Friday, 4 July 2014

इस रचना का आज से कोई लेना देना नहीं...


"अनंत" युतो ना रुठते वो, कुछ तो कमी होगी मुजमे 
कुछ कमीना पन भी !
  में तो कबसे ये मानता हु. मगर खुदमे जो कमी थी वो उसने कभी ना मानी. 

ये सिर्फ मेरी नहीं हर किसीकी बात है...
 अनंत ने बर्षो पहेले एक रचना लिखीथी ... 

"अनंत" खाव्हिसे सारी हो जाए पूरी मै नहीं चाहता
सपने कुछ अधूरे हो तो जिनेका बड़ा मजा आता है,
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दुःख भी हे, हर सुख यहाँ नहीं मिलता हर किसीको
कमी भी हे. सब कुछ यहाँ नहीं मिलता हर किसीको.

कुछ बुराई खुदमे, और कुछ लोग भी बुरे मिलते है.
सब कुछ अच्चा ख़ासा नहीं मिलता हर किसीको . 

कुछ ना कुछ कमी यहाँ सभिको  होती है महेसुश
सब कुछ यहाँ मन चाहा नहीं मिलता हर किसीको.

घना अँधेरा भी मिलता है. टिमटिमाती रौशनी के साथ.
अच्छा है, एक अकेला उजाला नहीं मिलता हर किसीको.

जो चाहे , वो ही पाए, वो ही जीवनमे आये और छाये.   
ऐसा प्यारासा साथी माँगा नहीं मिलता हर किसीको. 

जो मिलता है उसे ही चाहना निभाना होता है प्यारसे.
जिसे सचमुच दिलसे चाहा, नहीं मिलता हर किसीको.

माना "अनंत" ख्वाहिशे मरते दमतक ख़त्म नहीं होती.
लेकिन जिनेका मुजसा बहाना नहीं मिलता हर किसीको.  

"अनंत"

ये सारे गीत मेरी पसंद के है. आपकी आप जाने.... 



















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