Friday, 14 February 2014

आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया के मेरे .....



सूरजकी गरमी धरती निगल रही थी , धीरे धीरे रात भी ढल रही थी , 
बारिश का मौशमथा मिट्टी की भीनी भीनी खुशबु हवा के साथ चल रही थी...
मेरी इच्छा खंडर पर जाने को मचल रही थी .. . 

और आखिर .... 

देर रत के बाद मेरा चाय लेके महोल्ले में जानेका वक्त हुवा ,

और में निकल पड़ा चाय लेके महोल्ले की और ... 

बारिस के  मौसम में गीली सड़क पर चलनेका बड़ा मजा आता है ... 

वो पुरानी गली वो बर्षो पुराना महोल्ला और कुछ अजीब सी पुरानी खुशबु ...

हम तीनो को  बेहद पसंद थी ... 

बारिसके मौसममे ,

कभी कभी हम तीन यार देर रात के बाद,
  
ऐसी कुछ पुरानी गलियोमे घूमने निकल पड़ते थे ... 

जिस गलीमे बहोत से पुराने घर हुवा करते थे , 

बस इसे देखते देखते कुछ अजीब सा अहेसुस करते करते हम तिन यार ... 

अपनी मस्तीमे इधर उधरकी नई पुरानी बाते किया करते थे ... 

ख़ैर  छोड़ो  उन बातो को अब तो  वो राते वो बाते सारी, सिर्फ यादे बनके रहे गई है .. 

हां तो में चाय लेके चला महोल्ले की और ... 

चारो और घना अँधेरा था और में अकेला था ... 

दूर दूर कही कुत्ते के भोंकने की आवाज और किसी घरमे छोटे बच्चे के रोने की आवाज भी ! 

अँधेरी रातको रोनक बख्शती थी ... 

चलते चलते भीगे भीगे  मौसमका लुफ्त उठाते उठाते आखिर में महोल्ले तक पहोच गया .. 

पतली गलिसे गुजरके में महोल्ले के भीतर गया... 

हमारे उस खंडर का दरवाजा हमेशा की तरहा आधा खुल्ला था ... 

भीतर एक मोमबती का उजाला ... 

और मसाला बती की खुशबु से हमारा खंडर अंदर से भरा भरा  था ...  

कुछ पल दरवाजे के पास खड़ा रहेकर मेने गहेरी सांस ली ... 

और अगरबती के साथ बारिस की भीनी भीनी खुश्बुको मेने अपने भीतर भर लिया .. 

और फिर ... 

में अपने  जिश्मको समेटके भीतर गया ... 

अनंत और अज्ञानी मेरा और चायका इन्तजार किये बेठे थे ,

अपनी अपनी खुर्शी  संभाले हुवे ... 

तिन पुरानी खुर्शी और बिचमे ऐसी ही पुरानी टिपोय  ...

टिपोय के ऊपर एक पानिका लौटा और तिन काचकी पियाली ... 

रात होते ही अपनी अपनी जगे संभाल लेती थी... 



और हम तीनो , में, अनंत और अज्ञानी फिर अपनी अपनी जगे संभाल लेते थे ... 

अनंत और अज्ञानी अपनी अपनी खुर्शी संभाले हुवे बेठे थे ... 

में भीतर गया . और दोनों एक  साथ बोल उठे , आ गया परिया ... 

मेने भीतर जाके अपनी खुर्शी संभालते हुवे कहा  ... 

हां यार ... में आ गया ... आ ही गया ... 

अज्ञानी बोला , चल यार अब जल्दी से गरमा गरम चाय की पियाली भर ... 

और फीर अनंत बोला .. 

तो मेरा मेरा हाथ थम गया ... 

अनंत बोलने लगा , दिल खोलने लगा ...

बारिश के मौसम में गरमा गरम चाय पीना बड़ा अच्छा लगता है ... 

हाथमे जब गरमा गरम पियाली पकड़ते है तो ऐसा लगता है जेसे,

 प्रियतमा की पतली कमर पकड़ी हो ... 

और फिर गरमा गरम चायका घूंट .. 

जेसे ठंड में प्रियातामा की बाहोकी  गरमा गरम हूंफ...    

पियाली होठे से लगती है तो ऐसा महेसुस होता है जैसे प्रियतमा के होठो से होठ मिले हो ... 

और कसके चुमते हो ..... 

बारिश के मौसम में ... 

में और अज्ञानी उछल पड़े और एक साथ बोल उठे  , 

वाह वाह ... वाह वाह क्या बात है अनंत तूने तो चाय पिने से पहेले ...

चाय पे चंद शेर क्या सुना दिए ऐसा लगा जेसे चाय पे चार चाँद लगा दिये ... 

मेने अज्ञानी के सामने देखते हुवे कहा यार ... 

 अनंत पे बारिस छा गई है ... 

अज्ञानी बोला हां यार हवामे मिट्टी की भीनी भीनी खुशबु जो आ रही है ... 

अनंत बोला चल भई चल परिया अब चायकी पियाली भर ... 

बातो बातो में चाय ठंडी  हो जायेगी ... 

बाते तो होती रहेगी रात भर ... 

मैने चायकी तीनो पियाली भरदी ... 

अपनी अपनी पियाली उठाके हमने चियर्स किया और चुस्की भरनी शुरू करदी ...  

चायकी चुसकी भरके मेने , 

अनंत और अज्ञानी के सामने देखते हुवे कहा ,

 चलो यार आज हम विचार पर कुछ विचार करते है... 

अज्ञानी ने सीधे कहे दिया यार बड़ा अच्छा विषय है परिया ... 

अब तो लोग विचार के व्यापार करते है ... 

मेने कहा , यार में कुछ समजा नहीं... 

हां वेसे भी तू कब समजता है ... 

अरे यार तो समजाना ..! 

हां , समजाना तो पड़ेगा तुजे ... 

तब ही तो कुछ समज में आएगा मुझे ... 

अरे यार तू फिर ऐसी बात बोला जो उपरसे जाए ,पर मेरी समज में ना आये ... 

मेरे और अग्यानिके बिच बाते शुरू हो गई .. 

हमारी बात चल रहीथी उस दोरान अनंत अपना वही पुराना दिवारपे लटकता पेड़-

जिसमे कुछ पुराने कागज़ हमेशा लगे रहेते हे,

 जिसमे अनंत और अज्ञानी ... 

दिन भर कुछ ना कुछ लिखते रहेते है . 

वो पेड़ उतार कर अनंत कुछ लिखने लगा ... 

मेरी और अज्ञानी की बात आगे बढ़ी ... 

मेने अज्ञानी से कहा तूने जो दो बाते कही वो मेरी समज मे आई नहीं ... 

अब जरा विस्तार से समजा ... 

पहेले तूने कहा "अब तो लोग विचार के व्यापार करते है ... "

और फिर तूने कहा "हां समजाना तो पड़ेगा तुजे ... 

तब ही तो कुछ समज में आएगा मुझे ... "

अज्ञानी ने कहा सीधी सी बात है .. 

विचार में बड़ी ताकत होती है ये बात पहेले कुछ चंद लोग ही जानते थे ... 

लेकिन वो किसीको बताते नहीं थे ... 

फिर कुछ और लोग भी पुराने ग्रंथ  पढ़ पढ़ के ये बात जान गए ... 

फिर उसने सोचा चलो हम ये बात दुनियाको बताते है, समजाते है.. 

 इसका हमें पैसा भी मिल शकता है... 

फिर उसने धीरे धीरे इस विचारको आगे बढ़ाया ... 

पुराने ग्रंथो में से चुरा चुरा के अपने तरीकेसे नया पुस्तक बनाया ... 

और थोडा बहोत समजाके लोगोके हाथ में अपना पुस्तक थमा दिया ... 

और ढेर सारा रूपया भी कमा लिया ... 

हुवा  ना विचारों का व्यापार ... 

मेने कहा, हां यार... 

फिर दूसरी बात का क्या मतलब ... 

वो भी आसान सी बात है ... 

तुजे ये भरम हे की में बहोत कुछ जानता समजता हु ... 

लेकिन हकीकत ये हे परिया की वैसे में कुछ भी जनता नहीं ... 

लेकिन जब कभी तू कुछ सवाल करता है, 

तब ना जाने कैसे अचानक ... 

तेरे सवालों के कुछ  जवाब मुझे मिल जाते हे.

 और में तुजे समजाने लगता हु ... 

और ऐसे तुजे समजाते समजाते ,

में कुछ कुछ बहोत ही थोडा कुछ समजने लगता हु ... 

लो  अब हो गई तस्सली ... 

हां थोड़ी थोड़ी ... 

काफी है परिया ... 

ज्यादा समज कर भी क्या करना है ... 

जितना कम जानो उतना जीने का मजा है ... 

ख़ैर ... 

मेने कहा ऐसा ही सही... 

फिर मेने अनंत की और ध्यान लगाया ... 

वो कुछ लिख रहा था मैने अनंत से पूछा ,

क्या लिख रहा है अनंत ..?

जरा हमें भी बता,  या, फिर सुना ...

अनंत लिखने में इतना डूबा था की में बोला बो भी उसने सूना नहीं ... 

फिर मेने अनंत को कंधे से हिला के कहा यार तुजे कहेता हु सुनता नहीं क्या ... 

लिखते लखते ही अनंत बोला ... 

हं , हं , हां  हां ... ऐसे हूहू हाहा करके फिर अपनी लिखावट पूरी करने में खो गया ... 

लिखावट पूरी हो जाने के बाद ही ...

अनंत मेरे सामने देखके बोला .

अब बोल तू क्या कहेता था परिया ... 

अरे भई में कुछ कहेता नहीं था,

 में  तो तुजे पूछता था ..! की तूने क्या लिखा ...? 

हां वो तो में बताऊंगा लेकिन बादमे ,

पहेले जब में लिख रहा था ,

उस दौरान  तुम दोनों के बिच क्या बाते हुई ये तो बताओ ...! 

अब अज्ञानी मौन हो चुका था ... 

मेने कहा हमारी बात विचार पर चल रही थी अनंत ... 

हम विचार पर विचार विर्मश कर रहे थे ... 

विचार यानी सोच , यानी ख़याल ... 

अनंत ने विचार के दुसरे मतलब बताये ... 

मेने कहा हां वही ... 

सोच, विचार, ख़याल जो भी कहो ... 

आखिर मै सारे एक ही मोड़ पर आके खड़े रहेते है . है ना अनंत..?  

हां सायद ऐसा ही कुछ हे परिया .... 

लेकिन फिरभी ऐसा नहीं   ... 

सोच अलग, विचार, अलग और ख़याल भी अलग ... 

वेसे ख़याल को विचार भी कहते हे , और खयालका दूसरा मतलब ध्यान भी है ... 

जैसे कोई माँ अपने बड़े बेटे या बेटी को कहेती है जावो बहार जाके खेलो .. 

लेकिन छोटे बच्चे का ख़याल रखना यानी ध्यान रखना कही उसे चोट ना आये ... 

ऐसे  ख़याल विचार से अलग हुवा ... 

और फिर सोचना मतलब अब सोचना उन बच्चो को हे की,

 उस नन्हे का ख़याल कैसे रखना है .. 

ऐसे सोच और विचार भी अलग हुवे .. 

समजा कुछ ... 

मेने कुछ ना समजते हुवे भी कहा हां थोडा बहोत ... 

अनंत ने  कहा काफी है ... 

और ना ही समजे तो और भी बहेतर ...  

मेने कहा वो केसे ? अब ये भी समजा ...

मेरी उस बातको टालते हुवे  अनंत ने कहा .. 

परिया आदमी एक पल के लिए भी...!

 खाली बेठता नहीं और चाहे भी तो बेठ शकता नहीं ... 

विचार जो हैना परिया ,वो अकसर सतत आते जाते रहेते है... 

कभी ये कभी वो कभी इसका कभी उसका तो कभी खुदका ... 

अनंत बोल रहा था में सुन रहा था ... 

वैसे मौन आँखे मींचे अज्ञानी भी सुन रहा था ... 

मेने फिर अनंत की बातो पर ध्यान लगाया ... 

मेने अनंत से पूछा अनंत क्या विचारों को रोका नहीं जा शकता ... 

बड़ा ही मुश्किल है परिया विचारोको रोकना ... 

और अब आता है सोचना , हम सोचते कम है ... 

और सोचने का ख़याल भी हमें कम आता है  ... 

विचार आते जाते रहेते है ,

लेकिन कहा से आते हे क्यों आते है ..

कहा जाते है केसे जाते है , 

ये कोई नहीं जान शकता ... 

क्योकि कोई सोचता ही नहीं ..!

कभी कभी तो ऐसा होता है परिया की , जिसे कभी हमने देखा ना हो ,

जिसके बारेमे हमने कभी सोचा भी ना हो ,ऐसी व्यक्तिके विचार भी..!

 हमारे दिमाग में कभी कभी आ जाते है ... 

फिर उनका विचार हमारे झहेन में क्यों आया ? 

जिनको हमने कभी देखा तक नहीं जिसे हम जानते तक नहीं ... 

इस बारे में हम कभी सोचते ही नहीं ... 

अगर सोचे तो सोचने से पता चलता है की,

 उनसे हमारा कोई न कोई रिश्ता तो जरुर है .. 

रिश्ता आज कलका  ही हो , ऐसा नहीं होता , 

कभी पल दो पल का रिश्ता, 

हम भूल जाते है, 

लेकिन वो रिश्ता ,वो पल दो पलका मिलाना...  

 हमारे भीतर गहेराइसे  अपनी पकड़ जमा लेता है ... 

कोई कोई रिश्ता  बहोत पुराना रिश्ता भी हो शकता है ... 

बहोत ही पुराना मतलब युगो पुराना ... 

मेने कहा तो क्या अनंत विचार का आना कभी  अटकता नहीं ..? 

तब जाके अनंत बोला ...! 

विचार का आना जाना सास थमने के बाद भी चलता रहेता है ... 

परिया यु तो विचार कभी अटकता नहीं लेकिन कभी कभी ... 

किसी एक पे जाके अटक जाता है ... 

फिर सारे विचारोसे ध्यान भटक जाता है ...! 

अनंत ने फिर उल्जाने वाली कोई नई बात छेडी ... 

मेने कहा यार तू मेरी गुथली सुल्जाने के बजाय उल्जाये जा रहा है.... 

तो अनंत गुस्सा होके बोला,

 चल फिर भाग यहा से ! जा ! घर जाके सोजा ... 

ऐसे बात करता है जेसे में खुद सुल्जा हुवा क्यों ना हो .. 

मैने कहा. इसमें इतना गुस्सा क्यों होता है ... 

अनंत ने कहा. फिर ! क्या करू यार  में खुद भी  उल्झा हुवा हु ... 

तू सवाल करता है और में जो जीमे आये बिना सोचे समजे जवाब देता हु ... 

मुझे खुद पता नहीं में तुजे क्या कहेता हु ... 

कल को अगर फिर तू पूछेगा तो हो शकता है बात बदल जाए ... 

या फिर मेने तुजे क्या क्या कहा था मुझे याद ही ना आये ... 

मेने कहा.  छोडना यार हमें कोनसे मेडल लेने जाना है ... 

ऐसी वेसी बाते कर कर के बस रात ही तो बितानी है ... 

अनंत बोला हां यार ये तो ठीक है ये बात तू बरोबर बोला ... 

मेने कहा . 

क्या यार तू अनंत भी ना  सच में बड़ा भुलक्कड़  है. 

अरे यार ये बात भी मेने तुजिसे तो जानी है , शिखी है,  समजी है.. . 

अनंत बोला . हां हवे...  ये सब ऐसा वैसा भी ..!यहाँ याद किसको रहेता है ..! 

मेने कहा चल फिर अब आगे चला ...

हां  तो में क्या कहे रहा था ..? 

अनंत ने मुझसे पूछा .. 

मेने कहा  तूने कहा विचार किसी एक पे अटक जाता है ऐसा कुछ ... 

हां..आ.अ.अ.अ. याद आया ... 

हां तो विचार किसी एक पे तब अटकता है,  जब हमारे दिलमे ... 

कोई खटकता है , या फिर हमारी आंखोमे किसीका चहेरा बसता है... 

बस तब जाके विचार थमता हे,

 एक उसी पर जो हमें हमारी नजर को हमारी रूह को 

हमारी आँखों को भा गया हो.

 फिर बस हम और हमारे विचार उसीमे अटक जाते है   .. 

हमें सिर्फ उसीका ख़याल आता है ... 

ऐसे जेसे अब मुझे नींद आती है ,तो मुझे बस नींद ही आती है ... 

मेने कहा वो सब तो ठीक है नींद तो मुझे भी आती है ... 

और अज्ञानी तो कबसे सो गया है ... 

उसका नाम लिया नहीं की अज्ञानी आधी आँखे  खोल कर 

अपनी दाढ़ी में उंगली घुमाते हुवे बोला ... 

यारो में सोया नहीं जाग गया हु ! 

सोये तो तुम हो ,जो  जागे नजर आते हो ... 

कबसे सुन रहा हु तुम्हारी बे मतलब की बकबक ... 

अनंत बोला मुझे पता हे अज्ञानी .... 

ये सब तू परिया को बता  ..! मुझे नहीं ...! 

मैने कहा ख़ैर .... 

अब छोड़ो भी यार... 

मेरा जी अनंत के उस कागज में अटका है ,

जिसमे उसने अभी अभी कुछ लिखा है ... 

अज्ञानी गुस्सा हो के बोला .

लो अब वो एक बाकी रहे गया था ...! 

इतनी बक बक की अभी अभी फिर भी थके नहीं तुम ..!  

अभी तुम्हारा जी नहीं भरा ... !

अनंत ने कहा .

यार में तो  सोते सोते निंदमे ही बाते कर रहा था ...

इसलिए मुझे तो कोई थकान महेसुस ही नहीं होती,  

बल्की आराम... ही आराम है ... 

मेने कहा  फिर मेरी नींद का क्या ... 

मुझे तो गहेरी नींद आ रही हे .... 

वो दोनों एक साथ बोले तो जा जाके सोजा किसने है तुजे रोका ... 

मेने कहा हां हां चला जाऊँगा ... चला ही  ! जाऊँगा ...आखिर....   

लेकिन .... 

वो दोनों एक साथ बोले . लेकिन क्या परिया... 

मेने कहा वो झरिया ... 

और वो दरिया ... 

अनंत बोला कौनसा झरिया परिया ... 

मेने कहा वो जो मुझे तुम्हारे पास खिंच लाता है ... 

अज्ञानी अपनी दाढ़ी पर उंगली घुमाते हुवे बोला ... 

ये लो अब ये बाकी रहे गया था पहेलियाँ बुजाने में,

 सो उसने भी शुरू कर दिया ... 

अनंत बोला. 

 यार परिया साफ़ साफ़ बोल कोनसा झरिया कौनसा दरिया ...?

मेने कहा वो जो हो कर भी नहीं है हमारे दरमिया .... 

अनंतने मुझे  कहा . 

क्या बोले जा रहा है तू परिया ...! 

कौन हो कर भी नहीं है हमारे दरमिया .... ?

मैने कहा. 

यार वो तो मुझे  भी पता नहीं.. लेकिन ... 

तूने अभी अभी जो कुछ लिखाहे  , बस वो मुझे दिखा  दे ... ! 

फिर में सो जाऊँगा ... 

अनंत ने वो पेड़ मेरे हाथमे थमा दिया , 

और कहा . ये ले पढले और फिर घर जाके सोजा ... 

फिर में ये अनंत की लिखी रचना पढने लगा ...

जिसका शीर्षक था 

@@@@@ 

यु ही तो कुछ भी होता नहीं ...

@@@@@@

युही तो कुछ इस दिलके जहा में होता नहीं.
होता है क्यों मगर यु ? मुझे कुछ पता नहीं. 

उसका चहेरा इस कदर उतर गया है दिलमे ,
की अब दिमाग उसके सिवा कुछ सोचता नहीं. 

आ गई होगी सायद उसे भी याद बिछड़े यार की , 
वर्ना कहानी मेरी सुनके युही तो कोई रोता नहीं. 

कभी जो बर्षो में नहीं होता, होता है कभी तो वो ,
बस इक पलमे. सब बदलता है ,दिल बदलता नहीं .

वो भी मेरे बारे में सोचती रहेती है दिन रात . मुझे भी तो - 
हे उनका ही ख़याल. अब सोचमे हमारी कोई फासला नहीं . 

अजीब !  कुछ तो अजीब है.! उसके चहरे में, उसकी बातो में . 
वर्ना युही ये दिल मेरा मुझे , कभी किसीके पास खींचता नहीं 

सब कुछ बदलता हे,  लोग बदलते है पल पल, और पल पल सच-  
 बदलता है  दुनियामे. बस एक रात और दिन , कभी बदलता नहीं .      

जानता नहीं में , जाने क्यों  वो मेरे बारेमे जानना चाहते है ?
लोग बहोत कुछ.! जिनके बारे में,  तो कुछ भी जानता नहीं ! 

बस कुछ वजे है ऐसी नई पुरानी की , में इकरार करता नहीं. 
इनकार भी तो नहीं करता . ऐसा नहीं की में उसे चाहता नहीं .
  
फिर मेरे दिलमे भी .!जाग उठती है , उम्मीद दिल लगानेकी   
 ऐसे जेसे की में,  दिल लगानेकी , दर्दनाक सजा जानता नहीं . 

फिर भी क्यों तेरा दिल किसीसे फिर दिल लगाना चाहता है ?
"अनंत" जब तू जानता है..
 की,  इश्कमे जो डूबता है,  वो मरता नहीं, और बचता नहीं .
*ब्लास्ट* 

"अनंत" कोई तो रिश्ता होगा हमारे बिच ..! 
नया ना सही पुराना ही सही  ! 
वर्ना दूर दूर रहेते हुवे भी ..!
कोई एक दुसरे के बारेमे इतना सोचता नहीं ..! 

"अनंत"

इतना पढके आखिर में मुझे फिर अनंत का ये शेर याद आया .. 

वो अकसर मुझे ऐसे कहेते हुवे ये शेर सुनाता था . 

अनंत कहेता था मुझे की परिया... 

उम्र भर मिटती नहीं "अनंत" ये दो भूख ..!
एक प्रेमी की इच्छा और दूजी प्रेमी से हूंफ ..! 

"अनंत"

उनकी इझाझ्त लेते हुवे मेने कहा .. 
चलो यारो अब तुम भी सो जावो और में भी ...  

   



No comments:

Post a Comment