Saturday, 26 March 2016

"अनंत" ओस का मौसम जैसे



एक लडकी सीघी सादी भोली भाली ...

अपने आपमे खोई हुई ....

अचानक गाने लगी गुनगुनाने लगी ....

ऊसके चहेरे पर....

अजीबसी रोनक नजर आने लगी...

होता है , ईश्क मे एसा ही ! होता हे !

जी भरके हसने वाला बादमे....

उनकी यादमे रोता है ! 

हां ! ईश्क मे ऐसा होता हे ...

एसे ही कुछ हालात ईघर भी थे उघर भी .....

तब जाके उसने उनसे कहा था...

तेरे ये तेवर-ओ हालात देखके 
मुजे ये महेसुस हुवा हे !

की कीसी पागल ईन्सान ने 
तेरी रुह को हलके से छुवा हे...

"अनंत" ओस का मौसम जैसे 
बस घुवा घुवा घुवा घुवा घवा घुवा हे..


ये बात कभी अपनी चहीती से ,

मेरे यार ने कहीथी ....

वो कीस्सा लो ! अब खतम हुवा ....:)

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