Monday, 25 April 2016

अनंत ऐसे गाने अकसर सुनता सुनाया करता था ...


"गुलाब" आँखोंमें क्या झांकते हो ! आँखे फरेबी भी हो शकती है .... 
झांकना गर हे तो दिलमे झांको ! वहिसे प्यारकी लहेरे उठती है ....

श्री गुलाब दास की रचना ..........

बालो में कलर अकसर सभी  लगाते हे ... 

ता ऊम्र जवा रहेना कोई झुर्म तो नहीं ...  

गालो की लाली का राज ना पूछना ... 

बस थोड़ी सी पी ली है यारा.....

चोरी तो नहीं की है ...

ये जो नशा चड़ा हे मुझे वो सिर्फ शराबका नहीं . 
"अनंत" कुछ तेरी आँखों का नशा भी शामिल हे.  

मेरे यार ने अपने प्यार से कभी एसा कहा था 
जब वो बार बार उनकी आंखो मे झांकती थी


तुम खींचे चली आवोगी..!
आंखे मींचे चली आवोगी..!

गर भुलेशे भी "अनंत"ईन -
गहेरी आंखो मे झांकोगी .!

पीछे पीछे चली आवोगी !
"अनंत"

















   


                          

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