Tuesday, 31 December 2013

आज मेरे हाथ में टोर्च थी.



शर्दी का मौशम सड़क सुमसान गली सुनी,

 चारो और अँधेरा घना अँधेरा ...

मै महोल्ले की और चला चाय ले कर हमेशा की तरहा. 

आज मेरे हाथ में टोर्च थी.  

क्यों की आज में अकेला न था मरे साथ कोई और भी था जिसे. 

अंधेरो से उसे डर ना लगे इस लिए मैने साथ में टोर्च ली थी.   

हां मेरे साथ थी एक लड़की, जो अनंत को मिलना चाहती थी. 

कई दिनों से वो अनंत अनंत की रट लगा रखी थी बहोत बहाने बनाए .

पर अब तो वो जान पे बनी और मै मजबूर हो गया . 

ये दूसरी लड़की थी जो पागल बनी थी अनंत को मिलने के लिए . 

इससे पहेले भी मुझे ऐसे ही मजबूर किया गया था..! 

 नहीं मिलाता तो दोस्ती तोडने की धमकी. 

आज भी ऐसा ही हुवा फिर ना मिलने की धमकी . 

सो आज में उसे अनंत से मिलाने मेरे साथ खंडर पर लाया.

 उसकी इच्छा थी इस महेफिलमे आने की . 

मै महोल्ले में गया दरवाजा हमेशा की तरहां खुल्ला था . 

"आप बहार खड़े रहे मुझे उनसे पूछना होगा." 

मै अंदर गया . अनंत और अज्ञानी आमने सामने बैठे थे .. 

टीपॉय पर मॉम बती जल रही थी ... 

आव आव परिया आव् बैठ और ,

जल्दी से चायकी प्याली भर दे यार ... 

आज बहोत भारी ठंड हें सो चाय पिए तो,

 भीतरसे जिस्म थोडा गर्म हो जाए .

फिर महेफिल का मजा आये ... 
    
मेरी खुर्शी खाली मै ने अपनी कुर्शी संभालते हुवे ... 

हां चाय तो मै भरता हु पर आज एक पियाली और ले आ अनंत . 

अनंत ने मुझे पूछा . 

क्यों परिया एक और पियाली ? बहोत ठंड लग रही है तुजे ? 

जो  तु दो दो पियाली चाय पिएगा ?

अज्ञानी बोला अरे भई ठंड लगी भी है तो,

 भले ही दो बार चाय पिए उसमे क्या हें . 

अनंतने कहा ,पर यार दूसरी पियाली की क्या जरुरत ..!

दो  बार एक ही पियाली में चाय नहीं पी शकता क्या ? 

मैने कहा अरे यारो ऐसी बात नहीं है ? 

अनंत बोला फिर कैसी बात है बता ? 

मैने दोनों के सामने देखते हुवे अनंत को धीरेसे कहा,

 आज तुजे कोई मिलना चाहता है . 

अनंत बोला  क्यों ?

 मुझे क्यों मिलना चाहता है ?

और कौन मिलना चाहता हें मुझे परिया ? 

अनंत ने एक ही साँस में दो सवाल पूछ लिए. 

मैने  कहा एक लड़की है जो तुजे मिलना चाहती है. 

लड़की ! ? उसे तो एक बार मै मिल चूका हु अब क्या है ? 

अरे यार ये वो नहीं दूसरी है कई दिनों से तेरे बारे में पूछ रही थी . 

मैने अनंत के सामने टोर्च का उजाला फेंकाते हुवे कहा ... 

अनंत ने अपनी आँखों  पर हथेली रखते हुवे चिल्लाके कहा परिया ... 

तु टोर्च बंध कर मुज पर प्रकाश मत डाल..!

 हटाले मेरे चहेरे के सामने से ये उजाला , 

मुझे अँधेरे में ही रहे ने दे ... 

पर अनंत तुजे कोई मिलने आई  है .. .

जो तेरी लिखावट  को तेरी सौच को पसंद करती है . 

नहीं अब मुझे किसी से नहीं मिलना मिल चूका बहोत को ... 

पर यार तु समजता क्यों नहीं . मैने उसे समजाते हुवे कहा .. 

वो बोला नहीं परिया मुझे किसीसे नहीं मिलना ... 

जब सामने था तब तो मेरा हाल तक नहीं पूछा किसीने ... 
जब "अनंत" छुप गया तो लोग ढूंढने निकल पड़े है मुझे ..

अनंत के मुहसे दर्द भरा शेर निकल गया .. 

फिर वो बोला परिया ...  

अब वक्त गुजर चूका .... 

जो जब मिलना चाहिए तब नहीं मिला ..... 

अब कोई मिले भी तो क्या ना मिले भी तो क्या ... 

अज्ञानी बोला यार तु कभी चाहता था की नहीं की.

  तुजे कोई ऐसी लडकी मिले जो,

 तेरे जझबात-ओ लाब्झो को समजे चाहता था ना ?  

मैने अज्ञानी की बात में सुर मिलाते हुवे कहा.

हां अनंत  मै भी तुजे कहेता था याद है की ,

एक ना एक दिन तुजे ऐसी लड़की मिलेगी 

जो तेरे दिलके हालत को खूब समजेगी ... 

अनंत ने कहा हां वो सब ठीक है, सही हें,

 पर तुम दोनों भी जानते हो ना मेरे साथ जुड़ने वालोको 

मुझसे जुड़ने के बाद सिवाय आंसु के कुछ नहीं मिलता . 

और मै किसीको अब रुलाना नहीं चाहता .. 

मेरे हाले दिल अब ठीक है फिर क्यों ,

किसको पुरानी  यादो में घसीट के हम दु:ख दे ,

पहेले भी इस कदर तु जिसे लाया था उसे में तेरे कहेने पर मिला .. 

क्या हुवा क्या कुछ बात बनी अरे यार वक्त निकल चूका है ... 

वो चाहते हुवे भी मेरे पास नहीं आ शकती ... 

और में भी आझाद कहा ... 

सब  अपने अपने रिस्तो में उल्जे हुवे है बंधे  हुवे  है... 

वो भी ना आई ये भी ना आ शकेगी सारे के सारे बांधे हुवे है ... 

कोई आझाद नहीं रहा तु समजता क्यों नहीं परिया ... 

अनंत गुस्सा हो गया ... 

अब जिसे मिलना हो वो अगले जनम तक इन्तजार करे बस... 

 मैने अनंत को समजाने की कोशिश की ... 

पर...एक बार मिल तो ले फिर चाहे ना मिलना कभी .. 

उसे कहे दो बहोत हुवा अब बस भी करो. 
जो मर चूका है , उसे फिर ज़िंदा ना करो. 

मिलेगा क्या आखिर उसे या मुझे तु बता .?

फिर प्यार, फिर जुदाई, 
आंखो में आंसु 
फिर तड़प फिर उदासी. 

ये सब फिर आये जीवन में ऐसा ना करो, 
जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो. 

अब तो प्यार के नाम से ही हम डरे है . 
बड़ी मुश्किल से गहेरे झख्म भरे है . 

उन झ्क्मो को अब फिरसे हरा ना करो.
  जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो.  

तुम क्या जानो.  

कितना सताया हें इश्कने मुझे 
बहोत सताया है इश्क ने मुझे . 
बहोत रुलाया है इश्कने मुझे.

अश्क फिर आखो में आए ऐसा ना करो. 
 जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो.  

सच्चे प्यारकी खोजमे आधी उम्र कट चुकी है 
अब जिंदगी हमारी कितने हिस्सोमे बट चुकी है. 

हो कोई और भी परेशा हमारी कारन.  
ना में करू ना तुम भी ऐसा गुनाह करो.

"अनंत"अब मिलना इतना आशा नहीं हें,
   ये जीवन  भी तो अब सिर्फ हमारा नहीं हें .

मै तो संभल रहा हु तुम भी संभल जावो. 

यु रोज रोज हमसे तुम मिला ना करो. 
  जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो. 
    
"अनंत" 

अनंत ने अपनी रचना के जरिये सारी बात कहे दी ... 

हम भी समज चुके थे की ,

अब अनंत को समजाने की कोई गुंजाइश नहीं थी . 

हमारे तीनों की आँखे नम थी ... 

तो अब क्या सोचा अज्ञानी ने अनंत से पूछा ... 

अनंत ने स्पष्ट कहे दिया , नहीं मिलना ... 

पर बस थोड़ी देर के लिए मैने डरते डरते अनंत से कहा.

मेरी खातिर एक बार उसे मिल लो यार,...

 मैने उनसे वादा किया है... 

मेरी हालत पतली देख अनंत थोडा मुश्कुराया .

 फिर बोला . 

ठीक है तु कहेता है तो तेरी खातिर . 

पर उसे कहे देना इसके बाद कभी नहीं. 

हां हां ठीक है जैसा तु कहे पर एक बात और बतादे , 

हां बोल परिया .. 

मेने कहा, अगर फिर उसे मै मिलता रहू,

 तो  तुजे कोई एतराज तो नहीं ना ? 

नहीं मुझे बिलकुल एतराज नहीं पर तुजे भी संभलना होगा . 

जुड़े ना जुड़े रिश्ते जिश्म्के ,रूह्का रिश्ता टूटना नहीं चाहिए .. 

हां हां में सब समज गया तो क्या में उसे अंदर बुलाऊ .. 
हां बुलालो ...


    

     

   

  

7 comments:

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  2. tum aur main...ek baat samaj lijiye...tumhara darr ekdum sahi hai....vastavik aur dil ki duniya ...dur hi rehni chahiye...

    isliye jab aap , aap nahi rehte...to is baat ki main puri izzat karti hu...

    aur main bhi main nahi rehna chahti..

    main bhi ek ruh...shayad anant ka ek hissa..
    aur anant mera ek hissa...

    suno...

    hume apne aap ko samjana hoga...sambhaal na hoga..

    ek aag ka dariya hai aur dub ke jaana hia

    aur ek gal...

    maano to sab kuch....na maano to kuch bhi nahi

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  3. मेरे खयालो में आने से तुजे अनंत भी नहीं रोकता खयालो में आना जाना कोई जुर्म तो नहीं होता ... बस संभल ना है आगे जो लिखा वो हो कर ही रहेता है...

    अगर हम नेक हें तो खुदा मिला देता है..

    हिसाब के मुताबिक़ ...

    ये उस बात की मिशाल है वर्ना हम एक दुसरेको कब जानते थे ...

    मै जानता हु तुम्हारी तड़प तुम्हारा मकसद...

    और मै ये भी जानता हु तु प्यार और कला से हरी भरी है ....

    हां तुने थोड़ी जल्दी में बड़ी गलती की है .. बरना दुनिया बड़ी है ...

    और तु मुझसे ज्यादा पढ़ी लिखी कुछ बात ऐसी भी हें की एक ही सौच एक विचार ववाले दो

    दिल और दिमाग मिल जाए तो जीवन रंगीन फूलो की तरह खिल जाये ...

    और ये सब हम एक दोस्त बनके कर शकते है ...

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  4. Kunjal Pradip Chhaya ये वो हस्ती है ....

    जिसने सबसे पहेले अनंत को पुकारा ....

    और अनंत को अपने लाब्झो में उतारा ....

    ईक कहानी के रूप मै ....

    मै उनको प्रणाम करता हु .....

    काश कल वो आती

    वो भी अनंत को मिल पाती ...

    ख़ैर सब किस्मत का खेल है ...
    Kunjal Pradip Chhaya आपको ह्रदय से प्रणाम ...

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  5. [“અનંત કાળથી ભટકતો અજ્ઞાની” ] New comment on आज मेरे हाथ में टोर्च थी..
    P
    pkatira
    pkatira has left a new comment on your post "आज मेरे हाथ में टोर्च थी.": Kunjal Pradip Chhaya & Pravin Miyatra प्रवीण तेरी बात बिलकुल सही है ... उनकी कोई मंजिल नहीं है ... ये घर नहीं खंडर है. जिसमे उन दोनों की आत्मा आज भी भटकती...

    P
    pkatira
    to me
    Jan 1Details
    pkatira has left a new comment on your post "आज मेरे हाथ में टोर्च थी.":

    Kunjal Pradip Chhaya & Pravin Miyatra प्रवीण तेरी बात बिलकुल सही है ... उनकी कोई मंजिल नहीं है ...

    ये घर नहीं खंडर है.

    जिसमे उन दोनों की आत्मा आज भी भटकती है...

    वो दोनों जीते जी भी भटकते थे .. तो मरने के बाद तो भटके गे ही...

    भटकना उनकी फितरत थी... वर्ना मंजिले कम न थी...

    सो मैने सोचा हर जगह इधर उधर भटके इससे बहेतर में उसे उसका मन चाहा .. यानी आत्मा ओका मन चाहा खंडर बना दु फिर दोनों भटकते रहे उन्ही खंडर में अंदर ही अंदर....

    और एक बात की मुझे कुछ नहीं आता ....

    वो घर कहो या खंडर सजाने वाला मेरा दोस्त हें ...

    बड़े जतनसे सजाया हें इन्हों ने ही इस खंडर को आज में उसका नाम ..

    सरा जाहिर करता हु...

    जिसने मेरे मेरे प्येरो की यारो की आत्मा की शांति के लिए...

    ये घर सजाया हें ...

    तो सुनिए उनका नाम हें ..

    આકાશી તેજપુંજ...આકાશી તેજપુંજ...આકાશી તેજપુંજ..

    આકાશી તેજપુંજ... આકાશી તેજપુંજ....

    दोस्त आकाश्या.... अज्ञानी ने लिखा है ...

    "अज्ञानी" जूठ अटल अचल है....
    और सच पल पल बदलता है ...

    माना की ये भी सच होगा पर ये भी गलत नहीं ....

    सब मिट शकता है पर सच नहीं मिट शकता और ये सच हें ....

    की इस खंडर तुने ही मुझे सजा दिया है बड़े प्यारसे ....

    देख फिर भी में तेरा शुक्रिया अदा नहीं करता ...

    क्यों की मै जानता हु ये सारा हिशाब है ...

    और हिशाब अभी बाकी है...

    આકાશી તેજપુંજ...अब इसे मिटाने का प्रयास ना करना ....

    उन दोनों को बड़ा दुःख होगा ....

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  6. જી, અનંત ના લખાણ ને વધુ સુંદર રીતે પ્રસ્તુત કરવા આપને મદદરુપ બની.. પણ જેમ આપને કોઇ મીત્ર એ બ્લોગ બનાવી આપ્યો અને આકાશે સજાવી આપ્યો... અને, કોઇ અગ્યાત ઋણ પુરુ જ કર્યુ છે...

    પરંતુ એ ભુતકાળની સજાવટ ક્યારનીય વિખરાઇ ગઇ.. હાલની સજાવટ ઉપર સંપુર્ણ રીતે આપનો અધીકાર છે... આ અધીકાર આકાશથી લેવાય એમ નથી...
    શુ અહી વસતા સૌ કોઇ બહેરા છે???? ધ્યાન બહેરા છે???? કે બેધ્યાનથી બહેરા છે??? કે એક જ નામ આમ વારંવાર પુનરાવર્તન મા લેવુ પડે..?



    વાત રહી હિસાબની.... તો એ તો ભવિષ્યમા જોયુ જશે... હા... પણ હિસાબ પુરા કરવાના ચક્કરમા નવા બાંધવાનો કોઇ ઇરાદો નથી...

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  7. અર્રે યાર્ર એ ક્યાં આપણાં હાથમાં છે.!
    જુના હિશાબ પુરા કરવા કે નવા શરૂ,
    એ આપણા હાથમાં હોય તો તો જોઈએ શું.!
    ખૈર વર્ષો પહેલાં ભાઈબંધ અનંતે
    એની કોઈક ચહીતીને કહેલી વાત..
    તું પણ વાંચવી હોય તો પ્રેમ થી વાંચ.!
    એ સારી વાત છે કે,
    તું તારા માં ડુબી રહી છે આજકાલ,
    કદિ' મારા માં પણ ડુબી હતી તું..!
    આમ તો જો કે હું પણ.!
    ખૈર...
    ડુબવુ બંને રીતે બરોબર છે, સારૂજ છે ડુબવુ.!
    જગ્યા ભલે અલગ અલગ હો ડુબવાની,
    રસ્તા પણ છો હોય અલગ અલગ મગર
    આખરે એકજ જગા પર ભેગા થાય છે.!
    અધ્યાત્મ પણ પ્રેમ સુધી જાય છે..!
    અને પવિત્ર પ્રેમ અધ્યાત્મ સુધી.!
    માટે મને આનંદ છે.
    અહીં નહીં તો તહીં મળીશુ..!
    મગર મળવાનું નીશ્ચીત છે.!
    આપણું.!
    એ વાત નોખી છે કે વાત નો તાર તુટી ગયો છે,
    કોઈ કારણસર જે અગમ તો નથીજ.!
    અને એ કારણ ખબર છે..!
    તને પણ અને મને પણ..!
    પણ,
    વાત અહીં હીશાબ ની છે.!
    જે કૈ થયુ, થઈ ગયુ! થઈ રહ્યુ છે જે કૈ પણ.!
    એ પણ એક હિશાબ નો જ હીસ્સો છે..!
    તો દુ:ખી થવા કરતાં
    એ હિશાબ ને હીશાબ મુજબ
    હસતા હસતા જ સ્વીકારી લેવામાંજ
    ખરી સમજદારી છે.!
    મને આટલું સમજાય છે.!
    તને પણ આ હકીકત સમજાય તો,
    શું ફર્ક પડે વાત થાય કે ન થાય.
    તને,
    હાં મને થોડો ફર્ક પડે અને,
    એ મારા પુરૂષ હોવાની સજા છે..!
    જે આમ તો જો કે મજાની જ છે.!
    હવે આખરી વાત "અનંત"
    કે,
    હિશાબ તો
    મારી પ્રીય ઈશ્વર પણ બદલી નથી શકતી.!
    તો,
    હું કે તું કહું તો શું કહું
    હું કીસ ખેત કી ગાજર
    ઔર તું કીસ ખેત કી મુલી.!
    "અનંત"
    વર્ષો પહેલાં ભાઈબંધ અનંતે આવુ કાં'ક
    એની કોઈ પરમ ચહીતીને કહ્યું હતું.
    * ભેદી બ્લાસ્ટ*
    "અનંત" તને કૈ ફર્ક નથી પડતો..
    મગર...
    મને પડે છે કારણ કે,
    માર્રો વાંક્ક એ છે કે હું નર છું.!
    "અનંત"


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