Tuesday, 5 April 2016

चलो गम भुलाये नाचते गाते ...

बहोत अच्छा महेसुस होता है जब में इस खंडर पर आता हु . 

यहाँ हम तिन यारो के सिवा और कोई नहीं होता . 

हम जब यहाँ आते है एक अलौकिक दुनियामे खो जाते है... 

यहाँ हसना ,यहाँ रोना , यहाँ गाना और यहाँ पागालोकी तरहा नाचना हमें अच्छा लगता है.. 

गरमी  का मौसम था और उस वक्त में सफ़ेद पायजामा और जभ्भा पहेने हुवे . 

उस खंडर पर गया .... 


तो मेने देखा वो दोनों इस गीत पर नाच रहे थे बे ढंगा 


मेने  भीतर जाकर उनको पूछा यारा ऐसे गीत पर भी कभी कोई नाचता है क्या ... 

तब जाके अनंत बोला जब दर्द हदसे बढ़ जाए तो हम किसीभी गीत पर नाच लेते है .. 

आ तुभी घुल मिल जा हमारे साथ और नाच ले  ... 

मेने कहा पर मुझे तो कोई गम हे ही नहीं फिर .. 

तब जाके अज्ञानी बोला .. 

अरी ओ परिया तू हमसे अपना दर्द छुपायेगा क्या .. ?

तू कहा अटक के भटक के आया है हम दोनों बहोत अच्छी तरहा से जानते है..... 

फिर छुपाने से क्या फायदा .... '

चल आजा तुजे गमना सही हम गमके मारे सभी ... 
चलो गम होया ख़ुशी जो भी हो आ परिया नचले अभी...!

वो ऐसे बोला जैसे.... 

में कुछ , कुछ भी बोलना पाया और उन दोनों के संग में भी बे ढंगा नाचने लगा ... 

नाचते नाचते अनंत कुछ  इस तरहा बोला... 

"अनंत"वो जो था कभी हमारा अब हमारा नहीं  था... 
और फिर दूर तलक  इश्के दरिया में किनारा नहीं था... 

जीना तो हे फिर भी हर हाल में हमें  यारो फिर आवो .. 

हम नाचे ज्झुम झूम के घूम घूम के जब तक के सरके साथ साथ 

हमें चक्कर ना अ जाए होर हम होश गवा कर गिर ना जाए 

आवो यारो झूमे  गम ही सही गमकी मस्तीमे 

सिवा इसके पास हमारे और कोई चारा भी तो नहीं था ... 

"अनंत "
फिर हम तीनो देर रात तक झूमते रहे घुमते रहे और फिर..... 

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