"અનંત"
જ્યારે પોતા પાસે શબ્દો ખૂટતા ત્યારે એ આવા ગીતોનો સહારો લઈ લેતો
અને તેની ચાહીતિને પોતાની મન કે હ્રદયની સ્થિતિ અને વેદના કહી દેતો.
અનંતની સ્થિતિ પણ કૈ આવીજ હતી.
दूर जाने से उसने अपनी चाहिति को ये गीत सुना सुना कर बार बार
ये जताने ,बताने की कौशिश की ,
तू जितना सोचती है उतना अच्छा मै नहीं हु .
मुजमे बहोत सारे अबगुन है..!
और थोड़े जो गुन हे उसे भी तू भुला देना ..
और मनकी किताब से तू मेरा नाम ही मिटा देना ...
वैसे तो वो खुद भी बहोत कुछ लिखता था और खुदके शब्दों के जरिये
अपनी चाहिती को हाले दिल बता ,सुना देता था ..
लेकिन जब कभी उसे ऐसा लगता की मुझे जो कहेना है बया करना हे ..
उनके लिये कई शायारोने पहेले से ही बहोत अच्छा लिखा है और
उसे सुरओ संगीत में अच्छे से ढाला हे तो क्यों ना उन्ही गीतों के जरिये
अपना हाले दिल सुनाया बताया जाए .
और फिर वो बड़ी सिफतसे ऐसे गीतों का सहारा लेके
अपने दिलके हालातो झजबात बया कर देता था ..
जाने से पहेले वो इस गीत के झरिये अपनी बात कहेके ,,
वो बहोत दूर .दूर .निकल गया ...
बहोत ही दूर...
मन की किताब से तू, मेरा नाम ही मिटा देनागुन तो न था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना
मत खेल जल जाएगी, कहती है आग मेरे मन की मत खेल... मत खेल जल जाएगी, कहती है आग मेरे मन की
उनके जाने से पहेले उसे रोकने मंनाने समजाने के वास्ते ,
कोई दूरदूर से उसे ये गीत सुनाती रही लेकिन ...
वो उन सबसे जो जीवनमे आई और गई , और ऐसे अपनोसे
जो कभी अपने हो ना शके और जो अपने थेही नहीं ..!
और आखिरमे खुदसे भी नाराज था ...
इसलिए उसने किसीकी एक ना सुनी और वो ,
दूर...दूर.. सबसे दूर...निकल गया ...
पता नहीं कबसे दूर निकल गया...
और वो ये गीत गाती सुनाती समजाति रही बर्षो तक...
लेकिन ,,
और फिर उस रूठे हुवे को मनाने के लिये , वापस बुलाने के लिये उसे ढूंढने के लिये
कोई दूरदूर से उसे ये गीत सुनाती रही लेकिन ...
वो उन सबसे जो जीवनमे आई और गई , और ऐसे अपनोसे
जो कभी अपने हो ना शके और जो अपने थेही नहीं ..!
और आखिरमे खुदसे भी नाराज था ...
इसलिए उसने किसीकी एक ना सुनी और वो ,
दूर...दूर.. सबसे दूर...निकल गया ...
पता नहीं कबसे दूर निकल गया...
और वो ये गीत गाती सुनाती समजाति रही बर्षो तक...
लेकिन ,,
मेरे महबूब न जा, ना जा ना जा मेरे महबूब न जा, आज की रात न जा होने वाली है सहर, थोड़ी देर और ठहर मेरे महबूब न जा ... १) देख कितना हसीन मौसम है हर तरफ़ इक अजीब आलम है जलवे इस तरह आज निखरे हैं जैसे तारे ज़मीं पे बिखरे हैं, मेरे महबूब ... २) मैंने काटें हैं इन्तज़ार के दिन तब कहीं आये हैं बहार के दिन यूँ ना जा दिल कि शमा गुल कर के अभी देखा नहीं है जी भर के, मेरे महबूब ... ३) जब से ज़ुल्फ़ों की छाँव पाई है बेक़रारी को नींद आई है इस तरह मत जा यूँही सोने दे रात ढलने दे सुबह होने दे, मेरे महबूब ... ४) इस तरह फेर कर नज़र मुझ से दूर जाएगा तू अगर मुझसे चाँदनी से भी आग बरसेगी शम्मा भी रोशनी को तरसेगी, मेरे महबूब ... ५) धड्कनों में यही तराने हैं तेरे रुकने के सौ बहाने हैं मेरे दिल की ज़रा सदा सुन ले प्यासी नज़रों की इल्तजा सुन ले, मेरे महबूब ...
और फिर उस रूठे हुवे को मनाने के लिये , वापस बुलाने के लिये उसे ढूंढने के लिये
कोई निकल पड़ी और गाती रही ये गीत ...
लेकिन वो फिर कभी वापस नहीं आया ...
कौन थी वो..? जो उसे ढूंढती थी ... ?
मुझे पता नहीं चला आज तलक ...
क्यों की मैने देखि नहीं आज तक उसकी झलक ....
ख़ैर ...
कोई तो होगी ...
कभी ना कभी सामने आ ही जायेगी ...
लेकिन,,,,
उनके जाने से पहेले उसे रोकने की कौशिश भी की गई ...
लेकिन ,,,
वैसे तो उनके जीवनसे भी जब कोई दूर होती थी तब वो भी यही गीत गा गाके
उसे रोकता,समजाता और मनाता था ,,,
लेकिन,,,
अब छोड़ो भी ...
जाने भी दो ..
क्या फर्क पड़ता है .?
वो माने भी तो
ना माने भी तो
वो आये भी तो
ना आये भी तो
भला अब क्या फर्क पड़ता है ..?
किसीको भी..!
क्युकी वो गुजर गया और वो वक्त भी ..! गुजर गया...
वो गुजर गया वक्त के साथ और ,
वो वक्त भी गुजर गया उनके साथ साथ ...
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