Tuesday, 31 December 2013

"अनंत" खुदको छुपाना आसा नहीं ....


जाने क्यों.... 

अभी अभी तो पोंछे थे आंशु जाने फिर क्यों उभर आये  आंसु. 
आँखों की इझाजत. लिए बगेर आंखोसे बहार  निकल आये आसू. 

नशीब से आंशु पोंछने वाला मिला था कोई . 
आंसु मेरे पोछते पोछते आंख उनकी भी रोई. 

अभी अभी तो मिले थे , की बिछडने का वक्त करीब आ गया. 
वो चले गए तो कौन पोछेगा, गर मेरी आंखोमे कल आये आंसु .

फ़िक्र उनकी हें या अल्लाह, मुझे मेरी नहीं कोई फ़िकर. 
ऐ खुदा इश्के आग लगाईं हें दिलमे तो ऐसा भी कुछ कर.

की इन आखो में कभी किसीके सामने भूले से भी आंसु ना आये. 
गर फिरभी कभी आँख रोये तो इश्क की  आगमे जल जाए आंसु. 

भीतर भीतर जागे,सोये तो इस लिए की कोई और जागा भी सोये.  
  हम अकेले में रोये बार बार मु धोए. हमें देख के कोई और ना रोये. 

"अनंत" दु:ख को छुपाना है, और जितना छुपा शकु खुदको छुपाना है,
बस इसलिए हम  बार बार मुह धोए  की  पानिमे मिल जाए आंसु .
   
"अनंत" 

"ब्लास्ट"

"अनंत" खुदसे खुदको छुपाना आसान नहीं.!
भीगी आँखे गवाही दे देती है . 
दू:ख को छुपाना आसान नहीं. 
तुजमे आज भी मै हु "अनंत"
और मुजमे है तू. यु तुजको छुपाना आसान नहीं..!  
"अनंत"

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