Tuesday, 19 January 2016

आखिरकार मुझे मिल ही गई अनंत के साहित्य से "अनंत" की लिखी "अनंत" समयकी रचना .....





समय कभी रुकता नहीं..!
समय कभी जुकता नहीं..!

समय की जपटमें गरीबो-तवंगर है आ जाते...
रुक जाती है गरीबो- तवंगरो की भी साँसे ...

लेकिन समय सदियों से जिन्दा है...

समय समय पर चलता है.
समय कभी भी रुकता नहीं .

समय के आगे अच्छे अच्छे जुक जाते है...
समय कभी किसीके सामने जुकता नहीं.

समय समय पर समय का जीकर होता है
पर समय बड़ा बे शर्म बे फिकर होता है.

समय ना ज्यादा ना किसीको कम मिलाता है...
सबको मिले हे दिनके पुरे के पुरे चोबीस घंटे...

कड़ी नजर रखे हुवे देखता है समय,
समय के आगे कौन निकलता है..

समय के साथ जो हे चलता...
मिलती है उसे "अनंत" सफलता...

आखिर तुम और हम सब थक जाते है एक ना एक दिन..
लेकिन समय सदियोसे चलता है बस चलता ही रहेता है...

दम थम जाते है ...
हम थम जाते है...

हम रुक जाते है..!
हम जुक जाते है..!

हम थक जाते है..
सब थक जाते है... 

लेकिन....

"अनंत" समय कभी रुकता नहीं..!
"अनंत" समय कभी जुकता नहीं..!

समय सदियोसे चलता है बस चलता ही रहेता है...

"
अनंत"
ब्लास्ट :- "क, तीरा"..
" कर तो कशु नक्कर कर नकर तु कशु न कर "
", तीरा"....


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