Thursday, 14 July 2016

बर्षो पहेले लिखी हुई अनंतकी गझल ....

जब जब मैने हसना चाहा तब तब मुजे रोना आया . 
हां मेरी जा तुम मेरी और में तुम्हारा हो ना पाया. 

क्या क्या देखे थे हँसी सपने हमने .

पूरा होके रहेगा ये भी कहा था तुमने .

लेकिन फिर ना जाने क्या ऐसी बात हुई .

आखिर तक हमने जो चाहा था हो ना पाया. 

क्या क्या नहीं मिला मुझे जिंदगीसे  

लेकिन जो चाहा था वो ना पाया . 


"अनंत"

No comments:

Post a Comment