"अनंत"
एक ऐसा पिंजरा है .
जिसका दर खुल्ला है.
पहेले से टुटा है.?
नहीं नहीं ऐसा नही.!
ऐसा हरगीझ नहीं.!
कई पंछियों ने आ आके.!
उसे मरोडा तोडा है.!
आये गये खूब मज़ा लीया.!
फीर छोडा है.!
लेकीन अब क्या
दरवाजा हो या ना हो
फर्क नहीं पड़ता
कई पंछीओने आ आ के मजा लूंटा हें.
दरवाजा यु ही नहीं टुटा है.
अपनी मर्जिसे पंछी आये जाए .
रोकना चाहे भी तो पिंजरा रोक ना पाए.
क्योकि दरवाजा खुल्ला है.
सहा जितना, अब सहा ना जाये दर्द उतना.
सौचे तो सौचे बस ये पिंजरा इतना .
की कभी पंछीओ को भी ये ख़याल आये.
की "अनंत" पिंजरे को भी बहोत दर्द होता है.
"अनंत"
अपनी मर्जिसे पंछी आये जाए .
रोकना चाहे भी तो पिंजरा रोक ना पाए.
पिंजरे को भी बहोत दर्द होता है.
"अनंत"
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