला वैसे तू खुदकी परेशानी को भी कहा समज पाता है अनंत ? 

अनंत बोला. हां यार परिया तेरी बात भी सही है ... 

मुझे खुदका भी कुछ पता नहीं ...   

लेकिन मै जानता हु अनंत तेरा स्वार्थ परमार्थ से भरा होता है... 

तू पूरा का पूरा कभी स्वार्थी नहीं बन शकता .     

ओर तुने ही तो कहा था की जिस स्वार्थ में परमार्थ छुपा हो उसे स्वार्थ नहीं कहेते .

नहीं.. नहीं.. अज्ञानी में जुठ नहीं बोल शकता कई बार मेंने सिर्फ अपना स्वार्थ देखा है. 

और दुसरोको बे वजह परेशान भी किया है ..

अनंत को कुछ ज्यादा ही गमगीन होता देखके 

 मैने फिर माहोल बदलने का प्रयास किया 

अरे यारो छोडो भी अब इन बातो को आखिर क्या रखा हें इन बातो में हां... 

दुनिया में ऐसा कौन हें जो गलती नहीं करता, अपना स्वार्थ नहीं देखता. 

होता है यार चलता है ये दुनिया है प्यारे जहा हर किसमके लोग पाए जाते है. 

निजी स्वार्थ में किसीकी जान लेने वाला  भी ! 

और बिना स्वार्थ किसीपे जान न्योछावर करने वाला भी ! 

अनंत और अज्ञानी मेरी बात पे हसने लगे अनंत कुछ हल्का हो गया .. 

परिया तू भी कमाल की चीज है . 

कुछ ना कहेते कहेते तुने भी बहोत कुछ कहे दिया ... 

अपनी तारीफ़ से मै शर्मा गया.. 

आपकी बदोलत यारो आप ही की बदोलत ,

आपके साथ रहेते रहेते मैने भी कुछ शिख लिया..

वर्ना मै क्या...  

चलो अब में चलता हु रात बहोत हो चुकी है .

आप दोनों भी सो जावो  

फिर सुबह अग्नि परीक्षा देनी है ... 

भीतर ही भीतर कुछ उदासी साथ लिए,

उन दोनो से विदा लेते हुवे मै ठंडीमें थर्राता अपने घरको चला.... 
       




   



       
  

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