Wednesday, 30 August 2017

"अनंत"हर पंखी को लुभाता ये पिंजरा...

Katira Paresh
अनंत के फटे पुराने अस्थि पिंजर जैसे कागजोमें से....
फिर मुझे मिला एक पिंजरा अनंत का ...
"पिंजरा"
अनंत सिर्फ एक पिंजरा है...!
जो अब खुल्ला ही खुल्ला है..!
दरवाजा ईस पिंजरेका ऐ पंछी...
वर्षो पहेले ही टूट चूका है.
अब ये पिंजरा खुल्ला है..
आये जाए पंछी अपनी मर्जीसे -
पिंजरा ना रोकता ना बांधता है...
क्योकि दरवाजा ही नहीं ...
इल्जाम कुछ ईस तरहा है...
ये जो पहेला दूसरा तिसरा है...
और कुछ नहीं , कुछ भी नहीं..!
"अनंत" एक खुल्ला पिंजरा है...
"अनंत"
और उसी अस्थि पिंजरमें से ही मुझे ये भी मिला....
"बे वजा कुछ भी ! कभी कही होता नहीं.... "
कुछ तो वजै होगी ही ! बे वजै मेरी कलम मेरा दिल कहा कुछ बोलता है.?
लेकिन ये दिल जब भी कुछ बोलता है तब भेद बहोत ही गहेरा खोलता है .
कुछ तो वजै होगी ही ! बे वजै मेरी कलम मेरा दिल कभी कुछ बोलता नहीं .
बे वजा कोई भी इंसान कुछ कहे सुने सहे ऐसा इस जहामें कभी भी होता नहीं.
अपने बारे में जब कुछ कहेना होता है तब जाके कोई हाल हमारा भी पूछता है.
यु तो तन्हाईमें अकेले हम मर भी जाए तब भी ! कोई हाल चाल पूछता नहीं.
तब जाके दर्द किसीका समज में अता है.जब कभी खुदको तकलीफ होती है,
दिलासे देने नहीं लेने आते है वो. यु तो आंसू यहा कोई किसीका पोंछता नहीं.
हर कोई यहा पर अपनी ख़ुशी और अपने गमके बारे में ही सोचता है अकसर.
और उसके लिए कुछ भी ! करता है. दुसरो पे क्या गुजरेगी कोई सौचता नहीं.
“अनंत वो पिंजरा है जो खुल्ला हे. वर्षो पहेले इस पिंजरेका दरवाजा टूट चूका है.
कोई पंछी आये जाए उसकी मरजी ये पिंजरा किसीको बांधता या रोकता नहीं.
"अनंत"



Katira Paresh
May 19, 2013

बस कुछ पलके लिए ......
"अनंत"हर पंखी को लुभाता ये पिंजरा...
जाने कित्नोका दिल दुभाता हे पिंजरा....
पंखी आते जाते रहे इन पिन्जरेमे अब द्वार कहा ....
आते जाते पंचियोने ही तो द्वार इनका तोड़ दिया....
अब जब चाहे जो आये , आये और जाए ....
रोकना भी चाहे पंछी, पिंजरा रोक ना पाए ....
ना बांधना , ना बंधना....
मुक्त रहेना मुक्त रखना....
"अनंत" पिंजरा जान गया .....
रहश्य मुक्ति और बंधनका......
द्वार पिन्जरेका जब टूट गया.....
अब पेड और पिन्जरेमे फर्क कहा ......
पंछी पेड पर भी आये जाए ....
और कभी पिंजरे में बस जाए .....
डाली डाली झूले जी भरते ही उड़ जाए ....
"अनंत" पर पेड और पिंजरा ना उड़ पाये ...
दरवाजा ही तोड़ दिया जब चाहे पंछी आये ....
"अनंत" रोकेंगा नहीं अब जब चाहे उड़ जाए.....
पल पल रूप रंग बदलता पिंजरा ....
"अनंत" पंछी कभी नहीं बदलता......
ये जिस्म मेरा इक पिंजरा हे ....
और मेरी जान हे एक पंछी ......
पंछी तोडके पिंजरा कब उड़ जाए ...
"अनंत" इस पिन्जरेको पता नहीं....
"अनंत"


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