Sunday, 19 May 2013

"अनंत" के अंगत संग्रहमे से....


बस कुछ पलके लिए ......

"अनंत"हर पंखी को लुभाता ये पिंजरा... 
जाने कित्नोका दिल दुभाता हे पिंजरा....

पंखी आते जाते रहे इन पिन्जरेमे अब द्वार कहा ....
आते जाते पंचियोने ही तो द्वार इनका तोड़ दिया....


अब जब चाहे जो आये , आये और जाए .... 
रोकना भी चाहे पंछी, पिंजरा रोक ना पाए ....

ना बांधना , ना बंधना.... 
मुक्त रहेना मुक्त रखना.... 

"अनंत" पिंजरा जान गया ..... 
रहश्य मुक्ति और बंधनका...... 

द्वार पिन्जरेका जब टूट गया..... 
अब पेड और पिन्जरेमे फर्क कहा ...... 

पंछी पेड पर भी आये जाए .... 
और कभी पिंजरे में बस जाए ..... 

डाली डाली झूले जी भरते ही उड़ जाए .... 
"अनंत" पर पेड और पिंजरा ना उड़ पाये ... 

दरवाजा ही तोड़ दिया जब चाहे पंछी आये .... 
"अनंत" रोकेंगा नहीं अब जब चाहे उड़ जाए.....

पल पल रूप रंग बदलता पिंजरा .... 
"अनंत" पंछी कभी नहीं बदलता......
ये जिस्म मेरा इक पिंजरा हे .... 
और मेरी जान हे एक पंछी ...... 

पंछी तोडके पिंजरा कब उड़ जाए ... 
"अनंत" इस पिन्जरेको पता नहीं....

"अनंत"

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