Wednesday, 27 April 2016

तुजको बचा रहा हु मुझ से ...

सोचता हु अब में कभी यहाँ से बहार ही ना निकालू ... 

लेकिन ना जाने फिर क्यों निकल पड़ता हु ... 

और अब फिर सोचता हु और सोच कर बहार नहीं निकलता हु .. 

तू जानती है क्यों ? 

क्यों की में चाहकर भी नहीं चाहता ... 
या फिर चाहता हु इसी लिए नहीं चाहता की .. 

फिर कही तुजे तकलीफ हो .. 
में चाहता नहीं तुजे तकलीफ हो .. 

इसी वजेसे में .. 

तुजको बचा रहा हु मुझ से ... 
मुजको बचा रहा हु खुद से ...
ऐसे में बचा रहा हु "अनंत"...
में तुजको और मुजको दू:ख से ..  

ना जाने कबसे ... 
और क्यों में कर रहा हु ऐसा ... 
मुझे कुछ नहीं पता मुझे कुछ नहीं पता ... 

में नही चाहता फिर 

ऐसे जान लेवा गीत सुनने का वक्त आये .... 

होता हे ,हा प्यार में ऐसा होता ही है .. 
मिले तो दिल खिले झाख्म भी कुछ पुराने सिले ... 

अगर ऐसा ना हो पाए तो ,,
फिर गर  जुदा हो जाए तो.. 

जाने क्या हो .. 

वेसे तो वो हालत ही जान लेवा होती  हे... 
और उपरसे एसे गीत जो हमारा दर्द और बढ़ा देता हे ... 

बड़े जान लेवा होते हे गीत ऐसे ऐसे ...  

वेसे मुझे तो आदत हे गम जेलने की ... 

में तो युगो से प्यारमे तन्हा तन्हा जिया हु .. 

अब तो जेसे मुझे ऐसे आदत सी हो गई हे ... 

इस कदर रोने और तड़पने की... 

और मेरे लिए अब तो दर्द दर्द ना रहा जेसे हो गया नशा ... 
"अनंत" इश्क अगर नशा हे तो इस नशे में ही आता हे अब मजा ... 

लेकित तू सायद ये सब जेल ना शके .. 

बस यही सोचके ... 

अब में ...  

वेसे तो ये दर्द ही दो दिलोका सहारा होता हे ... 






















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