में अनंत और अज्ञानी अकसर यहा खंडर पर आकर ,
जब भी जी चाहे , आधी रात के बाद, फिर रात भर...
बहोत सारी बाते करते थे .
"यहा का मतलब इस जगह तीसरे विश्वमे नहीं !
बल्की इस खंडर पर ऊपर जो खंडर जेसा घर हे वहा पर ...
हम बहोत साल पहेले मिला करते थे .. "
अब मगर वो नहीं ! है !
दूर बहोत दूर चले गए हे वो दोनों मुजको अकेला छोड़ कर...
लेकिन फिर भी आज में अकेला नहीं हु .
क्योकि ...
क्योकि ...
उस वक्त रातो में जो बाते हमारे बिच होती थी !
वो, उनकी सारी बाते और बहोत सारी यादे ....
आज भी मेरे मनमे ,मेरे झेहन में गूंजती है ...
आज भी मेरे मनमे ,मेरे झेहन में गूंजती है ...
अब जब वो दोनों नहीं है ..
फिर भी रूह से उन दोनों को सामने पाके
फिर भी रूह से उन दोनों को सामने पाके
उनकी बाते उनकी यादे ..
उन्ही की याद में अकसर में दोहराता हु !
बस इससे ज्यादा कुछ और आज मुझे नहीं कहेना ...
जाते जाते " अनंत " की एक रचना ..
इसके पीछे भी छिपी है एक घटना ...
जिसमे उस वक्त उन दोनों के बिच जो बाते हुई थी
और दोनोने मिलकर मुझे इस रचना का मर्म समजाया था ...
लेकिन...
वो कहानी फिर कभी.....
“अधुरा "अनंत” अधुरा"
पूरा होने में कोई मजा नहीं ...
होना पूरा, हे सजा वही ...
होना बुरा अच्छा नहीं ...
होना पूरा अच्छा नहीं ...
थोड़े थोड़े अधूरे भी कभी रहा करो ...
पूरा भरो कभी तो कभी थोडा बहा करो...
क्योकी ...
भरा हो जो बर्तन पूरा तो उसमे और जाता नहीं ...
छलकते मटकेमें थोड़ासा भी पानी और समाता नहीं ...
तभी तो में अधुरा हु तुम थोडा थोडा भरा करो...
थोडा थोडा भरा करो तो थोडा खाली भी किया करो ...
मर जावोगे ! गर पुरे के पुरे तुम भर जावोगे ...
“अनंत” जब कोई और डालना चाहेगा, तुम किधर जावोगे ...
भरे रहेने से क्या होगा आखिर थोडा खाली हो कर जिया करो...
भरे रहेने से क्या होगा आखिर थोडा खाली हो कर जिया करो...
थोड़े भरे तो थोड़े अधूरे भी रहा करो ...
गर पूरा भरो भी तो कभी थोडा बहा करो...
"अनंत"
ब्लास्ट :-
अकसर ऐसा क्यों होता है क्या खबर .
एक आदमी जब रूबरू होता है,
तब उसे कोई जानता नहीं, चाहता नहीं,
पहेचानता ही नहीं ! फिर "अनंत"
वो जब कही दूर तलक गुमनाम हो जाता है
तब उसे लोग ढूंढने निकल पड़ते हे दर बदर.
जब वो सच कहेता था सामने रहेकर
तब कोई मानता ही उनकी बातो को !
इशारों इशारों में वो समजाये फिर भी !
ना समजे कोई उनके इरादों को ..!
और फिर जब वो कही दूर चला जाता हे बाद उसके ,
सब को सब कुछ समजमे आता , और फिर तो उसे मानने वाले,
चाहने वाले, पहेचानने वाले और कोई रात भर जागता हे
उनके जेसे की इन्सान की तमन्ना ले कर .
"अनंत"
ब्लास्ट :-
अकसर ऐसा क्यों होता है क्या खबर .
एक आदमी जब रूबरू होता है,
तब उसे कोई जानता नहीं, चाहता नहीं,
पहेचानता ही नहीं ! फिर "अनंत"
वो जब कही दूर तलक गुमनाम हो जाता है
तब उसे लोग ढूंढने निकल पड़ते हे दर बदर.
जब वो सच कहेता था सामने रहेकर
तब कोई मानता ही उनकी बातो को !
इशारों इशारों में वो समजाये फिर भी !
ना समजे कोई उनके इरादों को ..!
और फिर जब वो कही दूर चला जाता हे बाद उसके ,
सब को सब कुछ समजमे आता , और फिर तो उसे मानने वाले,
चाहने वाले, पहेचानने वाले और कोई रात भर जागता हे
उनके जेसे की इन्सान की तमन्ना ले कर .
"अनंत"



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