रात ज्यो ज्यो ढलती थी ठंड उतनी ही बढ़ती थी.....
मै खंडर की और कंबल ओढ्के उन दोनों के लिए चाय लेके रोज की तरहा निकल पड़ा .....
ये उन दिनों की बात है,
मै खंडर की और कंबल ओढ्के उन दोनों के लिए चाय लेके रोज की तरहा निकल पड़ा .....
ये उन दिनों की बात है,
जब अनंत दिमागी तौर से पागालसा हों चुका था.
सामने कोई नहीं होता फिर भी बो कुछ ना कुछ यु बडबडाता रहेता था,
ऐसे जैसे कोई सामने हों.
उन दिन मै ठंड में थर थराता जब वहा गया ...
तो मैने खंडार के अंदर देखा तो अज्ञानि आँखे बंध करके अपनी खुर्शी पर लेटा था ,
और अनंत अपनी खुर्शी पर बैठके सामने पड़ी टीपॉय पर रखे दिए के सामने ...
ये रचना बडबडा रहा था.....
मै अपनी खुर्शी पर कागज़ कलम लेके बैठ गया पर उसे ये भी पता न था ...
वो तो बस दियेके सामने देखके बडबडा रहा था ...
जो मै लिखता गया....
હાં એ ખરું કે તું પણ રૂપાળી છે , ને હું પણ ઠીક ઠીક રૂપાળો છું.
પ્રથમ રૂપથી જ ઘાયલ થાય છે સૌ , હું પણ રૂપથી ઘવાણો છું.
બહુ બીક લાગે છે હવે તો મને આ ચણાના ઝાડથી સાચું કહું છું.
બહુ ચડાવ્યો છે લોકોએ મને અને પછી ? જવા દો ફરી પટકાણો છું.
હું સારો છું, હું સાચો છું , ખોટે ખોટે પણ મે આવું કદિ કહ્યું નથી .
આજે પણ સાચે સાચું કહું તો , હું સાવ કરતાં સાવ ખોટાળો છું.
આજે પણ સાચે સાચું કહું તો , હું સાવ કરતાં સાવ ખોટાળો છું.
સીધા સરળ માણસને ને પણ અહી ઉકેલવા મુશ્કેલ છે. ત્યાં -
તું મને કેમ કરીને ઉકેલશે ? હું તો મસ મોટો ગોટાળો છું.
ભઈ પ્રેમ થી ડર કેમ ના લાગે મને ? આખરે હું પણ માણસ છું !
એકાદ વાર ની વાત હોય તો ઠીક છે. પણ હું અનેક વાર દુભાણો છું.
હાં ! મંજીલ તો હાથ વેંતમાં જ છે. પણ મને ભટકવા માં મજા આવે છે.
જો ને ! તેથી જ તો હું ભટકું છું , અને મારાથી પણ હું છુપાણો છું.
જાણું છું હવે મનાવવા પણ કોઈ નહીં આવે, છતાં જો હું રિસાણો છું .
ભૂલ કરી છે તો ભોગવ હવે ! આમ આજે હું મને ખૂબ ખીજાણો છું.
રે મન પ્રેમ નથી, પ્રેમ નથી, એવું સતત રટ્યા કરે છે, તો પછી,બોલ
એવું તે શું છે ? કે રોજ આમ અડધી રાતે જાગી જાય છે સફાળો તું .
નિકટ આવી છોને મારા બદનને સ્પર્શ ના કરી શકે તું ,તો શું થયું !
તારાથી દૂર રહીને પણ મેળવી લઉં છું સતત સ્પર્શ તારો હૂંફાળો હું.
પાગલ છું. મારા માંથી જ મને છૂટો કરી , હવે સતત હું શોધું છું મને જ !
હું ક્યાં છું હવે ? કઈ ખબર જ નૈ મને ! કેવો મસ્ત મજાનો ગૂંચવાણો છું.
હવે શોધશે તું પણ મને ! આસપાસ ચોપાસ પણ હું નૈ મળું ક્યાય તને.
"અનંત" ચાલ હવે રડ નહીં ! તારી ભીતર જો ! હું હજુ ત્યાં જ છુપાણો છું.
"અનંત"
बो बोलते बोलते चुप हों गया फिर हसने लगा अकेला अकेला ...
अज्ञानि आंख बंध करके अभी भी लेटा था ,
मै कभी उन्हें कभी अनंत को देख रहा था ...
अब मैने कागज कलम को टीपॉय पर रखके,
अनंत की पीठ पर हलकासा धब्बा मारते हुवे कहा .. ..
क्या बात है यार आज तो तु बहोत खुश लग रहा है ..
उसने मेरी बात अनसुनी करदी और वो हसता ही रहा ....
मैने अज्ञानि को जगाया यार उठ तो ! देख आज अनंत कितना खुश है ,
और तु उनकी खुशीमे शरिख होने के बजाय आराम से सो रहा है .... ?
अज्ञानि ने धीरे से आंख खोलके मेरे सामने देखते हुवे कहा यार आज वो सुबहसे ..
इस तरह अपनी मस्तीमे बडबडाता है और हस रहा है ...
सायद आज फिर उसे दौरा पड़ा है पागलपन का...
अब जाके अनंत कुछ बोला अरे परिया तु कब आया ?
और फिर हस्ते हस्ते .. यारा कैसे दोस्त हों तुम..
आज जब मै होश में आया हु तो आप कहेते और समजते हों की
मुझे पागलपन का दौरा पड़ा है ...!
मुझे पागलपन का दौरा पड़ा है ...!
मैने कहा और नहीं तो क्या ! जबसे मै आया हु तबसे देख रहा हु ....
तु दिए के सामने देखके कुछ बडबडा रहा हें , और हस रहा है ....
यहाँ तक तु खुद में खो गया था की मै अंदर आके तेरे सामने बैठ गया और तुजे पता तक नहीं .
देख तु जो बडबडाया वो सब मैने लिख भी लिया है,
मेने उसके सामने वो कागज़ धरते हुवे कहा.
ठीक है ठीक है , तुजे लिखना था लिख लिया अब इसे तु अपने पास ही रख ...
अनंत खुर्शी से उठ कर पुरे रूम में जुमते घुमते चक्कर काटते हुवे बोला ...
पर यार आप दोनों गलत समज रहे हों पागलपन ,,,
जब की सच तो ये हें की आज मुझे होश आ गया है...
अज्ञानि बोला फिर तु अकेला अकेला हस रहा था वो क्या था .?
मेरी आँखे भले ही बंध थी पर फिर भी में कबसे तेरी हरकत देख रहा था . अब बता ..
अनंत फिर हस्ते हस्ते बोला अरे यार कैसी बात करता है तु हां ?
क्या अकेलेमे सिर्फ रोया ही जाता है ?
गर कभी किसी बात पे हसी आये तो अकेले में हँसा नहीं जा शकता ?
मै और अज्ञानि एक दुसरेके सामने देखते हुवे दोनों साथ साथ बोल उठे ...
यार अनंत तेरी बात तो बिलकुल सही है ...
ठीक है ठीक है चल अब चाय निकाल ...
मै चायकी पियाली भरने लगा .
अनंत फिर चक्कर काटते हुवे बडबडाने लगा ...
जानता हु , में सब जानता हु पर अब कुछ बोलूँगा नहीं ...
अपना सर झटकते हुवे
नहीं हर्गिझ नहीं बोलूँगा.
हां पर में जानता जरुर हु...
ये दुनिया तो देखो कितनी अजीब है ,
रोये तो रोने पर सवाल.
हसे तो हसने पर बबाल.
"अनंत" चुप रहे तो भी हंगामा.
कमाल हें रे दुनिया कमाल.
अनंत के मुसे निकली हुई बात सीधी मेरे दिलसे टकराई ...
चायकी पियाली भरना छोड मैने जल्दीसे वो जो बोला लिख लिया ..
फिर में उनके पीछे पीछे ही चलने लगा क्युकी वो बहोत धीरेसे बोल रहा था .
फिर वो चलते चलते एक उंगली अपने गालो से टकराता हुवा बोला .
अभी तो आधा सच बोले और इतना हंगामा .
"अनंत" पूरा सच बोलेगे तो जाने क्या क्या होगा.
मेरे रोने पर तुने आंसु बहाए आज जब मुश्कुराया तो तु परेशा क्यों हुई.
अरे भई मेरी हसी को समज पाना तेरे बसकी बात नहीं उनमे भी कही...
इतना बोल के वो अटक गया ,,,
वो जितना बोला मैने उतना ही लिख लिया...
अब अज्ञानि खड़ा हुवा और अनंत को पकडके खुर्शी पर बिठा दिया ..
मुझे अज्ञानि पर गुस्सा आया और मैने गुस्से से ही उसे कहा ,
क्या यार तु भी अच्छा खाशा माहोल बना था ...
अज्ञानि भी धीरेसे हल्के गुस्से में बोला ..
अरे यार तु जानता नहीं इन्हें पूरा का पूरा नौटंकी है ये ..
साला इनकी वजेसे आज चाय भी ठंडी पीनी पड़ेगी ,
चल चल अब जल्दी चाय भर ..
मैने चाय भरते हुवे कहा ...
अरे पर शेर कितने गरमा गरम थे यार ....
सिनेमे जलन पैदा करदे ऐसे शेर बोले हें उसने और तुजे चाय की फिकर पड़ी है.
अग्यानिसे बाते करते करते मैने चाय की पियाली भर दी ..
एक मैने एक अज्ञानि ने उठाई
अनंत अब भी अपनी ही मस्ती मै लिन था ...
अज्ञानि ने अनंत से कहा चल बे नौटंकी अपनी चाय उठा ..
अनंत अपनी पियाली उठा कर फिर खड़ा होके चलने लगा चलते चलते ही.
चायकी चुस्की भरने लगा ...
चाय पीते पीते अग्यानिने अनंत से कहा, अनंत कबतक यु किसी गैरका दिल दुखायेगा .
साला नरकमे जायेगा नरकमे...
अनंत चलते चलते थम गया अज्ञानि की और मुह घुमाते हुवे व्यंग में बोला ..
अच्छा ... भई वाह क्या कहेना अज्ञानि तेरि अक्कल का..
इससे बड़ा नर्क और कोई हों भी शकता है क्या ?
वैसे मुझे तो ये नर्क भी सवर्ग से कम नहीं लगता ...
इतना बोलके वो फिर चलने लगा और जोरसे चाय की,
चुस्की मारते हुवे कुछ बोलने ही जा रहा था की . मैने उसे रोका ,
बस अब आज और कुछ ना बोलना मुझे नींद आ रही है ..
इसलिए में लिख ना पाउँगा ..
में चलता हु तुम भी सो जावो ....
अज्ञानि बोला अच्छा किया परिया तुने समजदारी से काम लिया वर्ना ..
ये खुद जागता और मुझे भी सोने नहीं देता ....
अनंत गुस्स्सा हुवा और बोला अरे भई जावो जावो ऊँघनसी सो जावो ,
तुम दोनों..... तुम्हे कौन कहेता है जागने को ..
पर मेरी फिकर ना करो में तो जागते जागते ही सो लूँगा ....
मैने कहा हां भई हां तुजे जो करना है कर मै तो चला ..
अग्यानिसे विदा लेके कम्बल ओढ़के में खंडर से बहार निकल गया ....

ભટકું છુ, રખડુ છું, શોધુ છું, ગુંચવાઉ છું
ReplyDeleteઆ તુંજ છે કે મારૂ પ્રતિબિંબ જોઈ છેતરાઉ છું?
ભટ્કતી નાવ ને દિવાબત્તી ની ગરજ
રણ માં જેમ મિટે મૃગજળ થી તરસ
સંસાર-વનમાં જેમ ભોમિયા નો સંગાથ
મને હુંફ આપે તારા શબ્દો નો બાથ
તારા માં મળતી મને મારી ઓળખ
'હું' પણુ છુપાવતી,હું ખુદ થી છેતરાઉ છું..
ओह कितने सालो बाद ...
ReplyDeleteઅરે ભૈ કેકલી વાર કહેવું કે મારુ કશુજ નથી ...!
આ શબ્દો મારા ભાઈબંધ અનંત ના છે ...!
કેમ ..? સમજતી નથી...!?
જો કે હવે તો તમે પણ નારાજ થઈ ગયા છો મારાથી હું જાણું છું..!