Thursday, 18 May 2017

जब अनंत जानता था . सब अनंत जानता था ..!



કેક્લાય વર્ષો પહેલા ... 

અનંતે લખેલા .... 

જુના કબાટમાં પડેલા ... 

ફાટેલા તૂટેલા .. 

અને
ઝર્ઝર્રિત થઇ ચુકેલા... 

અનંત લિખિત કાગળિયાં ... 

ઘણા દિવસો બાદ ફરી આજ

ઉથલાવતાં ...  

મળેલી એક સુફી રચના ... 

देखने वाला वो देखता हे जो तू दिखाता है.
और वो जो दीखता नहीं, वो तो वो भी देखता हे जो तू छिपाता हे.

जो देखता हे वो देखता हे कभी यु ही ,तो कभी तेरे दिखाने पर, 

लेकिन वो जो दीखता नही वो बिना दिखाए देखता हे.

होती हे उसकी हर किसी पे हर किसीकी छोटी छोटी हरकतों पे भी नजर...

जो नहीं करना चाहिए तू वो भी करता हे .

ये सोचके की आखिर कौन देखता हे तू जो भी करता हे , 

ऐसा सोचके रहेता हे गर तू बे फिकर 

तो तेरा ऐसा सोचना की,

कोई देखता नहीं तुजे ,ये बड़ी भूल हे तेरी 

ऐसा तू समजता हे अगर

की कोई तुजे देखता नहीं .

तो समजले तू

जो दीखता नहीं उनकी 

तेरी हर हरकत पर 

होती हे नजर ... 

वो जो तुजे दीखता नहीं 
वो जो कोई देखता नहीं 

वो जो नहीं दीखता हे
वो सब हर कही देखता हे

वो जो तू दिखाता हे वो भी ! 
और जो तू छिपाता हे वो भी !

वो सब जानता है "अनंत"


तू क्यों चाहता हे, तू जो चाहता हे. 
तू क्या चाहता हे, ये वो जानता है .

तू क्यों मांगता हे , तू जो चाहता हे .
तू क्या चाहता हे, ये वो जानता है . 


तब जब अनंत जानता था. जब सब अनंत जानता था ..!
लेकिन कोई जानता न था क्या और कब अनंत जानता था ..!

“अनंत”

वो तो अविनासी हे. 

वो अनंत हे जो सब जानता हे . 

दिखने आखिर क्या क्या देखेगा . 
कम भला और ज्यादा बुरा देखेगा . 

और जब भी देखेगा दिखाने पर . 


"अनंत" वो आधा  अधुरा देखेगा. 

और वोजो दीखता नहीं "अनंत"
वो बिना दिखाए देखेगा .
तू बतायेगा तो भी देखेगा .
और गर तू छुपायेगा तो भी देखेगा .
और "अनंत" वो जो भी देखेगा पूरा देखेगा . 
और उस हिशाब से तुजे सब देगा या 
तुजसे सब लेगा ... 

"अनत"

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