Sunday, 24 February 2013

प्रेम..... एक अलौकिक अहेसास.... १


प्रेम.....
आधी रात थी में नींद में करवाटे बदल रहा था ... और अनंत आया. मुझे जगाया बोला ‘चलो भैया उठो‘ कहा ? मेंने पूछा. ‘अरे वही पर जहा हम तीनों , में,तू और अज्ञानी अकसर मिलते हे.’ ‘ ओह अच्छा अच्छा महोल्लेमे’ हां वही पर एकान्तमे हम तीनों बाते करेंगे मजा आएगा...     
ठीक हे फिर चलो. में आखे मलते मलते चल पड़ा अनंत के साथ महोल्ले की और ....
छोटीसी पतली गली चारों और अँधेरा ...  
हम दोनों ने महोल्ले में प्रवेश किया भीतर कोनेमे एक घर जिसमे हम तीनों आधी रात के बाद मिलते हे .हमने घरके भीतर प्रवेश किया. वैसे तो घरमे अँधेरा हे, पर बस इक छोटासा ब्ल्यू रंगका लेम्प जलता हे. इक कोनेमे तिन पुरानी लकडेकी खुर्शिया पड़ी हे. अज्ञानी अपनी वही पुरानी खुर्शी पर बैठा हे. लंबे लंबे बाल बड़ी दाढ़ी. गहेरी आंखे. ‘आवो आवो प्यारो आवो बैठो” गहेरी आवाज में अग्यानिने हमारा स्वागत किया, सामने पड़ी दो खाली खुर्शी पर हम बैठ गए. हमेशा की तरहां. जब हम तीनों मिलते बस अपनी अपनी मस्तीमे जो जिमें आये, बकते रहेते हे, किसिना किसी विषय पर बाते करते रहेते हे. बस यही हमारी मस्ती हे. हमें दुनियासे कोई लेना देना नहीं होता.....और हमारी सोच सिर्फ हमारी होती हे.  
‘हां तो कहो आज किस विषय पर बाते करेंगे हम’ अज्ञानी ने पूछा. में ने कहा आज हम उस विषय पर बाते करेंगे जिसकी बाते करते लोग थकते नही. ‘ हां हां में समाज गया तू किस विषयकी बात करता हे .’ अनंत ने कहा. चलो फिर बात प्यारकी ही हे तो शुरू करदो . अज्ञानी भी समाज गया. में ने शुरुआत की और उन दोनों को पूछा बतावो प्रेम क्या हे ?  प्रेमका अर्थ क्या हे ??? प्रेम हमारी कोनसी हराकतको माना जाता हे??? प्रेम का रंग रूप केसा होता हे ? प्रेमकी सुगंध केसी होती हे ? प्रेम की आवाज केसी होती हे ?   

और प्रेमकी पहेचान क्या हे ???
‘ कहासे उठा लाये एक साथ इतने सारे सवाल ?’ अज्ञानी ने पूछा.  

‘ये सवाल तेरे तो नहीं हे किसी और के हे.’ अनंत लहेकेसे बोला.   
मेने कहा ‘ हां.. हां आप दोनोंकी बात सही हे . ये सारे सवाल मेरे नहीं हे.’   
‘तो फिर जिसके भी हे उसे कहेदो इन सारे सवालोमे ही उनके जवाब छिपे हे.खुद ही खोजले’ अज्ञानी ने हलकेसे गुस्से भरी आवाजमें कहा.
वो तो मे भी जानता हू . पर फिरभी हमें इस विषयमे चर्चा करनेका बड़ा मजा आएगा तो क्यों ना हम उनके लिए ना सही अपने निजी आनंद के लिए इस विषय पर बाते करे ?
‘अच्छा तो जेसी तेरी मर्जी अब तू ही बता तू क्या जानता हे प्रेम के बारेमे ?’ अनंत ने मुझे पूछा. मेने कहा ‘ प्रेम प्रेम होता हे और क्या.’
‘बहोत अच्छे प्रेम प्रेम होता हे. बहोत थोड़े शब्दोमे तुने समजा दिया प्रेमका अर्थ भई मजा आ गया.’ अनंत कटाक्ष में बोला.
अज्ञानी अपनी लंबी दाढ़ी पर उंगली पसारे हसने लगा. ‘हंसते क्या हो ? तो तुम ही बतावो ना प्रेमका अर्थ. ‘और अनंत तू भी कटाक्ष करता हे . तू तो बहोत लिखता हे प्यारके बारेमे तो तू ही बता प्रेम का अर्थ मेंने गुस्सेसे दोनोको बोला.  
 अनंटने कहा ‘में प्यारकी बाते नहीं लिखता में प्यार ही करता हू. और प्यारमे जो जो महेसुस होता हे बस में उसीका बयान करता हू. अपनी रचनाओमे, में कभी व्यर्थ अर्थमे नहीं पड़ता. वैसे में ये भी मानता हू व्यर्थ कुछ भी नहीं होता. हर एक वस्तु विषयका कोइना कोई अर्थ तो निकलता ही हे.                         
‘अज्ञानी तुम क्या कहेते हो.?’ अनंत ने अग्यानिसे पूछा. ‘ हां हां अब तुम कुछ बोलो’ मेने भी अनंत के सुरमे सुर मिलाया.               
अज्ञानी ने धीरेसे अपनी लंबी दाढ़ी पर हाथ पसारते हुवे कहा. ‘कई सदियों से इन प्रेम के विषयकी चर्चा चल रही हे . और चलती ही रहेगी, प्रेमका अर्थ पूर्ण रूपसे आज तक ना कोई समज पाया हे, और ना कोई किसोको समजा पाया हे.
सभीने प्रेमको अपने अपने तरीकेसे समाजाने की कोशिश की हे, पर पूर्ण रूप से आज तक कोई समजा नहीं पाया ...
युगोसे ग्यानी अज्ञानी सभी प्रेमका अर्थ ढुंढने में मचे पड़े हे .. फिरभी पूर्ण रूपसे कोई बता नहीं पाया की आखिर ये प्रेम क्या हे ?
हां जिसने किया उसने जाना मगर उतना ही समजा उतना ही जाना जितना उसने किसीको चाहा, और प्रेम किया. वैसे प्रेम शब्द ही इतना गहेरा हे.  प्रेम शब्दमे ही इतनी गहेराई हे की जब हम ‘प्रेम’ शब्द बोलते हे तब ही हमें कुछ अच्छासा महेसुस होने लगता हे.
प्रेम शब्द ही प्राणसे भरपूर हे. जेसे बिना प्राणके कोई भी प्राणी जिन्दा नहीं रहे शकता वैसे ही प्रेम के बगेर कोई जी नहीं शकता. बिना प्राणके तो इन्सान मर ही जाता हे, पर प्रेम के बिना इन्सान मरता तो नहीं पर जिन्दा लास सा बन जाता हे. और ये हालत मौतसे भी बदतर हे. बस में और कुछ ना बोलू, कुछना जानू , जानू तो बस इतना जानू,  
“हर हालमे प्रेम इक अलौकिक अहेसास हे.“
‘बोलो अनंत अब तुम क्या कहेते हो ?’  अज्ञानी ने अनंत से पूछा. ‘ हां हां बोलो अनंत तुम भ कुछ बोलो, अब तुम्हारी बारी हे बोलनेकी.’ अब मेने अज्ञानी के सुरमे सुर मिला दिया.
अनंत ने कहा.      
પ્રેમ એટલે...
ના હોવામાં હોવું એટલે પ્રેમ.
બંધ આંખે જોવું એટલે પ્રેમ.

રુદનમા છુપાયેલુ ગૂઢ હાસ્ય.
હસતા  હસતા રોવું એટલે પ્રેમ.

કેવળ આંખોને જ નહીં ! સમગ્ર. 
અસ્તિત્વને નિચોવવું એટલે પ્રેમ.   

એક જગ્યા પર ઊભવું જ નહીં.
એક જ દિશામાં જોવું એટલે પ્રેમ. 

અનંત” સુખની ઝંખના જ દુ:ખ 
પામવા સાથે ખોવું એટલે પ્રેમ....

ક્ષણ નો આવેગ એટલે પ્રેમ નહીં . 
પ્રેમ એ માત્ર ક્ષણ નો આવેગ નથી . 
અલગ અલગ દેહમાં "અનંત" 
વિચારોનું એક સરખું હોવું એટલે પ્રેમ  
"અનંત"
बोल अब तु बोल किसने तुजे ये सवाल किये थे ?
बोल ... अरे बोल ना बोलता क्यों नहीं ... ?
सोने दे अनंत उसे सो जाने दे वो गहेरी निन्दमे हे. उसे सो जाने दे...... 
       

अपूर्ण ......... 

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