Thursday, 9 August 2018

खंडर के अंदर सिनेमा घर

એકાંતમાં એકલા એકલા એકાંતમાં 

ખબર નૈ કેટલા વર્ષો પછી 

પણ આજ મેં એકજ  બેઠકે આ આખે આખી ફિલ્મ જોઈ નાખી। .!

આવી ફિલ્મો જોવા સાથે અગર કોઈ જોવા સમજવા વારી પણ હોય 

તો માણવા જાણવાની મજા કૈક અગલજ હોય 

ખેર... 

ફિલ્મ જોતા જોતા મેં ફિલ્મને ફીલ કરી 

એક અલૌકિક અનુભુતી અનુભવતા અનુભવતા 

મને વિચાર આવ્યો એક સર્જક 

કોઈ પણ !

એ શબ્દકાર હોય ,સંગીતકાર હોય , ગીતકાર હોય 

લેખક હોય ,ફિલ્મ મેકર હોય 

તેજ માનવ માત્રની સ્ત્રી કે પુરુષની 

બાળક બુઢા કે જવાનની 

કોઈ પણ ની છેક ભીતર ઊંડે ઊંડે ઉતરીને 

તેના આનંદ તેની પીડા તેની વેદનાને 

પોતાના સર્જન થકી પોતાની કલ્પના થકી 

સાચે સાચી વાચા આપી શકે છે ! 

આનંદ , પીડા , વેદના ,વ્યથા થકી ઉદભવતા શબ્દો સંવાદોને 

અંતમાં એ શબ્દો થકી ઉદભવતી લાગણી ને 

ઉત્તમ અદાકારો ,કલાકારો જ જીવંત બાનાવી શકે છે !

કેવી કેવી સ્થિતીમાં આમ લોકો કેવું કેવું અનુભવે 

કેવી એની મન સ્થિતિ હોય 

મનો સ્થીતી મુજબ વ્યથિત વ્યક્તિના 

ચહેરાના હાવ ભાવ કેવા હોય 

આ બધુજ એક કલાકાર જાણે ખુદ એ સ્થિતિમાં હોય 

એવું દ્રશ્ય  દુનિયાના લોકો સામે 
પોતાના અભિનય દ્વારા રજુ કરીને 

આમ લોકોની વ્યથાને પોતાનામાં અનુભવીને 

દુનિયાના સુખિયા દુખીયા લોકોને 

થોડા સમય માટે ઘણું બધું ભુલાવીને યા તો ઘણું  બધું યાદ દેવડાવીને 

પોતાની છાપ કાયમી છોડી જતા હોય છે !

આ બધું એક સર્જકજ કરી શકે !

ભાઈબંધ "અનંત"કહેતોજ કે 

એક કલાકાર એક સર્જક ઈશ્વરની બિલકુલ નહીંક હોય છે !
યા તો ઈશ્વર એ સર્જકોની એ કલાકારોની બિલકુલ પાસે હોય છે !

કેમકે , હોય છે એ સર્જનહાર 
અને આ પણ હોય છે  સર્જનકાર  

બસ્સ !

હવે , ચુપચાપ આ ફિલ્મને ફીલ કરો  !

એકો એક ગીત તેના ઉત્તમ શબ્દો અને  મધુર સંગીત 

તમને વેદના સમેત અલૌકિક આનંદ આપશે....!

*ક,તીરા *
  



मचल के जब भी आँखों से
छलक जाते है दो आंसू
मचल के जब भी आँखों से
छलक जाते है दो आंसू
सुना है आबशारों को
बड़ी तकलीफ होती है
मचल के जब भी आँखों से
छलक जाते है दो आंसू
मचल के जब भी आँखों से

खुदरा अब तो बुझ जाने दो
इस जलती हुई लौ को
खुदरा अब तो बुझ जाने दो
इस जलती हुई लौ को
चरागों से मज़ारो को
बड़ी तकलीफ होती है
चरागों से मज़ारो को
बड़ी तकलीफ होती है
मचल के जब भी आँखों से
छलक जाते है दो आंसू
मचल के जब भी आँखों से

कहूँ क्या वो बड़ी मासूमियत से
पूछ बैठे है
कहूँ क्या वो बड़ी मासूमियत से
पूछ बैठे है
क्या सच मुच दिल के मारो को
बड़ी तकलीफ होती है
क्या सच मुच दिल के मारो को
बड़ी तकलीफ होती है
मचल के जब भी आँखों से
छलक जाते है दो आंसू
मचल के जब भी आँखों से

तुम्हारा क्या तुम्हे तो
राह दे देते है कांटे भी
तुम्हारा क्या तुम्हे तो
राह दे देते है कांटे भी
मगर हम खाकाज़ारो को
बड़ी तकलीफ होती है
मगर हम खाकाज़ारो को
बड़ी तकलीफ होती है
मचल के जब भी आँखों से
छलक जाते है दो आंसू
मचल के जब भी आँखों से.

Machal ke jab bhi aankho se
Chhalak jaate hai do aansu
Machal ke jab bhi aankho se
Chhalak jaate hai do aansu
Suna hai aabashaaro ko
Badi taqalif hoti hai
Machal ke jab bhi aankho se
Chhalak jaate hai do aansu
Machal ke jab bhi aankho se

Khudara ab to bujh jaane do
Is jalati hui lau ko
Khudara ab to bujh jaane do
Is jalati hui lau ko
Charaago se mazaaro ko
Badi taqalif hoti hai
Charaago se mazaaro ko
Badi taqalif hoti hai
Machal ke jab bhi aankho se
Chhalak jaate hai do aansu
Machal ke jab bhi aankho se

Kahun kya wo badi maasumiyat se
Puchh baithe hai
Kahun kya wo badi maasumiyat se
Puchh baithe hai
Kya sach much dil ke maaro ko
Badi taqalif hoti hai
Kya sach much dil ke maaro ko
Badi taqalif hoti hai
Machal ke jab bhi aankho se
Chhalak jaate hai do aansu
Machal ke jab bhi aankho se

Tumhaara kya tumhe to
Raah de dete hai kaante bhi
Tumhaara kya tumhe to
Raah de dete hai kaante bhi
Magar ham khaakazaaro ko
Badi taqalif hoti hai
Magar ham khaakazaaro ko
Badi taqalif hoti hai
Machal ke jab bhi aankho se
Chhalak jaate hai do aansu
Machal ke jab bhi aankho se.
पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंने अपने आप को जाना नहीं

पहचान तो थी...



जब धूप बरसती है सर पे तो
पाव में छाँव खिलती है



मैं भूल गई थी छाँव अगर

मिलती है तो धूप में मिलती है



इस धूप और छाँव की खेल में क्यों
जिने का इशारा समझा नहीं


पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंनेअपने आप को जाना नहीं


मैं जागी रही कुछ सपनों में और
जागी हुई भी सोई रही



जाने किन भूल भुलैया में 
कुछभटकी रही कुछ खोई रही



जिनके लिये मैं मरती रही
जिने का इशारा समझा नहीं

पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंनेअपने आप को जाना नहीं

पहचान तो थी। ...



लोगों के घर में रहता हूँ
कब अपना कोई घर होगा
दीवारों की चिंता रहती है
दिवार में कब कोई डर होगा
लोगो के घर में रहता है
कब अपना कोई घर होगा
दीवारों की चिंता रहती है
दिवार में कब कोई डर होगा
लोगों के घर में रहता हूँ

सब्जी मंडी
हा हा सब्जी माड़ी बाप का घर है
फूल बंगीश है मां का
श्याम नगर में
श्याम नगर में चाचा का घर
चौक में अपनी श्यामा का
सब्जी माड़ी बाप का घर है
फूल बंगीश है मां का
श्याम नगर में चाचा का घर
चौक में अपनी श्यामा का
मइके और ससुराल के आगे
मइके और ससुराल के आगे
और भी कोई घर होगा
दीवारों की चिंता रहती है
दिवार में कब कोई डर होगा
लोगों के घर में रहता हूँ

इच्छाओं के भीगे चाबुक
चुपके चुपके सहता हूँ
इच्छाओं के भीगे चाबुक
चुपके चुपके सहता हूँ
दूजे के घर यु लगता है
मौजे पहने रहता हु
नंगे पाँव आँगन में
कब बैठूँगा कब कोई घर होगा
नंगे पाँव आँगन में
कब बैठूँगा कब कोई घर होगा
दीवारों की चिंता रहती है
दिवार में कब कोई डर होगा
लोगो के घर में रहता है
कब अपना कोई घर होगा
दीवारों की चिंता रहती है
दिवार में कब कोई डर होगा
लोगों के घर में रहता हूँ.

Logon ke ghar mein rehta hoon

Kab apna koi ghar hoga

Diwaro ki chinta rahti hai

Diwar mein kab koi dar hoga

Logo ke ghar mein rahta hai

Kab apna koi ghar hoga

Diwaro ki chinta rahti hai
Diwar mein kab koi dar hoga
Logon ke ghar mein rehta hoon

Sabji mandi

Ha ha sabji madi bap ka ghar hai

Phul bangish hai mama ka

Shyam nagar mein

Shyam nagar me chacha ka ghar

Chauk mein apni shyama ka

Sabji madi bap ka ghar hai
Phul bangish hai mama ka
Shyam nagar me chacha ka ghar
Chauk me apni shyama ka
Maike or sasural ke aage
Maike or sasural ke aage
Aur bhi koi ghar hoga
Diwaro ki chinta rahti hai
Diwar mein kab koi dar hoga
Logon ke ghar mein rehta hoon

Ichhao ke bhige chabuk

Chupke chupke sahta hu

Ichhao ke bhige chabuk

Chupke chupke sahta hu

Duje ke ghar yu lagta hai

Mauje pahne rahta hu

Nange paon aangan mein
Kab baithunga kab koi ghar hoga
Nange paon aangan mein
Kab baithunga kab koi ghar hoga
Diwaro ki chinta rahti hai
Diwar mein kab koi dar hoga
Logo ke ghar mein rahta hai
Kab apna koi ghar hoga
Diwaro ki chinta rahti hai
Diwar mein kab koi dar hoga
Logon ke ghar mein rehta hoon.


बोलिये सुरीली बोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां
खटी मीठी आँखों की रसीली गोलियां
खटी मीठी आँखों की रसीली गोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां

रात में खुले चाँद की मिसरी
आ आ
रात में खुले चाँद की मिसरी
दिन के गर्म नमकीन लगते है
दिन के गर्म नमकीन लगते है
नमकीन आँखों की नशीली गोलियां
नमकीन आँखों की नशीली गोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां

गूंज रहे है डूबते साए
साये डूबता साये
गूंज  रहे है डूबते साए
शाम की खुसबू हाथ न आये
गूंजते रहे है डूबते साए
शाम की खुसबू हाथ न आये
गूंजती  आँखों की नशीली बोलियां
गूंजती  आँखों की नशीली बोलियां

बोलिये सुरीली बोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां
खटी मीठी आँखों की रसीली बोलियां
खटी मीठी आँखों की रसीली बोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां
बोलिये सुरीली बोलियां.


ज़िन्दगी फूलों की नहीं
फूलो की तरह महाकि रहे
ज़िन्दगी फूलों की नहीं
फूलो की तरह महाकि रहे
ज़िन्दगी

जब कोई कही गुल खिलाता है
आवाज़ नहीं आती लेकिन
जब कोई कही गुल खिलाता है
आवाज़ नहीं आती लेकिन
खुशबू की खबर आ जाती है
खुशबू महकी रहे
ज़िन्दगी फूलों की नहीं
फूलो की तरह महाकि रहे
ज़िन्दगी

जब राह कही कोई मुड़ती है
मंज़िल का पता तो होता नहीं
जब राह कही कोई मुड़ती है
मंज़िल का पता तो होता नहीं
इक राह पे राह मिल जाती है
राहे मुडती रहे
ज़िन्दगी फूलों की नहीं
फूलो की तरह महाकि रहे
ज़िन्दगी फूलों की नहीं
फूलो की तरह महाकि रहे
ज़िन्दगी.


Zindagi phoolon ki nahin,
Phoolo ki tarah mahaki rahe
Zindagi phoolon ki nahin,
Phoolo ki tarah mahaki rahe
Zindagi

Jab koi kahi gul khilata hai,
Aawaaz nahi aati lekin
Jab koi kahi gul khilata hai,
Aawaaz nahi aati lekin
Khushaboo ki khabar aa jaati hai,
Khushaboo mahaki rahe
Zindagi phoolon ki nahin,
Phoolo ki tarah mahaki rahe
Zindagi

Jab raah kahi koi mudati hai,
Manzil ka pata to hota nahi
Jab raah kahi koi mudati hai,
Manzil ka pata to hota nahi
Ik raah pe raah mil jaati hai,
Raahe mudati rahe
Zindagi phoolon ki nahin,
Phoolo ki tarah mahaki rahe
Zindagi phoolon ki nahin,
Phoolo ki tarah mahaki rahe
Zindagi.


आप अगर आप न होते
तो भला क्या होते
आप अगर आप न होते
तो भला क्या होते
लोग कहते है की पत्थर के
मसीहा होते

आप अगर आप न होते
तो भला क्या होते
लोग कहते है की पत्थर के
मसीहा होते

संगेमरमर पे तराशे हुए
चहरे पे अगर
संगेमरमर पे तराशे हुए
चहरे पे अगर
आपके हंसाने का अंदाज़
यही होता मगर
वो जो शरमा के झुका लेते है
आप नज़र
ऐसे शरमाने पे क्यों न
हम फ़िदा होते आप अगर

आप अगर आप न होते
तो भला क्या होते
लोग कहते है की पत्थर के
मसीहा होते

आपके माथे पे बसती है
जावा शाम का शहर
आपके माथे पे बसती है
जावा शाम का शहर
अच्छी लगती है हमें
आपकी पेशानी मगर
वो जो माथे पे पसीना
उभर आती है मगर
ऐसे माथे पे भला क्यों न
लोग फ़िदा होते

आप अगर आप न होते
तो भला क्या होते
लोग कहते है की पत्थर के
मसीहा होते

आप अगर आप न होते
तो भला क्या होते
आप अगर आप न होते.

पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंने अपने आप को जाना नहीं
पहचान तो थी...
जब धूप बरसती है सर पे तो
पाव में छाँव खिलती है

मैं भूल गई थी छाँव अगर
मिलती है तो धूप में मिलती है

इस धूप और छाँव की खेल में क्यों
जिने का इशारा समझा नहीं

पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंने अपने आप को जाना नहीं

मैं जागी रही कुछ सपनों में 
और जागी हुई भी सोई रही

जाने किन भूल भुलैया में 
कुछभटकी रही कुछ खोई रही

जिनके लिये मैं मरती रही
जिने का इशारा समझा नहीं

पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंने अपने आप को जाना नहीं

पहचान तो थी...

poem by gulzar ji 

વર્ષો પછી મને આ ફિલ્મ જોવાનું અચાનક મન થયું .

એનું કારણ એ હતું કે આ ફિલમનું એક ગીત જે વર્ષો પહેલા 

ભાઈબંધ ખુબ સાંભળતો અને ખુદ ગાતો રહેતો હતો સતત 

એ ગીત મારા કાન સાથે અથડાયું અકલે 

જો કે વર્ષો પહેલા એ માત્ર ગીતો સાંભળતો એટલુંજ 

બાકી કોઈ પણ ગમતા ગીતના ગીતકાર કોણ છે 

સંગીતકાર કોણ છે કઈ ફિલમનું ગીત છે 

એ વિષે એને કોઈજ જ્ઞાન ભાન નહોતું 

કારણ કે નીજ મસ્તીમાં 

બે ભઠ્ઠીની આગ વચ્ચે 

એ એકલો અટૂલો કામ કરતા કરતા રેડિયો પર 

ગીતો સાંભળતો 

અને એ ટેપ વિથ રેડિયોમાં એકાદ જૂની કેસેટ કાયમ ચડાવી રાખતો 

જેથી ગમતું ગીત આવે કે તરત રેકોર્ડ થઇ શકે 

જેવું ગમતું ગીત આવે કે તરતજ એ દોડીને રેકોર્ડિંગ સ્વીચ દાબી દેતો 

બસ પછી ગમતું ગીત સતત સાંભળવું 

જેવું આવડે તેવું સુર બસુરા અવાજે ગાવું અને કામ કરવું બસ 

આજ હતું અનંતનું જીવન બસ  આવુજ હતું ભાઈબંધ અનંતનું જીવન 

જે અનંત સતત ગાતો એજ ગીત અચાનક મારા કાને અથડાયું 

અકલે એ ગીત મેં શોધ્યું પછી તો આંખે આખી ફિલ્મ પણ શોધી 

અને એકજ બેઠકે આખે આખી ફિલમ જોઈ નાખી !

એ ફિલ્મમાંનું  આ ગીત જે ખરેખર તો સ્ત્રીના અવાજમાં છે ! 

પણ ભાઈબંધ જ્યા જ્યા સ્ત્રી વાચક શબ્દ હોય 

ત્યાં ત્યાં પુરુષ માત્રા લગાડીને પોતાની લાગણી વ્યક્ત કરતો 

ગુલઝાર સાહેબની માફી સાથે હું એ ગીતના શબ્દોમાં 

મામૂલી ફેરફાર યાની માત્ર થોડી માત્રાનો ફેરફાર કરવાની ગુસ્તાખી કરું છું !

ગુલઝારજી તમે કદાચ ક્યારેય આ નહીં વાંચો કે જાણશો પણ નહિ ક્યારેય ... 

એ હું જાણુંજ છું ! તેમ છતાં શબ્દકારનને પોતાના શબ્દોનું 

કેવું અને કેટલું મૂલ્ય હોય છે એ હું ભલી ભાતી  જાણું છું !

માટેજ અંતર પૂર્વક તમારી રજા લઇ અને ગુસ્તાખી બદલ માફી સાથે 

હું તમારા શબ્દોમાં માત્ર મામૂલી ફેમાત્રાનો રફાર કરીને મારા ભાઈબંધને 

મનોમન શ્રદ્ધાંજલિ આપવા ચાહું છું !

ક્ષમા સહ 


पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंनेअपने आप को जाना नहीं

पहचान तो थी...

जब धूप बरसती है सर पे तो

पाव में छाँव खिलती है

मैं भूल गया था छाँव अगर
मिलती है तो धूप में मिलती है

इस धूप और छाँव की खेल में क्यों
जिने का इशारा समझा नहीं

पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंने अपने आप को जाना नहीं

मैं जागा रहां कुछ सपनों में 
और जागा हुवा  भी सोया  रहां

जाने किन भूल भुलैया में 
कुछ भटका रहा कुछ खोया  रहां

जिनके लिये मैं मरता  रहां 
जिने का इशारा समझा नहीं

पहचान तो थी पहचाना नहीं 
मैंने अपने आप को जाना नहीं

पहचान तो थी ... 

poem by gulzar ji 

કાશ... મને પણ ગાતા આવડતું હોત ,

તો મેં ચોક્કસ આ ગીત પસંદ કર્યું હોતે 

ખેર આવતા ભવે એક કામ વધ્યું 

એક અંગ્રેજી અને બીજું ગાયકી 

આવતા ભવે શીખીનેજ આવીશ 

ક,તીરા 

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