" मांग्या पहेला आपवु ए महा मुर्खता छे !"
समय पहेला व्रुक्ष पर फल कदि पाकतु नथी !
"अज्ञानी" काचु फल कदि मीठाश आपतु नथी !
"अज्ञानी"
जी हां ! वर्शो पहेला...
मारी मुर्खता पर मंद मंद हसता हसता...
आ,शब्दो,मने ! अज्ञानी ए कह्या हता !
अने त्यारे.....
रात्रीना अंघकारमा, दीवाना आछा प्रकाशमा ...
अनंतनो चहेरो चमकी उठ्यो ...!
रातना अंघकारमा, अंतरना उजासमा,
वच्चे तूटेल फुटेल टीपोयनी आसपास गोठवेली,
झरजर्रीत खुरसी पर ,
सामसामे अमे त्रणेय चायनी पीयाली भरी,
अमारी अलौकीक मस्तीमा बेठा हता.
सुरुरररर... करती चायनी चुसकी भरी,
वच्चे पडेली टीपोय पर पग लंबावता...
अनंत बोल्यो..
...अने,...,
जेम पेटनी क्षमताथी अघीक ...
जो कोई जमी जाय तो जेवी दशा थाय !
अस्सल एवीज दशा थाय !!!
औकात थी वघु जो कोइने मली जाय के,
आपवामा आवे तो !
या तो अपचो थाय !, या तो ओकी जाय !,( यानी उल्टी)
या, तो!! छी.छी.. छी...(आर्थात:- झाळआ )..:)
अने पछी...
अनंत अने अज्ञानी बंने मारी सामे जोईने,
मर्मालु हसवा मांड्या...
हु धोधानी जेम एनी सामे जोतो रह्यो...
वातावरणमा थोडी वार सन्नाटो छवाई गयो...
वर्षो पहेला...:)
*ब्लास्ट*
"अज्ञानी" मुज आत्मा मही जे जे वात गुंजी छे !
ए आजनी नथी ! आ मारा म्रुत्यु पछीनी पुंजी छे !
"अज्ञानी"

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