Tuesday, 26 April 2016

आकाशी तेज के तले

मेरी तो दुनिया सारी यहाँ है ... 
यही हे मेरा असली ठिकाना ...
यही हे मेरा आखरी ठिकाना ...
जब जी चाहे में यहाँ आता जाता हु ... 
अपने और यारो के  हाले दिल आके यहाँ में खुदको बताता हु ... 
अगर भूले से कभी तू यहाँ आके सुने तो समज में तुजको सुनाता हु  ... 
रात के अँधेरे में अकसर अपने यारो से मिलने में यही पर आ जाता हु ... 
जंगलके बीचो बिच आया हुवा ये मेरा अपना छोटासा घर है... 
अपने यारो से बाते मुलाकाते में जहा करता हु हां यही वो खंडर है... 
मेरे अनंत और अज्ञानी के सिवा कोई नहीं आता इस खंडर पर ... 
हम तिन यार मिलते हे अकसर इस खंडर के अंदर.... 
आज भी हम वो बाते दोहराते हे यहाँ आकर ... 
जो बाते बर्षो पहेले हम तीनो के बिच हुवा करती थी ... 
क्या तू यहाँ आके कभी सुनती है...? 
आज भी आधी रातको हमारी वो बाते यहाँ पर गूंजती है... 
कोई नहीं जानता ये ... 
यहाँ मुझे पूरा ब्रह्माण्ड नजर आता है... 
युगो से हमारा ऐसी इस दुनिया से नाता है... 
वैसे तो ना यहाँ कोई आता हे ना जाता है ... 
गर भूले से कोई आ जाए तो फिर निकल नहीं पाता है ... 

चलो अब सुनाते हम खुदको एक और बर्षो पुरानी बात... 

जेसे आज मेरे हे .... 

ऐसे ही कुछ हालत में ... 

मेरे यार ने बर्षो पहेले अपने प्यार से ... 
बड़े प्यार से ये पूछा था ... 

आखिर क्यों  ? 
मुझे पहेले से कुछ 
बदली बदली सी अब नजर आती हे तू  ! 
"अनंत" बता आखिर क्या बात है ऐसी ?
जो कहेने से घबराती हे तू ! 

"अनंत"

इतना पूछने के बाद भी वो खुलकर कुछ नहीं बोली ... 

तब जाके अनंत बहोत ही गुस्सा हुवा ... 

और गुस्से में आके उसे कहे ही दिया ... 

"अनंत" अगर तुजे मेरा सामने आना ना हो पसंद ... 
तो तू अपनी आँखे करले बंध ... 

में अपने आप अलौप हो जाऊँगा .... 

उसके बाद क्या हुवा मुझे पता नहीं ... 

हां ,हां में जानता हु और भी बहोत कुछ मुझे  याद करना बाकि हे अभी ... 

लेकिन इतने सालो के बाद इस भुलक्कड़ को इतना कुछ याद आया 

क्या ये काफी नहीं ... ?

कोई करे ना ये बात और है ... 

बाकी मेरी ऐसी बातो पर... 
किसी को भी गुस्सा आ शकता हे ... 

किसीको  आये ना आये लेकिन में जानता हु !
तुजको  को तो मुज पर  गुस्सा आही जाएगा ...  

********************

क्या यही.... 
यहाँ से अटका था में वहा ... 
जाने तू अटकी कहा कहा ... 
में अकसर भटकता रहा ... 
जाने तू भटकी कहा कहा ... 
वहा नहीं तो देख यहाँ ... 
मेने तो तुजे जो कहेना था.... 
और जो मेरे दिलमे था ... 
यहाँ पर कहे दिया ..
अब तू भी जरा खुलके बता ... 
क्या ऐसा ही कुछ तेरे दिलमे था ..? 
"हां " या "ना " 

ये जानते हुवे भी की ... 

सूरज छूनेकी कोशिष में पंखी के पर जल जाते हे ... 

और ... 

जागी आँखों के ये सपने अकसर मन को छल  जाते है... 

फिर क्यों ... 

हम ऐसे बंधन में बंध जाते है ? 

कुछ ऐसे बंधन  होते हे जो बिन बांधे बंध जाते है .. 





 



वाक्य मेरी ऐसी बाते सुनकर

किसीको भी मुज पर

गुस्सा आ शकता है ...











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