Wednesday, 14 December 2022

गेबी, गोबी का फुल।

 वर्षो पहेले की बात

जब गोबी आई अनंत के हाथ

तब एक के बाद एक

एक एक करके

गोबी से गोबी के

पते नीकालने लगा

और खाने लगा 

खाते खाते अनंत ने ऎसा कुछ लीखा।

@@@@@@@@@@@@@@


"गेबी गोबी"

*********


"अनंत" भीतर तक जाओगे। 

फीरभी कछु नाही पावोगे। 


में गोबिके फुल के जेसा..! 

और ये गोबी ब्रह्मांड जैसी..! 

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हे गोबीका फुल ऐसा

जिसके ऊपर निचे अंदर बहार, 

और कुछ भी नहीं होता.

होता हे तो होता हे बस पते पे पता.   


ये गोबी भी बडी गैबी है .. 


ये गोबी लगे कभी मुझे ब्रह्माड जेसी

और हर एक पता ....! 


हां.! हर एक पता जैसे जनम नया... 


हर एक पते पे नई कहानी .... 


वैसे हें नहीं .... 


हां.! हर एक कहानी वही पुरानी.... 


लेकीन हम सब भूल चुके है

इसलिए लगे नई सी .... 


मगर हें नहीं...    


में भी हु कुछ ऐसा।

गोबी के फुल जैसा।


जाने क्या? जाने क्यु?

तू ढूंढे मेरे भीतर कुछ न कुछ।


मेरे भीतर और क्या होगा.? 


कुछ भी तो नहीं मेरे भीतर.... 


आवो आकर देखो.!

उपरसे निचे तक। 

निचे से ऊपर तक।


"अनंत" कुछ भी तो नहीं पावोगे

तुम बहारसे भीतर तक।   


मेरे ऊपर भी हें बस पते पे पता। 

 

हर इक पतेके ऊपर पता।

हर इक पते के निचे पता..... 


बस पते पे पता।पते पे पता। पते पे पता।


शुरुसे आखिर तक बस पता ही पता.!


तुम भीतर तक जावोगे।

फीर भी कुछ नहीं पावोगे।


हां..! गर पढ़ शको.!

और पढ़ना चाहो  तो..!

पढ़लो.. “अनंत”

हर एक पते पे लिखी हें

कुछ मस्ती भरी दास्ता... 


और गर गहराई मे जाओगी

तो पाओगी कुछ दर्द भरी दास्ता...   


और कुछ ना पाओगे

मे बता देता हुं।


क्युं की मे गोबी जैसा हुं।

पते पते मे ना ढुंढो तुम मेरा पता।


गर मुजमे खुदको खोजोगी।

गर मुजमे मुजको खोजोगी।


तो कहीं तुम भी भटक जाओगी।

क्यु की मै खुद भी तो भटकता हुं।


में गोबिके फुल के जेसा..! 

और ये गोबी ब्रह्मांड जैसी..! 

“अनंत”


ऎसे गोबी का पता नीकाल नीकाल के। 

खाते खाते बात पते की लीख डालके।

पेट भर गया जब

वो सो गया।

और मै.?

मेरा क्या है।

मै कभी भीतर से जाग ना शका।

उनकी तरहा दूर कही भाग ना शका।


ब्लास्ट :-


प्यार से खाओगे तो। 

पेट भी भर पाओगे।


"अनंत" भीतर तक जाओगे। 

फीरभी कछु नाही पावोगे।


अकसर मै मुज मे नही होता।

होकर भी कुछ मे नही होता।


होता हे जब होता हे कोई और, 

मुजमे "अनंत" मे खुद मे नही होता। 


बीलकुल गोबी के फुल की तरहा

सब कुछ होते हुए भी

मै कुछ नहीं होता

और अब ईस बातका

मुजे कोई दु:ख नहीं होता।

"अनंत" 

ये भी गोबी 

मै भी गोबी 

ऐसा मै जैसी गोबी 

जैसा मै वैसी गोबी

"गेबी गोबी मै भी गोबी"

"अनंत"

गेबी गोबी का फुल ।

"अनंत"

मै भी गोबी का फुल।

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