Monday, 2 March 2015

अनंत ने बर्षो पहेले कहा था, में उसे खोजता हु...



में उसे खोजता हु "अनंत" युगोसे... 
जिसे मेरी ही तलब-ऑ तलास हो... 
 

बर्षो पहेले की बात है...
वही पुराना खंडर और वही में अज्ञानी और अनंत...
उस रात चाय के बाद हमारे बिच बहोत सारी बाते हुई...
बात करते करते बात पहोंची प्यार तक,
तो बात यु शुरू हुई. मेने अनंत से पूछा यार तू मुझे ये बता
की तू किस किसमका प्यार चाहता है ?
और अगर तू किसीको प्यार करना चाहे तो किसको प्यार करेगा ?
तेरी वो कल्पना केसी होगी...?
तब जाके उसने बताया कल्पना कभी भी बुरी नहीं हो शकती...
कल्पना में की गई हर इच्छा इतनी आसानीसे पूरी नहीं हो शकती...
मैने कहा फिरभी...!
तब जाके उसने बताया ...
देख परिया में किसीके पीछे भागूँगा नहीं...
जो मुझे नहीं चाहेगा उसे में कभी चाहूँगा नहीं...
में ऐसे प्यार को खोजूंगा. जिसे भी ! मेरे प्यारकी तलास हो...
मुझे जीतनी प्यारकी प्यास है, उसे भी उतनी प्रेमकी प्यास हो...
ऐसी मेरी सौच और खोज होगी...
इसकी बात सुनके अज्ञानिने कहा ...
देख अनंत प्रेम अनंत है अनंत कालसे है और-
अनंत काल तक रहेगा. लेकिन....
मन चाहे प्यारको पाना या चाहा प्यार मिल जाना...
ये तो सबके अपने अपने हिसाब पर निर्भर है...
हमें यहा जो भी मिलाता है. हिसाबके मुताबिक़ मिलता है...
बहोत से लोग इस हिसाब को नहीं समजते ...
इसी वजेसे दु:खी होते है और रोते है..
जब की हमें ये बात समजमे आ गई है.
 इस लिए हम तीनो हर हालमे खुश है...
आम लोग इस बातको नहीं समजते.    
इस अज्ञान के कारण...
हर इंसान अनंत कालसे भटकता है...
पहेले अनंत फिर अज्ञानी बोल रहा था और में सुन रहा था.
मुझे बड़ा मजा आ रहा था.
अज्ञानी बातको आगे बढ़ाते हुवे बोला...    
हिसाब के मुताबिक कही दो जिस्म मिलते है तो रूह नहीं मिलती...
और कही रूह मिलती है तो जिस्म नहीं मिलता..
और फिर बातो बातो में अज्ञानी ने ये बात कहेदी की... 
वैसे रूह और जिश्म मिलाना दोनों का जरुरी होता है...
लेकिन कभी पास पास और साथ साथ रहेते हुवे भी !
दो जिस्म तो मिलते है. लेकिन रूह का मेल नहीं होता ... 
इस वजहसे जो तकलीफ ओ परेशानिया मिलती हे,
 बस वो पुराना हिसाब होता है.   
और कही रूह मिलती है तो दो जिस्म नहीं मिल पाते...
ये भी आखिर पुराना हिसाब ही होता है...
जब तक के पुराना हिसाब चुकता ना हो ...
तब तक जिस्म और रूह दोनोंका एक साथ मिलाना मुमकिन नहीं ... 
और हां अनंत तूने पहेले पहेले कहा की ... 
"कल्पना में की गई हर इच्छा इतनी आसानीसे पूरी नहीं हो शकती...
"पर मेंरा मानना ये है की, अगर कोई भी इच्छा अगर द्रढ़ता से की जाती है तो, 
वो कभी ना कभी इस जनम में नहीं तो अगले जनममे पूरी जरुर होती है..!

इच्छा गर दृढ हो तो इच्छा के मुताबिक़ मिलाता है..!
वर्ना जो भी मिलता है हिसाबके मुताबिक़ मिलाता है..!

पर जिसको भटकने में ही मजा आता हो उसकी बात ही कुछ और है... 

और तू भटकता है.. 
अनंत मुश्कुराकर बोला...  
हां अज्ञानी तेरी बात बिलकुल सही है,
 लेकिन फिर भी..!
इतना बोलके वो कुछ लिखने लगा ...
अब वो, आगे क्या बोलेगा...
ये सुनने को ममेरे और अज्ञानी के कान बेकरार थे...
थोड़ी देर खंडर में ख़ामोशी सी छा गई....   
कुछ देर बाद अनंत ने वो कागज मेरे हाथमे थमाते हुवे कहा ...
ये ले पकड़ और पढ़ इसमे तेरे उस सवाल का जवाब है .
जो तूने मुझे पूछा था ..
में उनका लिखा जवाब पढ़ने लगा ...
आप भी पढ़िए...
@@@@@@  

मेरी खोज .. मेरी तलास..  

वो ही ! हमारे लिए ख़ास हे ! जिनके लिए हम ख़ास हो.!
जब तक वो ना मिले, दूर ही सही, दिलसे मगर पास हो.!

में प्रेमका दरिया नहीं ! झरना हु. फिरभी हु में प्यासा.
उस प्रेमको ढूंढ़ता हु में, जिसे, मेरे प्यारकी प्यास हो.

प्रेम अनंत है अनंत कालसे हे और अनंत काल तक रहेगा.
होगा कही तो तुमको भी चाहने वाला. तुम ना यु उदास हो.

वैसे तो हर लम्हा में अपनी ख़ुशी मस्तीमे जीता हु, तब तक
में उदास नहीं होता, जब तक मेरे बगैर, ना कोई उदास हो.

हां अनंत कालसे भटकता हु अज्ञानी की तरहा. और मे सिर्फ
उसे ही ! खोजता हु. मेरी ही तरहा जिसे सिर्फ मेरी तलास हो.!

अनंत
Darshna Suraj Faasle kuch rishto ko chhu nahi paate...baaki nazdikyon ne tode hai dil bahut!!

आपका ये  शेर पढ़ते ही में अपने घरके ऊपर वाले कमरे में गया.... 

जहा इक अलमारी में अनंतका ..

लिखा बहोत सारा साहित्य पड़ा है ... 

अच्छा लगता है मुझे , कुछ मोके  पर,  

उसका लिखना पढना और लिखना....

तो उनमेसे मुझे एक ये शेर मिला.... 

तो  उसने लिखा था..... 

ऐसा  भी होता  है इस जमाने में... 
ऐसा ही होता था,  उस जमाने में... 

आये गए हर वक्त्की तासीर देखके... 

"अनंत" सोचता हु में... 

ना मजा है बहोत दूर जाने में... 
ना मजा है ज्यादा पास आने में... 

"अनंत" सही मजा  हे जीवनका. 
जो मिला उसीका लुफ्त उठाने में. 

"अनंत" 


हां ऐसा उसने बर्षो पहेले बहोत सोचके  लिखा था... ! :)



*બ્લાસ્ટ*
પ્રથમ જુદાઈમાં કેમ જીવવું . 
એ મારગ મને તું ચીંધી દે..! 
"અનંત" પછી તું તારે, 
પ્રે.....મ,થી..!
મારુ હ્રદય વીંધી દે..!  
"અનંત"
હાં પણ, લે !  
પછી અધમૂવા થઈ જાય એના કરતાં .... 
શબ્દો ભલે ને ઉછીના હોય .... 
એટલે કે ભાઈબંધ ના હોય..! 
મારુ તો એવું કે ચેતવી દેવું ને ચેતતું રહેવું..... :) 
*બ્લાસ્ટ*
"અનંત" તુંય ઠરેલો જાણી, અંગારાને હાથમાં લઈલે, 
'ને,પછી તારીયે હથેળી દાજી જાય તો મારો વાંક નૈ ..!
"અનંત" 
શબ્દો છોને ઉછીના યાને પરકા હોય, 
પણ, લાગણીઑ પોતાની હોવી જોઇયે.! 
વાંચે જ્યારે જ્યારે પણ કોઈ મને "અનંત" 
હોઠ હસવા જોઇયે ને આંખ રોવી જોઇયે 
"અનંત"   
આવું આવું તો એ બેઉ ,  બૌ બધુ મને સોંપી ગ્યાં  છે... ! 
એક આખી ઉમર ઓછી પડે એટલું બધુ હોં, હાં... :)

“अनंत”
ऐसा नही की कही नही होगी वो. 
कही ना कही तो, छुपी होगी वो. 

अगर मे उसके बारे मे सोचता हु, 
तो मेरे बारेमे भी सोचती होगी वो. 

जैसे मे भटकता हु खोजता हु उसे, 
इधर. उधर मुजे भी खोजती होगी वो. 

"अनंत" जीवनी की इस यात्रा मे जब - 
कभी कही मीलेगी तब होगी वोही वो. 

"अनंत" भीडमे से पहचानकर.. भीड चीरते हुवे पास-  
आकर, जो मुझे सीनेसे लीपट जायेगी वोही होगी वो. 


"अनंत "


San Patel shared a photo to your timeline.
The walking dream..
Unlike · Comment · 
  • You and Kaushik Savariya like this.
  • San Patel ANANT ne sodhati ANAMIKA
  • Katira Paresh San Patel એ ખોવાઈ જશે....
  • Katira Paresh San ભઇ આ ચિત્ર સમેત હું તારું હ્રદય પૂર્વક સન્માન કરું છું ... 

    બસ આટલું જ નહીં બલ્કે હું આ ચિત્રને ..


    હાં તમારા તરફથી મળેલા આ સુંદર ચિત્રને મારા નાનકડા ઘરના મુખ્ય દ્વાર પર લગાવીને...તમારું અને અનામિકાનું સન્માન કરીશ...  

    ફેસબુક જીવન દરમ્યાનની આ પ્રથમ ઘટના હશે શાન કે મારા ઘરના મુખ્ય દ્વાર પર ANAMIKA નામની અનામી સ્ત્રીનું ચિત્ર સ્થાન પામશે ....









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