Friday, 13 May 2016

और कुछ नहीं था पास हमारे ....



और कुछ नहीं था पास हमारे .  
बे मतलब की बातो के सिवा ..

और कुछ भी नहीं हे आज भी  ! "अनंत" 
बे मतलब की यादो के सिवा ...

"अनंत"
हमारे तीनो के बिच फिर रात भर बे मतलब की बाते होती रहेती थी ... 

ख्श्बुदार अगर बती की सुवास ... 
टिमटिमाता हुवा दिए का उजास ...

और कोई नहीं हम तीनो के आसपास ... 
खामोशी और एक अलौकिक अहेसास..... 

अपनी अपनी चाय की पियाली तीनो ने उठाली ... 
किसी हँसी के लबो की तरहा होठो से लागाली ... 
फिर एक कस किस की तरहा कसके लगाया ... 
स्वर्ग इसीको कहेते हे अहा बहोत ही मजा आया... 
बाद में अनंत ने आगे चलाया ... 
बातो बातो में उस दिन अनंत बोला .... 

कुछ लोग कुछ,  कुछ,  बहोत कुछ,  समजने की कोशिश में ऊम्र गुजार देते है ... 
और हम कुछ ,कुछ भी नै समजते बिना समजे जीवन और खुद को सवार लेते है.... 

में कुछ समजा नहीं , मेने अनंत से कहा ... 

फिर वो बोला तू भी वही पे आ गया ... 

में फिर उल्जा फिर मेने कहा क्या यार तू भी ! कुछ भी ! 

कुछ लोग तेरी ऐसी बातो से बड़े परेशान हे और कुछ जलते है ... 

फिर  उसने कहा ... 

में तो कुछ भी करता नहीं , भै रहेने दे सब चलता है .. चलने दे... 
सबके भीतर एक आग है सब अपनी आगमे जलते हे .. जलने दे... 

में खुश हु इस बातसे "अनंत" की  

लोग जिस बात को तरसे हे ...
लोग जिस चाह को तरसे हे ... 
"अनंत" वो हमपर निरंतर ....  
 युही बस युही प्यारसे बरसे है... 

बस हम उस बारिस में भीगते हे नहा लेते हे ... 

क्या भला , क्या बुरा , क्या सही  क्या गलत ... 

आखिर मुआमला तो भूख और तरस का है .. 

एक ही जिश्म और भूख अलग अलग ... 
एक ही आत्मा और तरस अलग अलग ...

आखिर तू चाहता क्या है... मेने पूछा अनंत से .... 

वो बोला , जो चाह रहा हु वो मिल रहा हे... 

और चाहना क्या ... 

फिर यही बात को दोहराना क्या ... 

इस जनम में इतना,  कुछ कम तो नहीं ... 

दुःख भी हे लेकिन ये सुख कम तो नही ....  

में सोच में पड़ गया ये अनंत बात को कहा से कहा ले गया ... 

फिर में गुस्साया और बोला यार कुक तो बुज पाए ऐसा बोल ... 

तब जाके अज्ञानी बोला अपनी दाढ़ी पर उंगली घुमाते हुवे .... 

परिया तू गरिया की तरहा घूम जाएगा 
फिर भी तेरी समजमे कुछ नै आएगा 

ये तै हे. 
 और अज्ञानी जब कभी कुछ थोडा समजमे आएगा 

तब तू भी ! हमारी  ही तरहा कही गुम हो जाएगा ... 

बहोत कुछ अधुरा छुटा हे ... 
और बहोत अधुरा छुटना हे ... 

जुडके फिर टूटना "अज्ञानी"
टूट टुटके फिर हमें जुड़ना हे... 

जेसे एक मिट्टी का बर्तन ... 

में कुछ नै समजा सो मेने अज्ञानी के सामने देखा .... 

मेरे बिना बोले वो जैसे सब समज गया .. 

और बोला .. 

कुछ समजा क्या ??? 

परिया ... 

अब तो ये भी  किसीसे नहीं पूछना... 

मेने कहा क्यों ..? 

तो उसने बताया ... 

पूछेगे तो क्या होगा नहीं पूछे तो गया होगा .. 

पूछेगे तो हजारो सवाल उठेंगे ...
हम जवाब देंगे भी तो .. 
फिर जवाबो पर भी सवाल  उठेंगे .. 

और इन साले सवाल-ओ -जवाब में क्यों उल्जे ,
और किसी अजनबी या नबी , को उल्जाये हम ...  

एक दिन सब अपने आप सुलज जाएगा ...  
  
और फिर एक ही जनम की तो बात नहीं ... 

आज नहीं कल ही सही ....

जो आज अधुरा छुटा  कल वो पूरा हो जाएगा .... 

फिर कल कुछ और अधुरा छुटेगा तो ... ? मेने पूछा .. 

तो क्या ये तो हमेशा होता हे ये भी तो होना है ... 

बस ये होते रहेना हे ... 

यही होता आया हे ... 

कुछ अधुरा गर छूटता नहीं तो ... 

छुट जाता ना सब कुछ लेकिन ऐसा होता नहीं ... 

आखिर तक में कुछ नहीं समज पाया आँखे घिरने लगी और में.... 

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