Friday, 27 December 2013

और फिर इस पंजरे के भीतर भी तो कई छेद हुवे...

हर इन्सान ईक पिंजरा हे... 
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ये सारा का सारा खेल बस इक इस पंछी और पंजरे का हे.... 
"अनंत" इक दिन पंछी साथ अपने मिट्टी बनाके ले उड़ेगा तुजे... 
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ना पूछो इस पंजरे के भीतर कैसे कैसे भेद छुपे...
पंछी कितने संदेश लाये कितने वापस भेज चुके... 

कभी पंछी पिंजरा, तो कभी पिंजरा पंछी बन उड़े... 
दोनों साथ रहे, ना फिर भी दोनों कभी एक हुवे... 

और इक दिन पंछी ने कहा पिंजरे से ऐ पिंजरे तू कब,
तक कैद में रखेगा मुझे इक दिन ले उडुगा में देख तुजे. 

"अनंत" इस पंजरे में जाने कितने पंछी केद हुवे... 
और फिर इस पंजरे के भीतर भी तो कई छेद हुवे... 

"अनंत" ये खेल सारा बस इस ईक पंछी और पंजरेका हे... 
हां ! गुरुर मत कर इक दिन ले उड़ेगा पंछी, ऐ पिंजरे..! देख तुजे...

"अनंत"

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