Thursday, 19 May 2022

ખાલી ખમ્મ પંખી વગરનુ પીંજરૂ

 बस कुछ पलके लिए ......

"अनंत"हर पंखी को लुभाता ये पिंजरा... 

जाने कितनोका दिल दुभाता हे पिंजरा....

पंखी आते जाते रहे इन पिन्जरेमे अब द्वार कहा ....

आते जाते पंछीयोने ही तो द्वार इनका तोड़ दिया....

अब जब चाहे जो आये , आये और जाए .... 

रोकना भी चाहे पंछी, पिंजरा रोक ना पाए ....

ना बांधना , ना बंधना.... 

मुक्त रहेना मुक्त रखना....      

"अनंत" पिंजरा जान गया ..... 

रहश्य मुक्ति और बंधनका...... 

द्वार पिन्जरेका जब टूट गया..... 

अब पेड और पींजरे मे फर्क कहा ...... 

पंछी पेड पर भी आये जाए .... 

और कभी पिंजरे में बस जाए .....  

डाली डाली झूले जी भरते ही उड़ जाए .... 

"अनंत" पर पेड और पिंजरा ना उड़ पाये ... 

दरवाजा ही तोड़ दिया जब चाहे पंछी आये .... 

"अनंत" रोकेंगा नहीं अब जब चाहे उड़ जाए.....  

पल पल रूप रंग बदलता पिंजरा .... 

"अनंत" पंछी कभी नहीं बदलता......

ये जिस्म मेरा इक पिंजरा हे .... 

और मेरी जान हे एक पंछी ...... 

पंछी तोडके पिंजरा कब उड़ जाए ... 

"अनंत" इस पींजरे को पता नहीं....

"अनंत"

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*બ્લાસ્ટ*

કોણ જાણે પ્રેમના પીંજરા કેટલા પંખી થયા છે કેદ. 

"અનંત"આ પીંજરા ની છાતીમાં થયા છે કૈ કેટલાય છેદ. 

એય પંખી તારા 'ને મારામાં છે ફકત આટલોજ ભેદ.

તું પીંજરાની અંદર કેદ છે હું પીંજરાની બહાર છું કેદ.!

અય પંખી છે તું કેદ લોખંડના પીંજરામાં 

અને હું કેદ છું આ ચામડીના પીંજરામાં. 

તું સળિયાની અંદર બંધક છે.!

અને મારે આ સંસાર ના બંધન છે.! 

"અનંત" 



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