अनंत , अज्ञानी और मै दिन हम तीनों दिनभर साथ ही काम करते थे और दिन भरका काम खत्म करके रातको फिर मिलते और ढेर सारी बाते करते , लेकिन कई दिनोसे में रात को उन्हें मिलने नहीं जा पाता था उस दिन मगर दिल बैचेन था उन्हें मिलने उनकी बाते सुननेको ...
और मै चाय लेकर चल पड़ा महोल्लेकी और.....
दर खटखटाने की जरुरत ना थी खुल्ला ही था, मेरे घरके अंदर कदम रखते ही वो जान गए में आया हू ....
बहोत ही खुश होते हुवे दोनों अपनी खुरसी छोड के बहार आ गए और एक साथ बोल उठे आवो आवो प्यारे बहोत दिनोके बाद आया कहा उलझ गयाथा भीतर जाते जाते अनंत ने पूछा ....
अरे यार क्या बताऊ आज कल नींद बैरन बनी हें ...
अज्ञानी अपनी जगे बैठते हुवे धीरेसे बोला तो फिर आज नींद नहीं आई ?
अज्ञानी को जवाब दू इतनेमे अनंत गुस्से से बोला
ये क्या बात हुई परेश हम दोनों यहां तेरे और चायका इन्तजामें जागते रहे और तू बे फ़िक्र हो के सो जाये करे ये ठीक बात नहीं है , हां कहे देता हू ये ठीक बात नहीं है
अबे क्या ठीक बात नहीं ठीक बात नहीं लगा रखा है हां याद है उस दिन तुम दोनों बाते करते करते सो गए थे खुर्शी पर ही और मैने तुम दोनोको खुर्शी से उठा कर राजे पर लेटाया था .....
कब हां कब हम कभी सोते ही नहीं है समजा क्या ....
हमारा प्यारी लड़ाईको रोकते हुवे अज्ञानी बोला
शांत अनंत शांत तू भुलक्कड है इस लिए भूल गया है पर परेश सही कहेता है उस दिन जब हमने छोटीसी कविता लिखवाई थी ... "जीवन" और "प्रेम"
सर खुजाते हुवे नीची मुंडी करके कान पकडके हां...हां... याद आया याद आया . गलती हो गई माफ करदे यार .
चल बे चल अब माफ़ी मांगनेकी जरुरत नहीं चायकी प्याली ला मेंने अपनी खाली खुर्शी पर बैठते हुवे कहा ....
मुझे जागने की दवाई बता अनंत में भी जागना चाहता हू पर ....
चल चल तू क्या जागेगा आलसी कहिका ....
चलो अब वक्त बर्बाद ना करो चायकी प्याली भरो और कुछ अच्छे विषय पर बाते करो अज्ञानी हमें शांत करते हुवे बोला ....
अनंत ने चायकी तिन पियाली भरदी हम तीनों चायकी चुस्की भरने लगे...
अनंत मै देख रहाहू कई दिनोसे तुने कागज़ कलम को हाथ नहीं लगाया क्यों... ?
चाय की पियाली हाथमे पकडे हुवे मुड नहीं बनता यार ....
तो इस हालपे कुछ लिखदे यार ....
क्या लिखू अज्ञानी ....
સુજે ના કઈ ટાણે કટાણે ...
લખવું શું પરાણે પરાણે ...
मै उछल पड़ा बन गई अच्छी खासी पंक्ति बन गई अब आगे बढ़ा ...
अनंत को गुस्सा आ गया , अबे क्या उछलता है तू पागल्की तरहा
हाल बताया है कोई कविता नहीं की मैने ....
अरे यार पर फिरभी बन गई है ..
पागल है तू ऐसी बातो को कविता नहीं कहेते ....
मैने पूछा तो कविता किसको कहेते है ...?
अज्ञानी धीरेसे बोला परेश अनंत ठीक कहेता है...
अच्छा तो तू बता और सुना वो जिसे कविता कहेते है....
कविता युही नहीं बनती परेश माहोल बनना चाहिए ....
तो शराब ले आवु क्या दो घूंट लगाले और माहोल बनाले ....
अनंत बीचमे बोला दो घूंट से माहोल बनता और कविता बनती तो पूरी दुनिया कवी बन जाती मुर्ख ...
तो ....
(कहानी अभी बाकि है ....)
और मै चाय लेकर चल पड़ा महोल्लेकी और.....
दर खटखटाने की जरुरत ना थी खुल्ला ही था, मेरे घरके अंदर कदम रखते ही वो जान गए में आया हू ....
बहोत ही खुश होते हुवे दोनों अपनी खुरसी छोड के बहार आ गए और एक साथ बोल उठे आवो आवो प्यारे बहोत दिनोके बाद आया कहा उलझ गयाथा भीतर जाते जाते अनंत ने पूछा ....
अरे यार क्या बताऊ आज कल नींद बैरन बनी हें ...
अज्ञानी अपनी जगे बैठते हुवे धीरेसे बोला तो फिर आज नींद नहीं आई ?
अज्ञानी को जवाब दू इतनेमे अनंत गुस्से से बोला
ये क्या बात हुई परेश हम दोनों यहां तेरे और चायका इन्तजामें जागते रहे और तू बे फ़िक्र हो के सो जाये करे ये ठीक बात नहीं है , हां कहे देता हू ये ठीक बात नहीं है
अबे क्या ठीक बात नहीं ठीक बात नहीं लगा रखा है हां याद है उस दिन तुम दोनों बाते करते करते सो गए थे खुर्शी पर ही और मैने तुम दोनोको खुर्शी से उठा कर राजे पर लेटाया था .....
कब हां कब हम कभी सोते ही नहीं है समजा क्या ....
हमारा प्यारी लड़ाईको रोकते हुवे अज्ञानी बोला
शांत अनंत शांत तू भुलक्कड है इस लिए भूल गया है पर परेश सही कहेता है उस दिन जब हमने छोटीसी कविता लिखवाई थी ... "जीवन" और "प्रेम"
सर खुजाते हुवे नीची मुंडी करके कान पकडके हां...हां... याद आया याद आया . गलती हो गई माफ करदे यार .
चल बे चल अब माफ़ी मांगनेकी जरुरत नहीं चायकी प्याली ला मेंने अपनी खाली खुर्शी पर बैठते हुवे कहा ....
मुझे जागने की दवाई बता अनंत में भी जागना चाहता हू पर ....
चल चल तू क्या जागेगा आलसी कहिका ....
चलो अब वक्त बर्बाद ना करो चायकी प्याली भरो और कुछ अच्छे विषय पर बाते करो अज्ञानी हमें शांत करते हुवे बोला ....
अनंत ने चायकी तिन पियाली भरदी हम तीनों चायकी चुस्की भरने लगे...
अनंत मै देख रहाहू कई दिनोसे तुने कागज़ कलम को हाथ नहीं लगाया क्यों... ?
चाय की पियाली हाथमे पकडे हुवे मुड नहीं बनता यार ....
तो इस हालपे कुछ लिखदे यार ....
क्या लिखू अज्ञानी ....
સુજે ના કઈ ટાણે કટાણે ...
લખવું શું પરાણે પરાણે ...
मै उछल पड़ा बन गई अच्छी खासी पंक्ति बन गई अब आगे बढ़ा ...
अनंत को गुस्सा आ गया , अबे क्या उछलता है तू पागल्की तरहा
हाल बताया है कोई कविता नहीं की मैने ....
अरे यार पर फिरभी बन गई है ..
पागल है तू ऐसी बातो को कविता नहीं कहेते ....
मैने पूछा तो कविता किसको कहेते है ...?
अज्ञानी धीरेसे बोला परेश अनंत ठीक कहेता है...
अच्छा तो तू बता और सुना वो जिसे कविता कहेते है....
कविता युही नहीं बनती परेश माहोल बनना चाहिए ....
तो शराब ले आवु क्या दो घूंट लगाले और माहोल बनाले ....
अनंत बीचमे बोला दो घूंट से माहोल बनता और कविता बनती तो पूरी दुनिया कवी बन जाती मुर्ख ...
तो ....
(कहानी अभी बाकि है ....)
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