वर्षों पहेले उसने लिखी थी ये गझल ...
रूबरू ......
ऐसे रूह से रूह मिले.
जैसे हम रुब रु मिले.
“अनंत” छु भी ना शके
जाने हम क्यु यु मिले ?
इस कदर जाने हम क्यु मिले.
कभी खुशी तो कभी आंसु मिले.
जैसे कभी जुदा न थे हम तुम.
मिले जो तुम और हम यु मिले.
दोनों की एक सी आरजू मिले.
जब की कभी ना रुब रु मिले .
हम जब भी मिले रूह रूह मिले.
फिर भी कुछ ऐसी गुफ्त गु चले.
“अनंत” दोनों सोचे तो ये सोचे की,
अब की मिले तो तु ही तु मिले.
"अनंत"
ऐसे रूह से रूह मिले.
जैसे हम रुब रु मिले.

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ReplyDeletejee yahan jaayega !!