बर्षो पहेले लीखा था कुछ ऐसा अनंतने...
हर इन्सान ईक पिंजरा हे...
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"अनंत" इस पंजरे में जाने कितने पंछी केद हुवे...
फिर इस पंजरे के भीतर भी तो, कई छेद हुवे...
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ना पूछो इस पंजरे के भीतर...
कैसे कैसे भेद छुपे...
पंछी कितने संदेश लाये...
कितने वापस भेज चुके...
कभी पंछी पिंजरा तो,
कभी पिंजरा पंछी बन उड़े...
दोनों साथ रहे, फिर भी,
दोनों कभी ना एक हुवे...
और इक दिन पंछी ने कहा पिंजरे से,
ऐ पिंजरे तू कब तक कैद में रखेगा मुजे ?
इक ना एक दिन ले उडुगा में देख तुजे.
"अनंत" के इस पंजरे में,
जाने कितने पंछी केद हुवे...
और फिर इस पंजरे के,
भीतर भी तो कई छेद हुवे...
"अनंत" ये खेल सारा बस,
ईक पंछी और पंजरेका है,
हां !
फीर पंछी ने कहा पींजरे से
तु गुरुर मत करना कभी भी..!
इक ना एक दीन जब मै उड जाउगा,
और तू, मर जायेगा....
"अनंत " आकाश मे मै जब उड जाउगा,
तब तू सड जायेगा...!
"अनंत"
और फीर एक दीन अचानक.!
सचमे पंछी उड गया....
पींजरे के बंधन से छुट गया...
फीर जाने कीस और मुड गया..?
"अनंत"...... आकाश मे जाने कहां.?
खो गया,? जाने कीससे जुड गया..?
वोही जाने अल्लाह जाने
उसके भेद नीराले
उसके खेल नीराले
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