Tuesday, 31 December 2013

" चाहिये थोडा प्यार थोडा प्यार चाहिये..... "



" चाहिये थोडा प्यार थोडा प्यार चाहिये..... "



મનમાં હતું તે બહાર આવી ગયું એમાં શું...

વાત પ્ર્રેમની બહાર ના આવે તો.....?તો.....?તો.....? 

મનમાં મુંજારો થાય ને પછી હ્રદય પર ભાર ભાર જેવુ લાગે....

ને ક્યારેક ભારે થઈ જાય..... ભારે એટલે ઓલું ઘણી વાર
વાત વાતમાં બોલીએને ... ભર જુવાનીમાં ભારે થઈ હો .....! હા... ઇ .....
ભારની વાત કરું ર્યો .... જો બોલે નહીં તો મુંજારાના લીધે મરી જાય....

मध्यांतरथा.....


जी'' जाईयेगा नहीं खेल अभी खतम नहीं हुवा....
मध्यंतर हे.... खेल अभी बाकी हे......
ये खेल कभी खत्म नहीं होगा...
ये प्रेम कभी खत्म नहीं होगा .....

ये बस शुरू होता हे फिर शुरू ही रहेता हे.
अंत नहीं होता सिर्फ मध्यांतर ही होता हे ...

એક દી બધાને પ્રેમની આદત ના પડી દઉં તો...... !
એક દી બધાને સાચું બોલવાની આદત ના પડી દઉં તો .... !

મારુ નામ પુરુષોતમ નહીં....

જી હા મારા દાદાએ મારૂ અસસ્લ નામ પુરુષોતમ રાખેલું છે...

જેનો અર્થ મને ખબર નથી...

હું ખોટું બોલ્યો .....

પણ મારા વખાણ હું તો ના જ કરું ને... ?

કોઈક કરે તોય શરમ આવે .....

.તું એક ક્ષણ પાસે આવ પ્રેમથી.


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પાગલને હજુ પાગલ બનાવ પ્રેમથી. 
પ્રેમ શું ચીજ છે મને સમજાવ પ્રેમથી. 


હો’તારા પ્રેમમાં જો ખરી કશક તો દૂરથી,
આ હ્રદયને...! તું સ્પર્શી બતાવ પ્રેમથી. 

યા એ અસર હું પૈદા કરી દઉં તારામાં. 
તું એક વાર મારી પાસે આવ પ્રેમથી.

આ હ્રદયમાં ઘાવ ઘણા છે. દર્દ થોડું. 
ઓછું થાય એકા’દ જો તું રૂજાવ પ્રેમથી.

હવા પણ આપણી વચ્ચેથી પસાર ના 
થઈ શકે. એ રીતે ગલે લગાવ પ્રેમથી. 

હ્રદય તારું પણ ભારે ભારે થયું છે ને?
તો તુયે રડ‘ને મને પણ રડાવ પ્રેમથી. 

હું ભીંજવું આંશુથી તારી ઓઢણી, મારો. 
ખંભો તું તારા આંશુંથી ભીંજાવ પ્રેમથી.

“અનંત” મારે યુગોનો પ્રેમ કરી લેવો છે. 
ક્ષણમા.તું એક ક્ષણ પાસે આવ પ્રેમથી.

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आज मेरे हाथ में टोर्च थी.



शर्दी का मौशम सड़क सुमसान गली सुनी,

 चारो और अँधेरा घना अँधेरा ...

मै महोल्ले की और चला चाय ले कर हमेशा की तरहा. 

आज मेरे हाथ में टोर्च थी.  

क्यों की आज में अकेला न था मरे साथ कोई और भी था जिसे. 

अंधेरो से उसे डर ना लगे इस लिए मैने साथ में टोर्च ली थी.   

हां मेरे साथ थी एक लड़की, जो अनंत को मिलना चाहती थी. 

कई दिनों से वो अनंत अनंत की रट लगा रखी थी बहोत बहाने बनाए .

पर अब तो वो जान पे बनी और मै मजबूर हो गया . 

ये दूसरी लड़की थी जो पागल बनी थी अनंत को मिलने के लिए . 

इससे पहेले भी मुझे ऐसे ही मजबूर किया गया था..! 

 नहीं मिलाता तो दोस्ती तोडने की धमकी. 

आज भी ऐसा ही हुवा फिर ना मिलने की धमकी . 

सो आज में उसे अनंत से मिलाने मेरे साथ खंडर पर लाया.

 उसकी इच्छा थी इस महेफिलमे आने की . 

मै महोल्ले में गया दरवाजा हमेशा की तरहां खुल्ला था . 

"आप बहार खड़े रहे मुझे उनसे पूछना होगा." 

मै अंदर गया . अनंत और अज्ञानी आमने सामने बैठे थे .. 

टीपॉय पर मॉम बती जल रही थी ... 

आव आव परिया आव् बैठ और ,

जल्दी से चायकी प्याली भर दे यार ... 

आज बहोत भारी ठंड हें सो चाय पिए तो,

 भीतरसे जिस्म थोडा गर्म हो जाए .

फिर महेफिल का मजा आये ... 
    
मेरी खुर्शी खाली मै ने अपनी कुर्शी संभालते हुवे ... 

हां चाय तो मै भरता हु पर आज एक पियाली और ले आ अनंत . 

अनंत ने मुझे पूछा . 

क्यों परिया एक और पियाली ? बहोत ठंड लग रही है तुजे ? 

जो  तु दो दो पियाली चाय पिएगा ?

अज्ञानी बोला अरे भई ठंड लगी भी है तो,

 भले ही दो बार चाय पिए उसमे क्या हें . 

अनंतने कहा ,पर यार दूसरी पियाली की क्या जरुरत ..!

दो  बार एक ही पियाली में चाय नहीं पी शकता क्या ? 

मैने कहा अरे यारो ऐसी बात नहीं है ? 

अनंत बोला फिर कैसी बात है बता ? 

मैने दोनों के सामने देखते हुवे अनंत को धीरेसे कहा,

 आज तुजे कोई मिलना चाहता है . 

अनंत बोला  क्यों ?

 मुझे क्यों मिलना चाहता है ?

और कौन मिलना चाहता हें मुझे परिया ? 

अनंत ने एक ही साँस में दो सवाल पूछ लिए. 

मैने  कहा एक लड़की है जो तुजे मिलना चाहती है. 

लड़की ! ? उसे तो एक बार मै मिल चूका हु अब क्या है ? 

अरे यार ये वो नहीं दूसरी है कई दिनों से तेरे बारे में पूछ रही थी . 

मैने अनंत के सामने टोर्च का उजाला फेंकाते हुवे कहा ... 

अनंत ने अपनी आँखों  पर हथेली रखते हुवे चिल्लाके कहा परिया ... 

तु टोर्च बंध कर मुज पर प्रकाश मत डाल..!

 हटाले मेरे चहेरे के सामने से ये उजाला , 

मुझे अँधेरे में ही रहे ने दे ... 

पर अनंत तुजे कोई मिलने आई  है .. .

जो तेरी लिखावट  को तेरी सौच को पसंद करती है . 

नहीं अब मुझे किसी से नहीं मिलना मिल चूका बहोत को ... 

पर यार तु समजता क्यों नहीं . मैने उसे समजाते हुवे कहा .. 

वो बोला नहीं परिया मुझे किसीसे नहीं मिलना ... 

जब सामने था तब तो मेरा हाल तक नहीं पूछा किसीने ... 
जब "अनंत" छुप गया तो लोग ढूंढने निकल पड़े है मुझे ..

अनंत के मुहसे दर्द भरा शेर निकल गया .. 

फिर वो बोला परिया ...  

अब वक्त गुजर चूका .... 

जो जब मिलना चाहिए तब नहीं मिला ..... 

अब कोई मिले भी तो क्या ना मिले भी तो क्या ... 

अज्ञानी बोला यार तु कभी चाहता था की नहीं की.

  तुजे कोई ऐसी लडकी मिले जो,

 तेरे जझबात-ओ लाब्झो को समजे चाहता था ना ?  

मैने अज्ञानी की बात में सुर मिलाते हुवे कहा.

हां अनंत  मै भी तुजे कहेता था याद है की ,

एक ना एक दिन तुजे ऐसी लड़की मिलेगी 

जो तेरे दिलके हालत को खूब समजेगी ... 

अनंत ने कहा हां वो सब ठीक है, सही हें,

 पर तुम दोनों भी जानते हो ना मेरे साथ जुड़ने वालोको 

मुझसे जुड़ने के बाद सिवाय आंसु के कुछ नहीं मिलता . 

और मै किसीको अब रुलाना नहीं चाहता .. 

मेरे हाले दिल अब ठीक है फिर क्यों ,

किसको पुरानी  यादो में घसीट के हम दु:ख दे ,

पहेले भी इस कदर तु जिसे लाया था उसे में तेरे कहेने पर मिला .. 

क्या हुवा क्या कुछ बात बनी अरे यार वक्त निकल चूका है ... 

वो चाहते हुवे भी मेरे पास नहीं आ शकती ... 

और में भी आझाद कहा ... 

सब  अपने अपने रिस्तो में उल्जे हुवे है बंधे  हुवे  है... 

वो भी ना आई ये भी ना आ शकेगी सारे के सारे बांधे हुवे है ... 

कोई आझाद नहीं रहा तु समजता क्यों नहीं परिया ... 

अनंत गुस्सा हो गया ... 

अब जिसे मिलना हो वो अगले जनम तक इन्तजार करे बस... 

 मैने अनंत को समजाने की कोशिश की ... 

पर...एक बार मिल तो ले फिर चाहे ना मिलना कभी .. 

उसे कहे दो बहोत हुवा अब बस भी करो. 
जो मर चूका है , उसे फिर ज़िंदा ना करो. 

मिलेगा क्या आखिर उसे या मुझे तु बता .?

फिर प्यार, फिर जुदाई, 
आंखो में आंसु 
फिर तड़प फिर उदासी. 

ये सब फिर आये जीवन में ऐसा ना करो, 
जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो. 

अब तो प्यार के नाम से ही हम डरे है . 
बड़ी मुश्किल से गहेरे झख्म भरे है . 

उन झ्क्मो को अब फिरसे हरा ना करो.
  जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो.  

तुम क्या जानो.  

कितना सताया हें इश्कने मुझे 
बहोत सताया है इश्क ने मुझे . 
बहोत रुलाया है इश्कने मुझे.

अश्क फिर आखो में आए ऐसा ना करो. 
 जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो.  

सच्चे प्यारकी खोजमे आधी उम्र कट चुकी है 
अब जिंदगी हमारी कितने हिस्सोमे बट चुकी है. 

हो कोई और भी परेशा हमारी कारन.  
ना में करू ना तुम भी ऐसा गुनाह करो.

"अनंत"अब मिलना इतना आशा नहीं हें,
   ये जीवन  भी तो अब सिर्फ हमारा नहीं हें .

मै तो संभल रहा हु तुम भी संभल जावो. 

यु रोज रोज हमसे तुम मिला ना करो. 
  जो मर चूका है उसे फिर ज़िंदा ना करो. 
    
"अनंत" 

अनंत ने अपनी रचना के जरिये सारी बात कहे दी ... 

हम भी समज चुके थे की ,

अब अनंत को समजाने की कोई गुंजाइश नहीं थी . 

हमारे तीनों की आँखे नम थी ... 

तो अब क्या सोचा अज्ञानी ने अनंत से पूछा ... 

अनंत ने स्पष्ट कहे दिया , नहीं मिलना ... 

पर बस थोड़ी देर के लिए मैने डरते डरते अनंत से कहा.

मेरी खातिर एक बार उसे मिल लो यार,...

 मैने उनसे वादा किया है... 

मेरी हालत पतली देख अनंत थोडा मुश्कुराया .

 फिर बोला . 

ठीक है तु कहेता है तो तेरी खातिर . 

पर उसे कहे देना इसके बाद कभी नहीं. 

हां हां ठीक है जैसा तु कहे पर एक बात और बतादे , 

हां बोल परिया .. 

मेने कहा, अगर फिर उसे मै मिलता रहू,

 तो  तुजे कोई एतराज तो नहीं ना ? 

नहीं मुझे बिलकुल एतराज नहीं पर तुजे भी संभलना होगा . 

जुड़े ना जुड़े रिश्ते जिश्म्के ,रूह्का रिश्ता टूटना नहीं चाहिए .. 

हां हां में सब समज गया तो क्या में उसे अंदर बुलाऊ .. 
हां बुलालो ...


    

     

   

  

"अनंत" खुदको छुपाना आसा नहीं ....


जाने क्यों.... 

अभी अभी तो पोंछे थे आंशु जाने फिर क्यों उभर आये  आंसु. 
आँखों की इझाजत. लिए बगेर आंखोसे बहार  निकल आये आसू. 

नशीब से आंशु पोंछने वाला मिला था कोई . 
आंसु मेरे पोछते पोछते आंख उनकी भी रोई. 

अभी अभी तो मिले थे , की बिछडने का वक्त करीब आ गया. 
वो चले गए तो कौन पोछेगा, गर मेरी आंखोमे कल आये आंसु .

फ़िक्र उनकी हें या अल्लाह, मुझे मेरी नहीं कोई फ़िकर. 
ऐ खुदा इश्के आग लगाईं हें दिलमे तो ऐसा भी कुछ कर.

की इन आखो में कभी किसीके सामने भूले से भी आंसु ना आये. 
गर फिरभी कभी आँख रोये तो इश्क की  आगमे जल जाए आंसु. 

भीतर भीतर जागे,सोये तो इस लिए की कोई और जागा भी सोये.  
  हम अकेले में रोये बार बार मु धोए. हमें देख के कोई और ना रोये. 

"अनंत" दु:ख को छुपाना है, और जितना छुपा शकु खुदको छुपाना है,
बस इसलिए हम  बार बार मुह धोए  की  पानिमे मिल जाए आंसु .
   
"अनंत" 

"ब्लास्ट"

"अनंत" खुदसे खुदको छुपाना आसान नहीं.!
भीगी आँखे गवाही दे देती है . 
दू:ख को छुपाना आसान नहीं. 
तुजमे आज भी मै हु "अनंत"
और मुजमे है तू. यु तुजको छुपाना आसान नहीं..!  
"अनंत"

અનંત રૂપાળું પીંજરુ માત્ર..


એક સુંદર મજાનુ રૂડું રૂપાળુ પીંજરુ.


પહેલા નાનકડો અમથો દરવાજો એ હતો પણ !



કેટલાક એવા પંખીઓ પણ આવ્યા જે જાતે આવી પુરાયા;



મજા આવી મોજથી રહ્યા જ્યારે જ્યારે મન થયું પિંજરના;



સળિયે ચાંચ ઘસતા રહ્યા અને એમ સમય જતાં પિંજરના;


નાજુક સળિયા ધીરે ધીરે ઘસતા ગયા !

એ ના વિચાર્યું કોઈએ કદી કે પિંજરાને પણ વેદના થાય .....

અને દરવાજો નબળો પડતો ગયો !

ને પછી જાતે જ આવી પુરાયેલા !!!!

અકળાયા અને છૂટવા માટેની મથામણ ...

ગુસ્સે થઈ પિંજરના નાજુક દરવાજાને પોતાની...તીક્ષ્ણ ચાંચ વડે 


તોડવાની કોશિશ કરતા

એમ કરતા કરતા એક દિવસ !


દરવાજો તૂટી ગયો ને પંખી ઊડી ગયા ! એક પણ પંખીએ ;

ના વીચાર્યુ કે પંખી વિના પીંજરુ પણ સૂનું સૂનું થઈ જતુ હોય છે.......


પીંજરાને ઘણી વેદના થઈ રડ્યું ,પીડાયું, અકળાયુ,મુંજાયુ ને !

એકલુ પડી ગયુ ! પીંજરુ! 

બસ ત્યાર પછી ક્યારેય દરવાજો ના નાખ્યો !

સાવ!..... હા!..... સાવ કરતા સાવ ખુલ્લુ જ થઈ ગયું પીંજરુ ....

જે આજે પણ સાવ ખુલ્લુ જ છે....

અને એક દિવસ સમજાઇ પણ ગયુ ! પિંજરાને...... 

કે આ નાનકડુ પીંજરુ મારૂ પણ માલિક નથી હુ એકલો !

કેટ કેટલાના અધિકાર આ નાનકડા પીંજરા પર....... 

બંધન કરતા મુક્તિનુ મહત્વ કેટલુ !!!સમજાઈ ગયું.....

સમજાઈ ગઈ પોતાની સઘળી ભૂલ પિંજરાને......

બંધ રહેવા કરતા ખુલ્લુ રહેવામા કેટલી મજા હોય છે સમજાઇ ગયું.....

અને ત્યાર પછી કદી કોઈને બાંધવાની કોશિશ નથી કરી....

આજે પણ પીંજરુ આવનારને પ્રેમથી આવકારે છે જનારને રોકતુ નથી....

જાણે પિંજરાને પોતાની કોઈજ નીજી ઝંખના ના રહી હોય.....

અને એમા જ પરમ આનંદ ની અલૌકિક અનુભૂતિનો અહેસાસ.... 

બસ હવે પોતાનાજ પિંજરમાં એ પણ એક સાવ નાનકડું પંખી બની;

સાવ છેવાડે એક ખૂણામાં બેસી જોયા કરે છે પિંજરમા આવતા ને જતાં;

પંખીની આવન જાવન........

હજુય ઘણા એવા પ્યારા પંખી આવે છે..... 

જેને ખરેખર બધાવવું છે પુરાઈ જવુ છે પિંજરમાં......

પણ નહીં એવી ભૂલ હવે કદી નહીં .......

હવે આ પિજરાને નહીં કોઈ દરવાજા ની જરૂર...

નહીં કોઈને બાંધવા બંધાવાની ઈચ્છા.......... 

ખુદ ખૂલીને રહે પંખીને પણ મુક્ત ગગનમાં દે ઉડવા......

પિંજરના દરવાજા કાયમ માટે ખુલ્લા છે બધા બધા ને બધા જ 

માટે........

જેને જ્યારે આવવુ હોય આવો પંખીઓ મન પડે ત્યા સુધી રહો ને પછી .... 

સૌ ઊડો મુક્ત ગગનમાં .......

ભીતર રહેલુ પંખી ને આ ખુલ્લુ "રૂપાળું પાંજરું".....

“અનંત “કઈ જ ના મારુ બધુ તારુ તારુ ને બસ તારું......

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“અનંત



Monday, 30 December 2013

जाते जाते फिर "अनंत" का एक शेर .....




जाते जाते फिर "अनंत" का एक शेर ..... 

हां तो उसने लिखा हें . 
वैसे उसने ये शेर अपने आपको कहा हें . 
जो की अब में खुदको कहेता हु . ~~~~~~~~~~~~~~~
"अनंत मेरे होठ जब कभी मुश्कुराते हें . में अपनी आंखोको आगा कर देता हु. 
की ऐ मेरी आँखे अब तैयार रहेना तुम. 
कुछ ही दिनोमे वक्त रोनेका आयेगा ...
क्यु की कुछ दिनोसे मेरे होठ मुस्कुराते हें .   
"अनंत"जब कभी हम कुछ पानेकी खुशीमे झूम उठते हें. 
में अपने दिलको आगा कर देता हु . की ऐ मेरे दिल अब , 
तुम तैयार रहेना.! की थोड़े ही दिनोमे वक्त खोनेका आएगा...  
क्युकी में प्यार मिलनेकी खुशीमे कुछ दिन बड़ी मस्तीमे जुमा हु....              
चलो अब में विदा लेता हु . 
तुजको सामने हें पाया ... ..में अकेलेमे. युही नहीं बड बडाया .