Sunday, 1 March 2015

बात एक रातकी ...


हम जब देर रात के  बाद मिलते तब बहोत सी बाते होती थी ... 

लेकिन वो फिर कभी... 

आज बस इतना ही ... काफी ...  

एक बार मेने अनंत से कहा ...

यार आज तू मुझे कुछ इन्सांकी भूख के बारे में बता 

तब उसने कहा देख परिया इनसानी भूख... 

कई और कई प्रकारकी होती है..!  

और वो सारी भूखे कभी ना कभी तो मिट ही जाती है ... 

लेकिन ....

दो भूख ऐसी भी हे जो उम्र भर नहीं मिटती .. 

मेने पूछा वो कौनसी भूख है अनंत जो कभी नहीं मिटती ..... ? 

तब उसने अपने नाम का बखूबी इस्तेमाल करते हुवे कहा ... 

उम्र भर मिटती नहीं :अनं..... त"  ये दो भूख. 

एक प्रेमिकी इच्छा और दूजे प्रेमिसे हूंफ .....!

"अनंत"

पहेली लाईनमे अपने नामका बखूबी इस्तेमाल करके.... 

लम्बासा खिंचके उसने बड़ी सिफतसे कहे दिया की... 

सारी भूख एक तरफ प्रेम की भूख एक तरफ... 

सारी भुखोका कभी ना कभी तो अंत आता ही है लेकिन ... 

एक प्रेम है जिसकी भूख  कभी नहीं मिटती .. 

प्रेम की भूख अनंत है.... 

मेने पूछा ऐसा क्यों प्रेमकी भूख ही क्यों अनंत.... ?

तो उसने कहा हर इंसान प्रेमही से तो पैदा होता है....

अब प्रेमसे पैदा जो हुवा वो प्रेमा ही चाहेगा ना,, 

मैने कहा हां.....  

जो जी जानसे जुड़ा हो उसका अंत भला कैसा.... 

वो तो अनंत  ही होगा ना.... 

मेने कहा हां.... 

फिर उसने कहा.... 

प्रेम तो सभीसे होता है... 

जन्मके साथ ही हमारा  जिन किसीसे भी रिश्ता जुड़ता है .... 

हम उन्हिसे प्रेम चाहते है और उन्ही को प्रेम करते है.... 

लेकिन उसके वाद जब हम जवा होते हे तब कीसी अजनबी की तरफ खींचे चले जाते है..

मर्द ओरत के और ओरत मर्द के प्यार की तलास करने लगता है जो अजनबी हो... 

सबका प्यार एक तरफ और स्त्री और पुरुषका प्यार एक तरफ .... 

प्यारमे सिर्फ शारीरिक संबंध माइने नहीं रहेता .... 

बल्कि एक दुसरेकी हुन्फ़ अहेम होती है...

बाकी जो घटना घटती है वो तो क्षणिक होती है ....  

ख़ैर प्रेम का या प्रेमकी बातोका कोई अंत नहीं है... 
अनंत एक प्रेम पुरुष है कोई साधू या संत नहीं है... 

अपने बारेमे इतना कहेके उसने मुझे कहा परिया .... 

रात बहोत हो चुकी है अब तू सोजा मुझे भी निंदसी आने लगी है.... 

उनका ये शेर मुझे बेहद पसंद है... 

इस लिए इसे बार बार दोहराना मुझे अच्छा लगता है...  

बस आज इतनाही ... 

बाकी कहानी फिर कभी.....:)

*બ્લાસ્ટ* 

અનંત ઉત્સાહિત થઈ ગાવા લાગ્યો... 
આનંદ સાવ મફતમાં આલુ  . 
છતાંય  હું મસ્તીમાં મ્હાલું .  
આ જીવન  મારી જાગીર છે !
મારી મરજી મુજબ હું જીવું.    
લે, તમે કહો એમ થોડો ચાલુ . 
હું "અનંત" પ્રેમ પુરુષ છું . 
અને પ્રેમ અનંત..... છે .
ખબર નૈ કેમ કોઈને આટલું -
સમજાતું નથી સ્સાલું.  
"અનંત" 
અનંતનું આ ગાન સાંભળી અજ્ઞાની  બોલ્યો.. 
બૌ હોશિયારી ના માર અનંત .... 
અને પછી એને અનંત ને કહ્યું... 

"અજ્ઞાની"કોઈ કાયજ મફતમાં નથી આલતુ . 
મફતમાં આલવાની વાત જ છે સાવ ફાલતુ. 
આપવા માટે કોઈ આપતું નથી . 
પામવા માટે જ સૌ આપે છે અહી. 
જે આપતું તેજ પામતું . 
આટલું અનંત જાણ તું . 
"અજ્ઞાની" 
..... 'ને પછી હું તો ચૂપ ચાપ રવાનો થઈ ગયો.... 

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