Wednesday, 25 December 2013

मै जिन्दगीका साथ निभाता चला गया.....

अनंत का जीवन कई परेशानिओसे भरा पड़ा  था .. 

और उपरसे पीड़ा प्रेम की , कभी कभी सारी परेशानीओ से,

 थक हार के कोने में बैठ अकेला रो लेता.... 

फिर खुद ही संभल जाता . 

प्रेम की पीड़ा मै आनंद उठाता "अनंत"

अपने काम में व्यस्त फिरभी होके मस्त .... 

अक्सर ये गीत गाता और  कुछ पल के लिए सारे गम भूलके 

ऐसे गीततो में खो जाता.. 

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया

बर्बदियों का शोक मानना फ़िज़ूल था
बर्बदियों का जशन मानता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ा…

जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया
जो खो गया मैं उसको भूलता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ा…

गम और खुशी में फ़र्क़ ना महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मुक़ाम पे लाता चला गया
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ा


https://youtu.be/ivBhqDtJeiw?si=NCRzdCExHpd25J8z



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