आज मै बड़ा बैचेन था जाने क्यो ?
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे अनंत को आज कोई तकलीफ हो रही हो.
मै बिना नहाये धोए जल्दीसे चाय लेकर भागा भागा सा चला महोले की और .
घर से बहार निकलके कुछ दूर चलते ठंड ने मुझे चारो और से घेर लिया .
जल्दी जल्दी में मै कम्बल ओढना भी भूल गया .
ठंड्मे थर थराता आखिर में पहोंच ही गया उसी जगह जहा रोज आया जाया करता था .
भीतर गया , जाके देखा, तो आज दो खुर्शी खाली थी.
अज्ञानी भी कुछ उदास लग रहा था ,
वो रोज की तरहा आव आव परिया आ गया तु.
ऐसा कुछ भी ना बोला मैने उसे पूछा क्यों क्या हुवा ?
और अनंत किधर गया .?
उसने बिना कुछ बोले कोने की तरफ उंगली का इशारा किया .
मैने देखा की अनंत गुमसुम सा कोने में बेठा था.
मै गभरा गया मेरा डर सही निकला , मै परेशा होते हुवे बोला.
अरे कोई बताएगा मुझे आखिर हुवा क्या है ?
दोनों मेसे कोई कुछ नहीं बोला .
मै अनंत के पास गया वो सर जुकाए कोनेमे बैठा था.
मैने उसे कंधेसे हिलाते हुवे प्यारसे पूछा,
अनंत ऐ.. अनंत क्यु आज यु उदास हो के कोने में बैठे है तु.?
उसने अपना सर तक ऊँचा नहीं किया,
मै ने अज्ञानी की तरफ देखके उसे पूछा यार तु तो बता आखिर बात क्या है ?
क्यु आज आप दोनों यु चुप चाप उदास हो के बैठे हो ... ?
कोई कुछ नहीं बोला .
मै रो पड़ा रोते हुवे मैने कहा यारो कुछ तो बोलो कोई तो बतावो आखिर बात क्या है ?
मैने अनंत के पास बैठके उसे फिर कंधेसे हिलाया और पूछा ऐ यारा कुछ तो बोल ,
क्या हुवा है तुजे ? किसने दुभाया है तुजे बता , बताना या.... र ! में अपना रोना रोक नहीं पा रहा था .
मैने अपने दोनों हाथो से अनंत का चहेरा ऊपर किया वो पहेलेसे ही चुप चाप रो रहा था .
और फिर मेरे कंधे पे सर रख के जोरसे रो पड़ा.
अज्ञानी भी हमारे पास आ गया हम दोनों को गले लगाके वो भी रोने लगा .
मैने रोते हुवे ही पूछा यार कुछ तो बोलो आखिर हुवा क्या है.?
अनंत रोते हुवे मेरे सामने देख के बोला परिया क्या बताऊ में तुजे ,
आज फिर हमारी वजह से किसीको तकलीफ हुई है ,
अनंत पूरा का पूरा कांप रहा था और कांपते हुवे लबोसे वो मुझे कहने लगा ,
तुजे बोला था ना परिया हमें किसीसे ना मिला , हमसे जुड़ने वाला रोयेगा ही रोयेगा ,
और फिर हमें भी रुलाएगा , पर तु नहीं माना जाने क्यु तुने मुझे किसी अन्जान से मिलाया .
उसका रोना रुक नहीं रहा था अज्ञानी और मेरी आँखे भी रो रही थी .
अनंत ने रोते हुवे कहा परिया गलती हुई बहोत बड़ी गलती .
बस यही वजह हें परिया की हम बार बार मरके,
यहाँ ज़िंदा हें इस कोने में. बात हमारी कोई समज नहीं पाता .
ऐसा ही हर किसीको लगता है.
हर किसीको हमारे मुह से वो सुनना है जो उसे पसंद हें जो उसकी सौच के मुताबिक़ है .
अरे हम, तु, कौन होता है परिया किसीका दुःख कम करने वाला.
या किसी अन्जान का दुःख बांटने वाला बोल परिया बोल ,
आज तेरे कारण हम बदनाम हुवे है हमपे इल्जाम लगे है .
जब की हम ने जो कहा खुद को कहा तुजको कहा है .
हमें क्या जरुरत किसीको कहेने समजाने की
हमारी वजह से कोई रोया है , वो कुसुर वार हे या बे कुशुर, उसने सही किया या गलत,
उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं,
क्सिकी इन सारी बातोका न्याय करनेका, सलाह देनेका तुजे क्या हक्क बनता है ,?
अनंत रोते हुवे चिल्ला उठा.
हम अगर किसीको सुख नहीं दे शकते तो हमें किसीको दुःख देने का भी !
कोई हक्क नहीं बना परिया कोई हक्क नहीं बनता ....
मैने रोते हुवे कहा पर में क्या करू अनंत कोई हमसे अपनी मरजी के मुताबिक उम्मीद रखे तो,
अज्ञानी खुदको थोडा संभालते हुवे बोला ,
समज छोटी पड़ गई किसी ना किसी की परेश ...
और कुछ नहीं .
किसी ना किसी की सौच छोटी पड़ गई.
सच था हाथी , हाथी सच था ,पर
किसीने सुंढ किसी ने पूछ.पकड़ी.
और फिर हाथी तो रहा ही नहीं.
रहे गया एक खंभा और ईक रस्सी.
अनंत को समजाते हुवे अज्ञानी ने कहा.
अनंत तु सच्चा है पर कच्चा है.
मेरे ख़याल से अभी भी तु बच्चा हें.
तु मिलावट नहीं करता, ये तेरी गलती हें.
तु जो देखता है बस वो ही लिखता है.
भीतर का अर्थ कोई नहीं देखता पढता.
इस लिए समज नहीं पाते तुने जो लिखा है.
अज्ञानी की बात सुनके में पूरा का पूरा कांप गया.
मेंरी समज में कुछ नहीं आता था मेरा सर चकराने लगा .
मै सायद कुछ बड़ी गलती कर बैठा , मै सायद ....
पर अब में क्या करू ?
अनंत की आँखे अभी भी भीगी थी पर थोडा संभलके,
उसने मेरे कंध पर हाथ रखते हुवे कहा .
परेश होगा कुछ हिसाब नया पुराना,
वर्ना कोई अन्जान हमसे दुखी ना होता और ना हम आज यु रोते.
हो शकता है कभी हमने किसीको बे वजा परेशान किया हो,
और उस भूल की ये सजा हो .
अब हमें ये नहीं सौचना कौन सही कौन गलत ,
और फिर हो या ना हो गलती हमारी हम स्वीकार फिर भी करते है,
की गलत हम थे ,
अनंत ने रोते हुवे कहा .
बस अब आज के बाद हम किसीको नहीं मिलेंगे.
और तु भी अब कभी भी ..!
भूले से हमें इस खंडर से बहार निकालने का प्रयास ना करना ,
हमें यु गुमनामी के अँधेरे में ही रहेने दो...
बस हमें अँधेरे में ही रहेने दो...
मेरी आँखे फिर भर आई रोते हुवे मैने अनंत से कहा
हां यारा हां में समज गया सब समज गया .
आज के बाद कभी भी ऐसी गलती ना करुगा .
तुजे तो क्या अब में भी कही बहार ना जाऊँगा अनंत !
अब में भी यहाँ तुम दोनों के साथ ही रहूँगा ,
आज से मेरा मन भी उठ गया है ,
अब में तुमको छोडके कही ना जाऊँगा आज के बाद .
यही रहूँगा इस खंडर में तुम्हारे साथ तुम्हारे पास ...
koi yeh kesay bataye k wo tanha kion hai
wo jo apna tha wohi aur kesi ka kion hai
yahi duniya hai tuo phir esi yah duniya kion haiii
yahi hota hai tuo akhir yahi hota kion hai
ek zara hath badra dain tuo pakar lain daman
os kay senay main sama jay humari darkan
itni qurbat hai tuo phir fasla itna kion hai
dil-a-barbad sey nikla nahi ab tak koi
i k lotey ghar pay diya karta hai dastak koi
as jo tot gai phir sey bandhata kion hai
tum musarat ka kaho ya esay gham ka rishta
kahtay hain pyar ka rishta hai janam ka rishta,
hai agar janam ka jo yah rishta tuo badlata kion hai
https://youtu.be/wrydKesTXNA?si=sbijhYz9L5DQvB3l
Aaj Rootha huwa ik dost bohot yaad aaya
Acha guzra huwa kuch waqt bahut yaad aaya.
Meri aankho k her ik ashk pe ronay wala
Aaj jab aankh yeh roee tu bohot yaad aaya.
Jo mere dard ko seene main chupa laita tha
aj jab dard huwa mujh ko bohut yaad aaya.
Jo meri aankh main kajal ki tara rehta tha
aaj kajal jo lagaya tu bohut yaad aaya.
Jo mere dil k tha qareeb faqat us ko hi
aaj jab dil nay bulaya tu bohut yaad aaya.
Mere jeevan ki her khushi main wohi tha bus.....
aaj jab yaad woh aaya tu bohot yaad aaya ....
mere dost tu bahut yaad aaya ...
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे अनंत को आज कोई तकलीफ हो रही हो.
मै बिना नहाये धोए जल्दीसे चाय लेकर भागा भागा सा चला महोले की और .
घर से बहार निकलके कुछ दूर चलते ठंड ने मुझे चारो और से घेर लिया .
जल्दी जल्दी में मै कम्बल ओढना भी भूल गया .
ठंड्मे थर थराता आखिर में पहोंच ही गया उसी जगह जहा रोज आया जाया करता था .
भीतर गया , जाके देखा, तो आज दो खुर्शी खाली थी.
अज्ञानी भी कुछ उदास लग रहा था ,
वो रोज की तरहा आव आव परिया आ गया तु.
ऐसा कुछ भी ना बोला मैने उसे पूछा क्यों क्या हुवा ?
और अनंत किधर गया .?
उसने बिना कुछ बोले कोने की तरफ उंगली का इशारा किया .
मैने देखा की अनंत गुमसुम सा कोने में बेठा था.
मै गभरा गया मेरा डर सही निकला , मै परेशा होते हुवे बोला.
अरे कोई बताएगा मुझे आखिर हुवा क्या है ?
दोनों मेसे कोई कुछ नहीं बोला .
मै अनंत के पास गया वो सर जुकाए कोनेमे बैठा था.
मैने उसे कंधेसे हिलाते हुवे प्यारसे पूछा,
अनंत ऐ.. अनंत क्यु आज यु उदास हो के कोने में बैठे है तु.?
उसने अपना सर तक ऊँचा नहीं किया,
मै ने अज्ञानी की तरफ देखके उसे पूछा यार तु तो बता आखिर बात क्या है ?
क्यु आज आप दोनों यु चुप चाप उदास हो के बैठे हो ... ?
कोई कुछ नहीं बोला .
मै रो पड़ा रोते हुवे मैने कहा यारो कुछ तो बोलो कोई तो बतावो आखिर बात क्या है ?
मैने अनंत के पास बैठके उसे फिर कंधेसे हिलाया और पूछा ऐ यारा कुछ तो बोल ,
क्या हुवा है तुजे ? किसने दुभाया है तुजे बता , बताना या.... र ! में अपना रोना रोक नहीं पा रहा था .
मैने अपने दोनों हाथो से अनंत का चहेरा ऊपर किया वो पहेलेसे ही चुप चाप रो रहा था .
और फिर मेरे कंधे पे सर रख के जोरसे रो पड़ा.
अज्ञानी भी हमारे पास आ गया हम दोनों को गले लगाके वो भी रोने लगा .
मैने रोते हुवे ही पूछा यार कुछ तो बोलो आखिर हुवा क्या है.?
अनंत रोते हुवे मेरे सामने देख के बोला परिया क्या बताऊ में तुजे ,
आज फिर हमारी वजह से किसीको तकलीफ हुई है ,
अनंत पूरा का पूरा कांप रहा था और कांपते हुवे लबोसे वो मुझे कहने लगा ,
तुजे बोला था ना परिया हमें किसीसे ना मिला , हमसे जुड़ने वाला रोयेगा ही रोयेगा ,
और फिर हमें भी रुलाएगा , पर तु नहीं माना जाने क्यु तुने मुझे किसी अन्जान से मिलाया .
उसका रोना रुक नहीं रहा था अज्ञानी और मेरी आँखे भी रो रही थी .
अनंत ने रोते हुवे कहा परिया गलती हुई बहोत बड़ी गलती .
बस यही वजह हें परिया की हम बार बार मरके,
यहाँ ज़िंदा हें इस कोने में. बात हमारी कोई समज नहीं पाता .
ऐसा ही हर किसीको लगता है.
हर किसीको हमारे मुह से वो सुनना है जो उसे पसंद हें जो उसकी सौच के मुताबिक़ है .
अरे हम, तु, कौन होता है परिया किसीका दुःख कम करने वाला.
या किसी अन्जान का दुःख बांटने वाला बोल परिया बोल ,
आज तेरे कारण हम बदनाम हुवे है हमपे इल्जाम लगे है .
जब की हम ने जो कहा खुद को कहा तुजको कहा है .
हमें क्या जरुरत किसीको कहेने समजाने की
हमारी वजह से कोई रोया है , वो कुसुर वार हे या बे कुशुर, उसने सही किया या गलत,
उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं,
क्सिकी इन सारी बातोका न्याय करनेका, सलाह देनेका तुजे क्या हक्क बनता है ,?
अनंत रोते हुवे चिल्ला उठा.
हम अगर किसीको सुख नहीं दे शकते तो हमें किसीको दुःख देने का भी !
कोई हक्क नहीं बना परिया कोई हक्क नहीं बनता ....
मैने रोते हुवे कहा पर में क्या करू अनंत कोई हमसे अपनी मरजी के मुताबिक उम्मीद रखे तो,
अज्ञानी खुदको थोडा संभालते हुवे बोला ,
समज छोटी पड़ गई किसी ना किसी की परेश ...
और कुछ नहीं .
किसी ना किसी की सौच छोटी पड़ गई.
सच था हाथी , हाथी सच था ,पर
किसीने सुंढ किसी ने पूछ.पकड़ी.
और फिर हाथी तो रहा ही नहीं.
रहे गया एक खंभा और ईक रस्सी.
अनंत को समजाते हुवे अज्ञानी ने कहा.
अनंत तु सच्चा है पर कच्चा है.
मेरे ख़याल से अभी भी तु बच्चा हें.
तु मिलावट नहीं करता, ये तेरी गलती हें.
तु जो देखता है बस वो ही लिखता है.
भीतर का अर्थ कोई नहीं देखता पढता.
इस लिए समज नहीं पाते तुने जो लिखा है.
अज्ञानी की बात सुनके में पूरा का पूरा कांप गया.
मेंरी समज में कुछ नहीं आता था मेरा सर चकराने लगा .
मै सायद कुछ बड़ी गलती कर बैठा , मै सायद ....
पर अब में क्या करू ?
अनंत की आँखे अभी भी भीगी थी पर थोडा संभलके,
उसने मेरे कंध पर हाथ रखते हुवे कहा .
परेश होगा कुछ हिसाब नया पुराना,
वर्ना कोई अन्जान हमसे दुखी ना होता और ना हम आज यु रोते.
हो शकता है कभी हमने किसीको बे वजा परेशान किया हो,
और उस भूल की ये सजा हो .
अब हमें ये नहीं सौचना कौन सही कौन गलत ,
और फिर हो या ना हो गलती हमारी हम स्वीकार फिर भी करते है,
की गलत हम थे ,
अनंत ने रोते हुवे कहा .
बस अब आज के बाद हम किसीको नहीं मिलेंगे.
और तु भी अब कभी भी ..!
भूले से हमें इस खंडर से बहार निकालने का प्रयास ना करना ,
हमें यु गुमनामी के अँधेरे में ही रहेने दो...
बस हमें अँधेरे में ही रहेने दो...
मेरी आँखे फिर भर आई रोते हुवे मैने अनंत से कहा
हां यारा हां में समज गया सब समज गया .
आज के बाद कभी भी ऐसी गलती ना करुगा .
तुजे तो क्या अब में भी कही बहार ना जाऊँगा अनंत !
अब में भी यहाँ तुम दोनों के साथ ही रहूँगा ,
आज से मेरा मन भी उठ गया है ,
अब में तुमको छोडके कही ना जाऊँगा आज के बाद .
यही रहूँगा इस खंडर में तुम्हारे साथ तुम्हारे पास ...
https://youtu.be/UByuXScv3CA?si=gl1cS24y30PQdfxL
wo jo apna tha wohi aur kesi ka kion hai
yahi duniya hai tuo phir esi yah duniya kion haiii
yahi hota hai tuo akhir yahi hota kion hai
ek zara hath badra dain tuo pakar lain daman
os kay senay main sama jay humari darkan
itni qurbat hai tuo phir fasla itna kion hai
dil-a-barbad sey nikla nahi ab tak koi
i k lotey ghar pay diya karta hai dastak koi
as jo tot gai phir sey bandhata kion hai
tum musarat ka kaho ya esay gham ka rishta
kahtay hain pyar ka rishta hai janam ka rishta,
hai agar janam ka jo yah rishta tuo badlata kion hai
https://youtu.be/wrydKesTXNA?si=sbijhYz9L5DQvB3l
Aaj Rootha huwa ik dost bohot yaad aaya
Acha guzra huwa kuch waqt bahut yaad aaya.
Meri aankho k her ik ashk pe ronay wala
Aaj jab aankh yeh roee tu bohot yaad aaya.
Jo mere dard ko seene main chupa laita tha
aj jab dard huwa mujh ko bohut yaad aaya.
Jo meri aankh main kajal ki tara rehta tha
aaj kajal jo lagaya tu bohut yaad aaya.
Jo mere dil k tha qareeb faqat us ko hi
aaj jab dil nay bulaya tu bohut yaad aaya.
Mere jeevan ki her khushi main wohi tha bus.....
aaj jab yaad woh aaya tu bohot yaad aaya ....
mere dost tu bahut yaad aaya ...
.jpg)
ReplyDeleteजी..
आप से मै क्या कहु ?
आज मै कई सालो बाद बोल रही हुँ ..
कोइ गलती हो जाये तो माफी चाहती हुँ..
जो कुछ इन दिनों हो गया...इतनि सारी गलत फेह्मयाँ, सब उसके उतावले स्वभाव के कारण हैं. आप कतई बुरा ना मानियेगा.
और फिर उसके दिल में कुछ भी गलत नही..
उसका स्वभाव कुछ ऐस है कि..
झख्मों से भरा सिना है मेरा , हस्ती है मगर ये मस्त नझर..
इसकि वजह से सब उसे अपने अपने नझरिये से देख्ते है.
हाँ वह खुद आप के पास चल के आई...आपने नहि बुलाया..
आप ने तो आगाह भी किया, पर वोह सिर्फ मेरे लिये आई...
मैं सदियों से तन्हा यहाँ बैठी हुँ....और उसे अनन्त आप मैं, मेरी झलक दिखाई दी..
सच भी है...आशा अनन्त हैं....
और अनन्त आशा हैं..
अनन्त आकाश में अनन्त आशा है..
पर उसने ऐसा नही करना चहिये था...हम दोनो को मिलाने मे, उसकी और आपके दोस्त परिया की तु तु मैं मैं हो गयी...और होती चली गयी..
अब सब सुनिये ः-
और हम दोनो क सच सुनिये
हम दोनो कभी एक हुअ करती थी...एक जिस्म तो एक जान
वोह शरीर मेरा तो मै रुह उसकी..
उसकी हरकतो कि वजह से मुझे बडी तक्लिफ होने लगि...वह बहुत अजीब थी
ab suniye uski zubani.....
"मेरे पास सब कुछ है...हमेशां से रहा है...कोई झरुरत नही....फिर भि एक अधुरप...रुहानी अधुरप.....जो कई बार...बार बार...हर बार
पुरी करने की कोशिश में...मैं उलझ्ती गयी....कोई आता सुलझाने कि कोशिश करती...और उलझ जाती..
ये सिलसिला लम्बा चला...हर बार ठोकर से सिखने के बदले मैं और बडी गलतियाँ करने लगी..
मुर्ख ..मुर्ख होते है कुछ लोग...महा मुर्ख...
आशा ने बडा समजाया...
मैं मुर्खता करती चली...वह मुझे छोड गई...
जब तुम से..अनन्त तुम से मैं मिली मुजे आशा बहुत याद आई, उसकी बाते जैसे तुम्हारी झबां से दुबरा सुन रही थी मैं..
मुझे लगा मैं तुमको और आशा को मिला दु. शायद मेरे हाथों एक तो अछा काम हो !!
और इसके लिये...आप तक पहूचने के लिये मैने परिया को सताया
मैने सोचा बस एक बार...तुम दोनो मिलो फिर मैं परिया को कभी तन्ग नही करुन्गी..
पर फिर मेरे साये...मेरे और परिया के बिच आये....
शायद मैं उसे दोस्त भी ना बनती...मुझे नही चहिये था कि मेरे साये अब मुझ पर या किसि पर भी आये...जैसे आशा ने कहा...मैं महा मुर्ख हुँ...
कोइ सफाई नहीं दुँगी..बहुत मैले है मेरे हाथ...
पर अफ्सोस परिया मुझे समज नही पाया..
मेरा उतावलापन...मेरा बावलापन...उसे मैं अजीब लगती..
वह सोचने लगा सब कुछ होते हुए मैं क्युं भटक रही हुं..
परिया दिल क सोना है सोना...पर मुझे समझ्ना शायद मुम्किन नहीं..
पर मुझे अपेक्षा भी नही थी...मुझे सिर्फ तुम दोनो को मिलाना था..
मैं अन्धेरा हुँ, आशा उजाला है..
पर मेरी वजह से अब वोह भी मुझ्से रुठी है..
मैं आप सब की अनन्त, अज्ञानीजी, परेशजी...सब की माफी चाहती हुँ..
मैं अपनी गलतियों के साथ युंही भटकती रहूंगी...
आशा को रब की तलाश है...पर अब उसे कोई दुसरा शरीर ढुंढंना होगा शायद >>
मैं आप से येही मदद चाहती थी...
शरिर की गलतियो की सझा रुह को ना मिले..
मैं कतई उस पिंजरे के करीब भी नही आउंगी...मुझे पता है वहाँ सिर्फ रुह को प्रवेश है...
मुझे मेरे हाल पे रेह्ना होगा...
पर ये आशा...ये रुह कुछ ढुढं रही थी मेरे झरिये...
.पर अब उसे कोई दुसरा शरीर ढुंढंना होगा शायद >>
khandar dekh kar muje laga ki yehi aasha ki sahi khoj ka ant hoga.."
main maha murkh !!
आपकी ये लाइन रूह को छु गई...
ReplyDelete.>>>अनन्त आकाश में अनन्त आशा है..<<<)
निराश ना हो, बस धीरज धरो .....
जैसे आकाश अनंत है . वैसे ही आशा अमर है....
गलतिय हो जाती है ....
मगर जब कभी गलतिय हो जाती है.
तो सुधारनेका मौका भी दे जाती है.
बस इस मौके का पूरा फायदा उठावो ....
ये तुम्हारे हाथ मै है ...
हाथ मेला होना कोई पाप नहीं...
बस ह्रदय साफ़ होना चाहिए....
दिल साफ़ तो सारा गुनाह माफ.....
फिर ये भी सच है .....
चाहे कितना भी बुरा इंसान हो ...
कई ना कई उनमे अच्छा इंसान छुपा ही होता है...
बुरा कोई पैदा नहीं होता ....
हालत कभी कभी अच्छे भले इंसान को बुरा बना देती है....
"अज्ञानि" ने लिखा है ...
"अज्ञानि" यहां सब हालत के मारे है .
जो अपने घर से तंग आया साधू बन गया ...
जो जगसे तंग आ गया वो डाकू बन गया ...
बाकी सारा हिसाब हें ,
कुछ नया है .
कुछ पुराना हें.
:)
जाने कैसे कैसे भरम पाल लेते हे लोग .....
ReplyDeleteयाद रहे... में सिर्फ और सिर्फ Katira Paresh हु....