Sunday, 2 April 2023

બોલતા બોલાઈ ગયુ

 बात..!

कल की 

आज की 

आज की 

और, 

आने वाले कल की

हर वक्त की बात

वात हर पल की

लीख देती है कभी कभी। 

"अनंत" कलम पागल की।

भी.!

होती है पागल जैसी।

એક લેખક માટે કલમ

ચલમની ગરજ સારતી હોય છે.!

લખવામાં એને અલૌકિક નશો ચડતો હોય છે.!

ચલમ પીધા પછી જે મસ્તી ચલમીને મળે છે.!

એથીયે અધીક મસ્તી નીજાનંદ કલમીને મળે છે.!

એવુ એ ઘણી વાર વાત વાતમાં કૈ દેતો.. 

જો કે એ કોઈ છાપેલ કાટલા છાપ

લેખક બેખક હતોજ નહીં.!

પણ તો પણ નીજ મસ્તીમાં...

જુની પુરાણી પસ્તીમાથી વીણેલા કાગળો પર

ખુદ બેહાલ લઘરે હાલ..

એવાજ જેવા તેવા મેલા ઘેલા હાથે..! 

કલમ ઘસ્યા કરતો...!

કાગળ અને કલમના ઘર્ષણ થકી...

ગલુડીયાની જેમ

એક સામટા અઢળક શબ્દો જનમ લેતા..!

એના ગોબરા ગંધારા શેડારા છોકરા જેવા શબ્દો.!

હું નવરો પડુ અકલે નવડાવી ધોવડાવી સાફસુફ કરૂ... 

અકલે મારો સમય સરસ રીતે પસાર થૈ જાય...

પછી ખૂબ થાકુ અકલે

પથારીમાં પડ્યા ભેરી સવાર થૈ જાય... 

વર્ષો પહેલાં લધરા અનંતે લખેલી.. 

ચલમ જેવી કલમમાંથી શબ્દોની ધૂમ્ર શેર ઊડતી...

એમાં કેટલીય બેહોશ થૈ જતી...

સાવ ખોટે ખોટી હાંકવી ગરમ પોરની..

એના કરતા, 

સત્ય ની આડમાં થોડુ અસત્ય હાંકવુ શું ખોટુ હેં..!


અને, છેલ્લે છેલ્લે...


મને યાદ આવ્યું...


આ કાળથી અનંત કાળ સુધી ભુલાય નહીં એવુ..!


થોડા વર્ષો પહેલાં એક અલૌકિક ઘટના ઘટેલી... 


તે દિ'એક છોકરીએ પણ.!


અનંતના ગોબરા ગંધારા શેડારા છોકરા જેવા

અક્ષરોને નવડાવી ધોવડાવી સાફસુથરા કરી

મસ્ત મજાના આંજણ પાવડર કરી...

સ્વચ્છ કાગળના પારણામા જુલાવ્યા હતાં...

આ ભવમાં આક લૂ તો બૌ કેવાય...😜😘


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फीर..., 


गुंगा बोला... 


बहेरे ने सूना... 


और अंधे ने देखा... 


और लंगड़ा दौड़ा 


ऐसा भरम...!!!


हाये....


कैसा भरम... 


हूवा मुजे... 


हो खंधा, अंधा या देखता, भक्त... 

देखो जरा आज तक पर दस-तक... 


दो अर्थ मे... 


दस-तक... 


दस्तक... 


यानी.... 


टकोर... 


सायद सारे बीकाउ... 


कुछ/कोई अपवाद हो शकता है... 


वैसे तो सारे के सारे खोटे सिक्के... 


हर सिक्के का दूसरा पहेलु होता है... 


और फीर सब पेसे का खैल है... 


भरोसा इस पर, या उस पर करना बेकार...  


क्युकी... 


कोई भी.! कभी भी.! कुछ भी.! बोलता है..! बोल शकता है, 


बोल कर पलमे पलट शकता है, बदल भी शकता है.! 


ये तख्ता कभी भी पलट शकता है । 


ऐसे मे सच जुठ को परखना बडा ही मुश्किल... 


लेकीन.... फीर भी..! 


ऐसे मे कुछ, बहोत कुछ सच सामने आ जाता है... 


जो अंधो की आंखे भी, 


फोड के धूस जाता है आर पार... 


ऐसे मे भला देखता चुप कैसे बैठता ... 


ब्लास्ट :- 


सबको ये भरम हो रहा है... 

की दूनिया वो बदल रहा है... 


भरभ चल रहा है।

जग बदल रहा है। 


भरम यु ही बस चल रहा है.. 

जग तो आप ही बदल रहा है... 


वक्त ही कुछ ऐसा चल रहा हे। 

वक्त सबको कुछ यु छल रहा हे..


उसकी वजैसे बदल रही हे दूनिया, 

ये सोच के मुर्ख मन मे मचल रहा है। 


जब की, 


खूदको बदलने के ईलावा... 


यु तो कुछ बदलना आसा नही...

हा, प्रलय ही विकल्प है आखरी... 


फीर गुंगी कलम कतीरा की थोडा कुछ बोल के, 


चुप हो गई ... 


और बर्षो पहेले बहोत बोलती कलम यार की, 

जो बोली थी, वो बोल उठी... 


और कभी अपनी कीसी चहीती से, 

बर्षो पहेले जो बोली थी भोले की, 

वो भोली कलम 

वो, भूली बात फीर याद आ गई... 


ब्लास्ट :-


ऐसा भरभ हुवा मुजे... 

जैसे मैने छुआ तुजे... 


"अनंत" तेरे ईश्कमे... 

हा, कुछ ऐसे डुबा हु मे.. 


"अनंत "

&&&&&&&&&&


" अनंत " वो जो थोडे दिन  चुप रहता हे 

फीर एक दिन एक साथ बहोत बोलता हे। 


" अनंत "


खैर... 


ये उनकी बाते हे, मेरी बात और है, 


सुनो गौर से... 


फीर..., 


गुंगा बोला... 


बहेरे ने सूना... 


और अंधे ने देखा... 


और लंगड़ा दौड़ा 


फीर भी वो वैसे के वैसे ही रहे, जैसे थे..! 


क्यु की अब बदलना मुश्किल था.! 

थूंक कर चाटना और भी मुश्किल.. 


क्यु की ना वो गुंगा था ना बहेरा ना अंधा... 

खंधा बोलता सुनता देखता ही था सब.! 


लेकीन... 


दिखाना कुछ और था। 

दिखावा कुछ और था.! 

दिखाता कुछ और था..! 

और उपर से मुर्ख प्रजा.! 

फीर.., क्या कहेना, है ना.! 


ये सच था। भरम न था मेरा....


खैर.... 


फीर बर्षो पहेले बहोत बोलती कलम यार की, 

जो बोली थी बोल उठी... 


और ऐसा भी कुछ महसूस हुवा। 

जैसे तूने हलके से हो छुआ मुजे। 


"अनंत " तु आके कभी देख जरा, 

कीस कदर तेरे प्यारमे खोया हु मे। 


" अनंत "

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