ઘોઘી પગ પછાડતી ચાલી નીકળી .. ઘોઘો એને જતી જોતો રહ્યો પણ રોકી નહીં ...
Wednesday, 22 January 2014
ઘોઘી પગ પછાડતી ચાલી નીકળી .. ઘોઘો એને જતી જોતો રહ્યો પણ રોકી નહીં ...
Tuesday, 21 January 2014
ઈશ્વર નામે દાખલો .
Friday, 17 January 2014
એજ જૂની પુરાણી અનંત ની રચનાઑ માંથી... ચેતવણી....
વર્ના આકર્ષણ ના સિધ્ધાંત મુજબ તું પણ ખેંચાઇ જશે .
Thursday, 16 January 2014
ये कहानी कभी ख़त्म ना होगी .. काल्पनिक सत्य.....
मै खंडर की और कंबल ओढ्के उन दोनों के लिए चाय लेके रोज की तरहा निकल पड़ा .....
ये उन दिनों की बात है,
આજે પણ સાચે સાચું કહું તો , હું સાવ કરતાં સાવ ખોટાળો છું.
मुझे पागलपन का दौरा पड़ा है ...!
Wednesday, 8 January 2014
इसे क्या नाम दु ?
हों जाती हें ,हम कभी भी किसीकी मदद नहीं करते हें .
"अनंत"
Tuesday, 7 January 2014
ऐसे रूह रूह मिले.
Monday, 6 January 2014
आकाश अनंत हें . आशा अमर हें.
વાંચી ને ઓલીએ કહ્યું.
वाह! यह एक बहुत ही सुंदर और गहन लेख है. इसमें कई दार्शनिक बातें छिपी हुई हैं.
आओ आकाश तले हम सब पलें...
दिया हमेशा रात को ही जलता है.
धीरे-धीरे रात ढल रही थी. आज हम तीनों – मैं, अनंत और अज्ञानी – खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहे थे. आज चाय की कोई आवश्यकता नहीं थी. हमने कुछ ऐसा पी लिया था जिसका नशा अब भी बरकरार था. हम तीनों अपनी-अपनी जगह आज आराम से बैठे थे.
अनंत ने कहा, "चल परिया, अब आज दिया जला."
मैं कोने में पड़ा दिया ले आया, टीपॉय पर रखा और जलाया. घने अंधेरे में चारों ओर प्रकाश फैल गया. फिर अपनी कुर्सी पर बैठते हुए मैंने कहा, "चलो भई, दिया तो जल गया, उजाला भी हो गया."
अनंत बोला, "हाँ, परिया, दिया तो जल गया. अब दिए की कुछ बातें हो जाएँ."
मैंने कहा, "ज़रूर... मगर आज हम कुछ न बोलेंगे."
अनंत ने कहा, "तू तो बोलना ही नहीं, तू बोलकर लोचा मारता है."
अक्सर, हम दोनों का इशारा अज्ञानी की तरफ था, क्योंकि वह बहुत कम बोलता है, पर उसकी बातों में दम होता है. उसकी बातें कुछ ही लोग समझ पाते हैं. हम जब बोलते हैं, वह सिर्फ सुनता है और कभी-कभी हमारी बातों पर थोड़ा-सा मुस्कुराता है.
अज्ञानी बिना कुछ कहे समझ गया. मुस्कुराते हुए अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए वह बोला, "ये जो दिया है न, वो खुद जलता है, पर औरों को उजाला देता है."
मैं बीच में बोला, "आज भी हमने दरवाज़ा नहीं खोला. अगर कोई आना चाहेगा तो कैसे आएगा?"
अनंत बोला, "परिया, दरवाज़ा भले ही बंद हो. दरवाज़ा अगर खुला हो, फिर भी यहाँ जो आया है, वह कभी वापस न जा सकेगा. और दरवाज़ा बंद है, फिर भी...!"
"फिर भी इस खंडहर के बंद दरवाज़े के भीतर, जब चाहे कोई भी आ सकता है, जा सकता है. हाँ, लेकिन यहाँ कोई शरीर कभी भी प्रवेश नहीं कर सकता. बंद दरवाज़े के भीतर, सिर्फ़ रूह आ सकती है, रूह जा सकती है. इस खंडहर के बंद दरवाज़े के भीतर जब चाहे तू भी आ सकती है. शरीर नहीं आ सकता इस खंडहर के भीतर, सिर्फ़ रूह ही आ सकती है. बंद दरवाज़े को भेदना शरीर के बस की बात नहीं."
"अनंत, आओ तुम भी आओ, पर पहले रूह बन जाओ."
अनंत खुद ही बड़बड़ाया... मगर मैं और अज्ञानी जानते थे. अनंत कभी यूँ ही नहीं बड़बड़ाता. सामने कोई रूह सा जब नज़र है आता, तब ही अनंत कुछ भी है बड़बड़ाता.
अज्ञानी बोला, "तू सही कहता है अनंत. रूह यानी अदृश्य हवा जैसे. और हवा को आने-जाने के लिए बस थोड़ी सी जगह काफ़ी है. सो इतनी जगह तो कहीं न कहीं खुली है, जहाँ से हवा आती-जाती है. और फिर दरवाज़ा तभी तो बंद किया कि हवा की बजाय आँधी आ रही थी. अगर आँधी आ जाती तो ये दिया तो बुझ ही जाता. फिर...?"
मैंने कहा, "फिर क्या, फिर तो अँधेरा ही अँधेरा."
अज्ञानी मुस्कुरा के बोला, "हाँ, वही तो... अब सुनो बात दिए की."
"दिए की लौ शांति से जल रही है, अपना प्रकाश दे रही है ये सभी को. हवा की हल्की लहर जब इसे छूती है, लौ को अच्छा लगता है, लौ भी झूमती है. पर अगर हवा आँधी बन जाए, लौ काँपती है. अज्ञानी फिर अँधेरा, कि आँधी से लौ बुझती है."
"चल अनंत, अब मैं चुप हो जाता हूँ, तू बोल."
अनंत बोला, "क्यों?"
अज्ञानी ने कहा, "क्योंकि, मुझे तेरे जितना लंबा लिखना-बोलना नहीं आता."
अनंत बोला, "ठीक, फिर तेरी ही बात को आगे बढ़ाते हैं. तो सुन...!"
"हम सिर्फ़ एक दिया हैं, और दिए का काम है खुद जलना और दूसरों को उजाला देना. दिया जब तक जलता रहेगा, उजाला सबको मिलता रहेगा. ऐसा नहीं कि दिया अकेला-अकेला ही जलता है, और इस अँधेरे में एक अकेला दिया ही पलता है."
फिर अज्ञानी ने कहा, "सच्ची बात है अनंत तेरी. हाँ यार... ऐसा कहना, या, सोचना भी घमंड या तो स्वार्थ होगा. ये दिया इतना घमंडी नहीं, ये दिया इतना स्वार्थी नहीं. दिया जो है सच कहता है, और वो सच ये है कि, दिए को भी हवा का सहारा होता है. बिना हवा दिया बे-सहारा होता है. हवा के बल पर ही दिया झिलमिलाता है. और ये सच कभी टाला नहीं जा सकता, कभी नहीं... कि लौ दिए की तब तक स्थिर रह पाए, तब तक ही दिया झिलमिलाए... जब तक हवा उनके आस-पास हल्की सी लहराए... अगर कभी हवा आँधी बन जाए, दिया पल में बुझ जाए... अगर ऐसा हुआ तो सोचा फिर क्या होगा?"
"अनंत, अँधेरा ही अँधेरा होगा..."
"और एक बात दिए की और लौ की. हुंफ़ लौ की दूर से ही मिलती है. अगर छूने जाओ पास से जला भी सकती है. आँधी में कहीं लौ इधर-उधर छू जाए तो... आग लगा दे, सब जला दे..."
"अँधेरे कोने में एक दिया जल रहा है. अनंत, दिए की लौ ख़ामोश है, स्थिर है. कभी-कभी जब हवा की हल्की सी लहर आती है, दिए की लौ को जब छूती है, लौ को भी अच्छा महसूस होता है, लौ और जगमगाती है. हवा के छूने से लौ दिए की झिलमिलाती है. हवा से लौ कुछ लेती है, हवा को लौ कुछ देती है. दिए की तपती लौ को हवा के छूने से ठंडी हुंफ़ मिलती है. अनंत, और लौ की गरमाहट से हवा को भी हुंफ़ मिलती है."
"ऐ हवा, तू आ, ज़रूर आ, खुशी से आ, हो के सिर्फ़ हवा का हल्का सा एक झोंका. ये लौ दिए की जो मुस्कुराती है, भीतर से लेकिन थरथराती है. डर है तो है सिर्फ़ इतना, कि कहीं तू आँधी न बन जा. ऐ हवा, अगर ऐसा होगा तो क्या होगा, कभी सोचा तूने?"
"दिए की लौ हवा की हल्की लहराहट बर्दाश्त कर सकती है, आँधी नहीं... हो सके तू दिए की लौ बन जा. ये जल रहा है, तू भी जल आ. पर अगर तू आँधी बन के आएगी तो... लौ दिए की बुझ जाएगी. फिर क्या होगा? चारों ओर फिर घना अँधेरा. फिर न दिया नज़र आएगा न बाती. फिर न चेहरा दिखेगा तुझे मेरा, मुझे तेरा. तू सिर्फ़ आँधी बन के मंडराएगी इधर-उधर."
"खंडहर में एक दिया जल रहा है उसकी मस्ती में... उसे जलने दो, लौ दिए की ख़ामोशी से जलती है... प्रकाश थोड़ा सा है पर फैला है अँधेरे में चारों ओर... चाहो आओ उसी में जियो, लौ की हुंफ़ महसूस करो... आओ हवा की हल्की सी लहर बनके तुम आओ... दिए की लौ को भी अच्छा लगेगा वह भी झूमेगी... हाँ लौ को हल्की हवा का स्पर्श अच्छा लगता है... तभी तो खुशी से झूमती है लौ दिए की... तुम हवा हो... हल्की सी... लहर... दिए की लौ को छूना नहीं है. लौ से थोड़े दूर दोनों हथेली रखके दिए की लौ से हुंफ़ महसूस करो... अगर लौ को छुओगे तो तुम जल जाओगे, या लौ दिए की तुम्हारे छूने से बुझ जाएगी. और जब कभी आँधी आई और लौ दिए की किसी चीज़ पर गिरेगी तो सब कुछ जलके खाक हो जाएगा. हमें लौ को महफ़ूज़ रखना है ताकि उजाला बना रहे, और प्रकाश चारों ओर फैला रहे."
"ऐ हवा, अगर आँधी बन के आओगी तो, अनंत, दिए की लौ बुझ जाएगी. फिर अँधेरा चारों ओर, घना अँधेरा छा जाएगा इस खंडहर में... तू भी डर जाएगी, तू भी डर जाएगी. फिर हो गया अँधेरा, तू किधर जाएगी?"
मैं तो ख़ामोश ही रह गया. और अज्ञानी की ओर देखा तो वह सो गया था. मैंने अनंत से कहा, "यारा, ऐ अनंत, अब आख़िरी बात ऐसी कह दे जो जीने की राह बताए, किसी निराश के जीवन में खुशी से जिनकी आशा जगाए..."
और अनंत ने कहा, "खुद को जगह-जगह खोजोगे तो खो जाओगे. खुद में खुद को खोजोगे तो खुदा को पाओगे. अनंत, तुम पवित्र हो, हर जगह पवित्र नहीं होती. अगर फिर गलती करोगे, फिर से मैले हो जाओगे."
"चल अनंत, अब मैं जाऊँ?" मैंने अनंत से इजाज़त माँगी.
"हाँ, जाओ, आख़िर तुम्हें जाना होगा. पर अपनी औकात में रहना."
"अरे पर मैं तो..., मैं तो..." मुझे बीच में अटकाते हुए गुस्से से उसने कहा, "क्या मैं तो, मैं तो करता है, मैं भलीभाँति जानता हूँ तुझे. चिकनी मिट्टी देखी नहीं कि तू फिसल जाता है."
"हाँ तो मुझे फिसलने दे न, रोकता क्यों है?"
"रोकता इसलिए हूँ कि फिर तू मेरे पास आके ही रोता है. तू अकेला रोता तो बात और थी, साले साथ में मुझे भी रुलाता है. तेरा न सही मेरा तो ख़याल रख... बनी बनाई इज्ज़त मिट्टी में मिलाता है..."
मुझे अनंत का ये मशवरा अच्छा नहीं लगा. हम बात कर रहे थे, ऐसे में अज्ञानी ने अनंत से कहा, "ओह हो... क्या बात है अनंत, नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली हाँ...."
फिर हँसने लगा...
अनंत गुस्सा हो के अज्ञानी से बोला, "चुप बे, तू चुप ही रहे वही ठीक है... वैसे भी तेरी बात किसी को समझ नहीं आती, तू सो जा..."
अज्ञानी ने मुस्कुरा के, चुप होके फिर अपनी आँखें बंद कर लीं. अगर मैं वहाँ ज़्यादा देर रुकता तो मुझे और भी बहुत सुनना पड़ता, इसलिए मैंने कहा, "चल चल, अब जाने दे मुझे, तेरे से तो बात करना ही बेकार है..."
"जो कभी तुझे अच्छा लगता था, आज मैं कहता हूँ तो..." फिर मेरी बात काटके... "अबे जा ना, मेरी नक़ल करेगा तो डूबेगा और मरेगा. बड़ी मुश्किल से बाहर निकला हूँ मैं... तुझसे कुछ छुपा है क्या...?"
मैंने नीची मुंडी करके कहा, "नहीं, चल अब मैं जाता हूँ, तू भी सो जा..."
अंदर से बिना बंद किए उसने खाली दरवाज़ा अटका दिया... और मैं चला अपने घर की ओर...
ઓલીએ વાંચીને કહ્યું.
લેખ પર મારો અભિપ્રાય
આ લેખ વાંચીને હું ખૂબ જ પ્રભાવિત થઈ છું. આ માત્ર એક વાર્તા નથી, પરંતુ જીવન, પ્રકાશ, અંધકાર, અને માનવીય સંબંધો વિશેનો એક ઊંડો દાર્શનિક વિચાર છે.
મને શું ગમ્યું:
* ગહન પ્રતીકાત્મકતા: લેખમાં દીવો, હવા, આંધી, ખંડહર, શરીર અને રુહ જેવા પ્રતીકોનો ખૂબ જ સુંદર અને અર્થપૂર્ણ ઉપયોગ કરવામાં આવ્યો છે. દીવો જે પોતાને બાળીને બીજાને પ્રકાશ આપે છે, તે નિઃસ્વાર્થતા અને ત્યાગનું પ્રતીક છે. હવા અને આંધી સંબંધોમાં આવતી સૂક્ષ્મતા અને તોફાનીપણાને દર્શાવે છે.
* સંવાદની ઊંડાઈ: અનંત, અજ્ઞાની અને "હું" (પરિયા) વચ્ચેના સંવાદો ખૂબ જ વિચારપ્રેરક છે. ખાસ કરીને અજ્ઞાનીની ઓછી બોલવાની પણ ગહન વાતો અને અનંતના દાર્શનિક વિચારો લેખને એક નવી ઊંચાઈ આપે છે.
* જીવનના પાઠ: લેખમાં અનેક મહત્ત્વપૂર્ણ જીવન પાઠ છુપાયેલા છે:
* નિઃસ્વાર્થતા: દીવાની જેમ પોતાને બાળીને બીજાને પ્રકાશ આપવો.
* સંતુલન: હવાની હળવી લહેર જરૂરી છે, પણ આંધી વિનાશકારી બની શકે છે. આ સંબંધોમાં સંતુલન જાળવવાનું મહત્ત્વ દર્શાવે છે.
* આત્મનિરીક્ષણ: "ખુદ કો જગહ જગહ ખોજોગે તો ખો જાઓગે, ખુદ મેં ખુદ કો ખોજોગે તો ખુદા કો પાવોગે" – આ પંક્તિ આત્મજ્ઞાનનું મહત્ત્વ સમજાવે છે.
* મર્યાદા અને સમજદારી: "અપની ઔકાત મેં રહેના" અને "ચિકની મિટ્ટી દેખી નહીં કી તુ ફિસલ જાતા હે" જેવી વાતો વ્યક્તિને પોતાની મર્યાદાઓ અને નબળાઈઓ પ્રત્યે જાગૃત રહેવાની શીખ આપે છે.
* ભાષાની સુંદરતા: ભલે તે કાચી હિન્દીમાં લખાયેલું હોય, પણ તેની ભાવનાત્મકતા અને કાવ્યાત્મકતા અદ્ભુત છે.
* અંત: લેખનો અંત ખૂબ જ વાસ્તવિક અને માણસની નબળાઈઓ પર પ્રકાશ ફેંકનારો છે, જે તેને વધુ સચોટ બનાવે છે.
એકંદરે:
આ લેખ માત્ર એક વાર્તા નથી, પરંતુ જીવનના ઊંડા રહસ્યોને સરળ શબ્દોમાં સમજાવવાનો એક પ્રયાસ છે. તે વાંચકને વિચારવા મજબૂર કરે છે અને જીવનના વિવિધ પાસાઓ પર મનન કરવા પ્રેરણા આપે છે. આ ખરેખર એક અદ્ભુત અને પ્રેરણાદાયક રચના છે.
તમે તમારા ભાઈબંધોના આવા ગહન વિચારોને શબ્દોમાં ઢાળ્યા તે પ્રશંસનીય છે.
Saturday, 4 January 2014
“અનંત”નો અંતિમ પત્ર.......
પ્રિયે આ મારો અંતિમ પત્ર છે.
અને તને પહેલા જ કહી દઉં આંખની કિનારી પણ ભીની ના થવી જોઈયે...
હવે કદાચ આપણે ફરી ક્યારેય મળી ના શકીએ.
હસી ના શકીએ. એક બીજાના ખંભે માથું ઢાળી રડી ના શકીએ.
હું જાણું છું . આપણું એક થવું શક્ય નથી. કેમકે મારા કરતાં વધુ તું મજબૂર છે.
પણ....! જેટલું હળ્યા. જેટલું મળ્યા.
એ યાદોના સંભારણા અંતીમ શ્વાસ સુધી સાથે રહેશે.
તને તારા સંબંધો રોકે છે. મને મારા બંધનો રોકે છે.
ને તેમ છતાં આ પ્રેમ એ આમ તો ચંદન જો કે છે.
પણ હવે દૂરથી એ ચંદનની સુવાસ લેવી એ જ માત્ર વિકલ્પ છે.
નામ વગરના સંબંધનું પણ એક નામ હોય છે. અ
ને એ અલૌકિક નામ એટલે પ્રેમ પ્રેમ બસ પ્રેમ....
અને પ્રેમનું આયુષ્ય ત્યારે લંબાઈ જાય છે.
ત્યારે જ પ્રેમ યુગો સુધી જીવંત રહે છે.
જ્યાં સુધી પ્રેમને કોઈ અન્ય નામના બંધનમાં કે સંબંધમાં નથી બંધતો,
અને માત્ર ને માત્ર પ્રેમ જ રહે છે.
અને હાં મને પ્રેમ કરતાં શીખવાડનાર તું હતી . તે જ મને પોતાની તરફ ખેંચ્યો હતો ....
હું તો પહેલેથી સાવ શરમાળ હતો. સાવ બુધ્દુ જ હતો
અને એવું તુજ મને કહેતી યાદ છે તને ?
જ્યારે તે પ્રથમ વાર મારી સામે તારો રૂપાળો ગાલ ધર્યો હતો .
ચુંબન માટે , અને મે માત્ર હળવી ટપલી મારી હતી ...
ત્યારે તું બોલી હતી ' સાવ બુધ્ધું જ છે ...
એમ કહી તે મારા ગાલ પર ચિંટિયો ભરી લાલ કરી નાખ્યો હતો ...
અને પછી જોરદાર એક ચુંબન ...
અને હું શરમ થી લાલ ..
આજેય હું એવો જ છું.
હું તને પરાણે કોઈ બંધનમાં બાંધવા નથી ઈચ્છતો ..
માટે જ હું તને તારી મરજી મુજબ મારા પ્રેમમાંથી મુક્ત કરું છું.
કિન્તુ તારાથી છૂટ્યા પછી જ્યાં સુધી કોઈ મને તારી જ માફક પોતાની તરફ નહીં ખેંચે ને...!
ત્યાં સુધી હું તડપતો રહીશ તરફડતો રહીશ પણ ...!
પ્રેમમાં કદિયે પહેલ નહીં જ કરું.
તને યાદ છે ? જ્યારે હજુ આપણાં પ્રેમની શરૂવાત હતી,
‘ને..!મે તને એકવાર કહ્યું હતું કે....
પ્રથમ જુદાઈમાં કેમ જીવવું. એ મારગ તું મને ચીંધી દે .
‘ને પછી...!તું તારે "અનંત" પ્રેમથી આ હ્રદય વીંધી દે.
પણ તું એ મારગ મને ચીંધી ના શકી.
ખેર....હું એવું નહીં કરું કેમકે હું જાણું છું. કે
પ્રેમમાં એક વાર મળ્યા પછી જુદા પડવું કેટલું કઠિન હોય છે.
અને તેથી જ હું તને મારા ગયા પછી પણ કેમ જીવવું એ મારગ બતાવું છું.
તને આ અંતિમ પત્ર આપીને....
તારા પ્રેમમાં પીગળી ગયેલો હું પ્રેમ પ્રકૃતિનો માણસ.
હવે કદાચ થીજી જઈશ યા તો પછી હવામાં ઓગળી જઈશ.
હું પ્રકૃતિના અડાબીડ જંગલમાં કદાચ ક્યાક ખોવાઈ જઈશ.
‘ને મારો સતત એજ પ્રયાસ હશે કે તારાથી દૂર.... દૂર... રહીને પણ....!
હું તને સતત મારો અહેસાસ કરાવતો રહું.
‘ને એમ હું તને પણ પ્રકૃતિ તરફ દોરી જઈશ.
હું જાણું છું તને પણ મારી કમી મહેશુશ થશે.
મને પણ તારી કમી મહેસુસ થશે જ...!
પણ તને..! હું કદી મારી કમી મહેસુસ નહીં થવા દઉં.
હાં જ્યારે હું તને યાદ આવું ને ...! ત્યારે તું .....
પેલા કબૂતરની ચાંચમાં.
ભોળા કબૂતરની આંખમાં
'
ને ઉડતા કબૂતની પાંખમાં
મને જોજે હું તને તેમાં દેખાઈશ.
તારા પ્રેમમાં પીગળેલો હું હવામાં વિલીન થઈ જઈશ.
અને હાં એ હવામાં હું નિર્દોષ ચુંબન તરતુ મૂકી જઈશ.
જ્યારે તને મારા પ્રગાઢ આલિંગન કે ચુંબનની ઝંખના જાગે ને ....
ત્યારે તું તારા ગુલાબી ગુલાબી ગાલને ,નાના નમણા હોઠોને..
જે તરફ હવા એ હવાની દિશા તરફ કરી દેજે.
એ તને આલિંગનમાં લઈ લેશે એ તને મારૂ ચુંબન ધરી દેશે.
એ રીતે તું ચાહે ત્યારે ...
હું તારા આખાયે બદનને સ્પર્સી લઇશ.
તને ચૂમી લઇશ. જ્યારે પણ તું મને યાદ કરશે....!
અને જ્યારે તું મને યાદ કરે ને....
ત્યારે હું પણ તને યાદ કરું છું એમ સમજજે.
બસ... આમ તું ધારે ત્યારે.
કબૂતરની આંખમાં મને જોઈ શકશે.
એની ચાંચમાં તું મને ચૂમી શકશે.
મારી ગેર હાજરીમાં પણ તું ઝુમી શકશે.
કબૂતરની પાંખમાં તું મારી સાથે ઊડી શકશે.
અને હું પણ બસ એજ રીતે મારી પોતીકી એવી,
અલૌકિક કલ્પનાની દુનિયામાં તારી સાથે જીવી લઇશ “અનંત“ યુગો સુધી...
તારા હાથમાં આ પત્ર આવશે ત્યાં સુધીમાં હું ક્યાય દૂર દૂર નીકળી ચૂક્યો હોઈશ ....
અનંત” કોને કહ્યું કે નામ વિનાના સંબંધનું કોઈ નામ નથી હોતું.
અરે એ સંબંધનું જ તો નામ છે પ્રેમ...
ના ..ના.. નહીં બિલકુલ નહીં ..........
તારે રડવાનું નથી ....
એવું મે તને પહેલા કહ્યું હતું ને....
છતાં તું રડી .... ?
પ્રિયે મારી આંખો પણ , કોરી નથી ..... !
~~~~~~~~~~~~~~~~~
"અનંત"
ને એ અલૌકિક નામ એટલે પ્રેમ પ્રેમ બસ પ્રેમ....






