Saturday, 4 April 2015

अनंत के छोटे मोटे शेर...



कोई बात नहीं मैदान में आइये ना आइये ...
लेकिन तबियत अच्छी खासी होनी चाहिए...

रूबरू ना सही कभी रूह-रूह मिलो चलेगा...
या फिर कभी ख्वाबमे आके मिल जाइए... 

"अनंत" तो तन्हाई में भी जीना जानता है...
पूरानी यादो के सहारे आप भी याद बन जाइए...


*ब्लास्ट*

कहो क्या तकलीफ है तुम्हारी ? हम आपका गम दूर तो -
ना कर शकेंगे लेकिन कमसे कम कहेके आप हलके हो जाइए ..

फिर में अपना टुकड़ा टुकड़ा समेट रहा हु ..
"अनंत"इन टुकड़ो से फिर में जुड़ रहा हु...

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