जब कभी भी मेरे सामने कुछ अजीब से सवाल उठते है ..
तब जाके हम उन्हें अनंत के फटे पुराने कागजो में ढूंढते ते है ...
ऐसा ही कुछ हसीं सवाल आज फिर उठा !
और जवाब मेने उन पुराने कागजो मेसे ढूंढा ..!
जवाब तो मिल ही गया लेकिन उसे पढ़ते ही मुझे उस वक्त की ...
बर्षो पुरानी वो रात याद आ गई ...
जब कभी हम तीनो खंडर जेसे महोल्ले में मिलते थे ..
और हमारी महेफिल सजती थी ...
बर्षो पुरानी वो रात याद आ गई ...
जब कभी हम तीनो खंडर जेसे महोल्ले में मिलते थे ..
और हमारी महेफिल सजती थी ...
वो पूरी घटना अचानक मुझे याद आ गई ...
और मेरी आँखों के सामने वो पूरी घटना छा गई ...
और मेरी आँखों के सामने वो पूरी घटना छा गई ...
हुवा यु , की उस रात भी हम हमेशा की तरह आधी रात को मिले .
मेने चाय की तिन पियाली भरी चाय भरके में अपनी खाली खुर्शी पर बेठ गया ....
सबने अपनी अपनी पियाली उठाई ...
और पहेली चुसकी सुर्ररर .. करके जोरसे लगाईं ..
और फिर....
मेने चाय की तिन पियाली भरी चाय भरके में अपनी खाली खुर्शी पर बेठ गया ....
सबने अपनी अपनी पियाली उठाई ...
और पहेली चुसकी सुर्ररर .. करके जोरसे लगाईं ..
और फिर....
चाय पीते पीते मेने अनंत से पूछा !
अनंत एक बात ,एक सवाल , पुछु ?
उसने चाय का घूंट भरते हुवे कहा पूछो यार पूछो ..!
हम तो यहाँ जैसे जवाब देने के लिए ही बैठे हे !
वो कुछ इस तरहा से बोला जेसे उसे मेरा हर वक्त का सवाल पूछना अच्छा ना लगा हो ..
मेने कहा यार जवाब नै देना हे तो ना दे ! लेकिन जवाब तो ठीक से दिया कर..!
बोलते बोलते में क्या बोला मुझे पता तक न था ...
लेकिन उसी वक्त अज्ञानी मुश्कुराते हुवे बोला ...
लो अनंत सुनो परिया की बाते !
बातो बातो में फिर उसने जवाब मांग लिया ...!
अब एक से दूसरा सवाल पैदा हो जाए उससे पहेले एक का जवाब देदे मेरे भाई ...
फिर अनंत बोला .
ठीक हे चल बोल परिया तुजे क्या पूछना है ...!
ऐसा कहेते हुवे अनंत ने चायका जोरसे घूंट लगाया...
वैसे मुझे उसे पूछने में डर सा लग रहा था कही कुछ गलत फेमि ना हो जाए ...
सवाल ही कुछ ऐसा था !
फिरभी मेने बहोत सोचके धीरेसे पूछा ,
अनंत मुझे ये बता की देर रात के बाद तो हम तीनो रोज मिलते हे ...
हां तो क्या अब के बाद नहीं मिलना ... !
थक गया क्या हमारे साथ रात भर जाग जाग कर ...?
अनंत पूरी बात सुने बिना ही गुस्सा हो गया ...
मेने कहा .
अरे यार क्या बोले जा रहा हे बिना पूरी बात सुने ,
नहीं पूछना मुझे अब कुछ तुजे , मै भी गुस्सा हो गया ...
तब जाके अज्ञानी अपनी दाढ़ी खुजाते हुवे मेरे सामने देखते हुवे बोला ...
परिया तू इनकी बातो का बुरा ना मान इसे तो आदत हे पूरा सुने समजे बिना-
किसी भी बातको दिलसे लगा लेने की और फिर अनाप सनाप बोलनेकी .
तू जो पूछना चाहता है पूछ ले ! मौका और मौसम दोनों अच्छा है पूछ ही ले परिया ...
मु फिराए बेठे अनंत से पूछ ने से पहेले मेने पूछा अनंत पुछु ?
वो बिना मेरे सामने देखे बोला पूछ ना यार ..! जो पूछना है ! इतना लंबा क्यों खींचता है..!
अरे ... में लंबा खीचा या तू खिंचवाया ! तुही तो ...
मेरा और अनंत का कही झगडा ना हो जाए ये सोचके ,
में आगे कुछ बोलू उससे पहेले ,
अज्ञानी ने मुझे कंधेसे हिलाके चुप होनेका इशारा किया ...
में चुप हो गया ...
थोड़ी देर तक सन्नाटा छा गया ...
फिर अपने आप अनंत ठिकाने आ गया ...
थोड़ी देर पहेले गुस्साया हुवे अनंत ने -
ऐसे पूछा जैसे कुछ हवा ही ना हो !
थोड़ी देर पहेले गुस्साया हुवे अनंत ने -
ऐसे पूछा जैसे कुछ हवा ही ना हो !
और मुझे कहा परिया तू कुछ पूछ रहा था ...
मनही मन गुस्स्से को दबाकार मेने कहा .
हां में कुछ पूछना चाहता था और अभी भी पूछना चाहता हु !
अरे तो फिर पूछ ले ना मेरे भाई .... इतना सोचता क्यों है .!
उसकी ऐसी बाते सुनके हमें ऐसा लगा जेसे हम ही गुनाहगार हो पहेले से .
मुझे गुस्सा तो इतना आया , जी चाहा उसे खिंचके एक झापट लगा दू.
लेकिन अज्ञानी ,जेसे मेरे मनके खयालात समज गया हो ...
उसने फिर मुश्कुरा कर मुझे आँखों आँखों में समजा दिया भई मोका ना गवा ...
वर्ना सुबह हो जायेगी और सवाल छुट जाएगा ...
क्या पूछना था ये तू भी !भूल जाएगा ..
और अनंतका जवाब भी घूम जाएगा ...
क्या पूछना था ये तू भी !भूल जाएगा ..
और अनंतका जवाब भी घूम जाएगा ...
अज्ञानी का इशारा समज ते हुवे मेने फिर अपने मनको काबुमे करके अनंत से पूछा ...
यार अनंत एक बात पुछु ...
में ऐसा बोलने वाला था की ,
मुझे याद आ गया की अब फिर पूछ के पुछुगा तो फिर वही कहानी होगी .
इसलिए सीधा ही पूछ डाला .
मेने अनंत से पूछा ,अनंत रोज देर रातको तो हम तीनो मिलते ही है ...
हां तो ! फिर उसका सुर थोडा सा बदला ...
में ने उस पर ध्यान नहीं दिया और सवाल आगे बढ़ाया ..
हां तो ! फिर उसका सुर थोडा सा बदला ...
में ने उस पर ध्यान नहीं दिया और सवाल आगे बढ़ाया ..
और पूछा !
कभी कोई तुजे यहाँ दिनमे भी मिलने आता है.. क्या ..?
थोड़ी देर के लिए खामोशी छा गई ...
फिर उसने सोचते हुवे पानीका गिलास उठाया , उनमेसे एक घूंट पानी पिया...
और फिर वो बोला ...
हां सुन परिया ...
रोज रोज कई लोग यहाँ आते हे जाते है ...
कोई ना कोई रोज रोज मेरे दर -ओ - दीवार पर दस्तक दे जाते है...
लेकिन ...
फिर थोड़ी देर सन्नाटा ... खामोशी...
वो आगे क्या बोलेगा ,क्या कहेगा ये सुनने को ,
मेरे और अग्यानि के कान बेकरार होने लगे ...
मुजसे रहा ना गया मेने पूछा लेकिन क्या अनंत ?
फिर कुछ सोचके उसने गिलास उठाया उनमे से एक घुट पानी पिया ....
फिर वो बोला ...
लेकिन....
फिर खामोश ...
फिर उसने शुरू से शुरू किया
मेरे दिलकी रहेगुजरसे रोज कई चाहने वाले गुजरते है.
आते जाते मेरे दिलके दर -ओ-दीवार पे दस्तक दे जाते हे ...
लेकिन ...
भीतर वही आते है ...
"अनंत"
जिसे डूबने का डर ना हो !
और तहेरना भी ना जाने वो !
और फिर
अनंत में डूबते को बचा ना पाऊ ...
अनंत ने दो अर्थ में कुछ कहा ! लेकिन में समजना पाया ...
पर उनकी गहेरी गहेरी दरिया जेसी बात सुनके ये परिया और अज्ञानी खुशीके मारे
उछल पड़े !
उछल पड़े !
मेने और अग्यानि ने उठ कर अनंत को गले लगा लिया...
और दोनों बोल उठे मेने कहा .
में बोला जान ही डालदी दी यार तूने तो !
अज्ञानी बोला जान ही निकाल ली यारा ...
अरे क्या बकते हो तुम दोनों !
एक कहेता है जान डाल दी !
दूसरा कहेता है जान निकाल ली !
जब की मेने तो ऐसा कुछ किया कहा ही नहीं ..!
अरे क्या बकते हो तुम दोनों !
एक कहेता है जान डाल दी !
दूसरा कहेता है जान निकाल ली !
जब की मेने तो ऐसा कुछ किया कहा ही नहीं ..!
अज्ञानी बोला यार अनंत....
तू किसीको जिन्दा मार डालेगा ...
महोब्बत के खड्डे मे जिन्दा गाड डालेगा ...
अनंत शरमाकर बोला क्या यार तुम भी !
मरा हुवा क्या मारेगा किसीको ...
प्यार के खड्डे में गडा हुवा क्या गाडेका किसीको ...
अब छोड़ो भी ...
थोड़ी देर के लिए जैसे महेफिल सज गई ,जम गई ...
फिर हम तीनो अपनी अपनी खुर्शी पर बैठ गए ...
फिर मेने अनंत से पूछा ...
यार तूने तो कम्माल कर दिया जवाब ऐसे दिया की अच्छा खासा शेर बन गया ...
पर अंत में तूने ये क्यों कहा की ,
में डूबते को बचा ना पाऊ ...
अनंत मुश्कुराते हुवे बोला
क्या यार परिया में खुद डूबा हु इश्क में ...
और मुझे तहेरना भी नहीं आता ...
जब कभी में इश्क में डूबता हु तैरना ही भूल जाता हु .!
जब कभी में इश्क में डूबता हु तैरना ही भूल जाता हु .!
हम तीनो जोर जोर से हस पड़े ....
फिर अंतने और एक सवाल मेने अनंत से पूछा क्या अनंत हमेशा ऐसा होता है ... ?
अनंत ने कहा केसा ...
मेने कहा . ऐसा की जो आये वो डूब ही जाए ...
अनंत के चहेरेकी रेखा थोड़ी बदल सी गई ...
आवाज भारी हो गई.. अनंत ने जवाब दिया
अनंत के चहेरेकी रेखा थोड़ी बदल सी गई ...
आवाज भारी हो गई.. अनंत ने जवाब दिया
नहीं तो !
कुछ ऐसी भी मछलिया आती हे, जो डूबती है, तैरती है और निकल जाती है ....
कुछ ऐसी भी मछलिया आती हे, जो डूबती है, तैरती है और निकल जाती है ....
समुन्दर को रोता हुवा छोड़ कर ....
ये दरिया युही खारा नहीं हे परिया ...
ये समुन्दर युही खारा नहीं हे ,,!
ये दरिया युही खारा नहीं हे परिया ...
ये समुन्दर युही खारा नहीं हे ,,!
"अनंत" के जबाब के साथ जुडी हुई और कहानी फिर कभी ...
वोजो मेने उनके कागज़ को ढूंढा उसमे जो उसने फिर लिखा था ...
वो ये रहा .
मेरे दिलकी रहेगुजर से रोज कई चाहने वाले गुजर जाते है .
और मेरे दिलके दर-ओ दीवार पर दस्तक भी दे जाते है
मेरे दिलकी रहेगुजर से रोज कई चाहने वाले गुजर जाते है .
और मेरे दिलके दर-ओ दीवार पर दस्तक भी दे जाते है
लेकिन ...
भीतर वो ही आ पाते हे ..
जिसे डूबने का डर ना हो ...
और तहेरना भी ना जाने वो ...
और फिर में चाहू !
चाहु तो भी उसे बचा ना पाऊ ...
क्योकि ..
में जब इश्के गहेराई में डूबता हु
"अनंत" तैरना भूल जाता हु ...
भीतर वो ही आ पाते हे ..
जिसे डूबने का डर ना हो ...
और तहेरना भी ना जाने वो ...
और फिर में चाहू !
चाहु तो भी उसे बचा ना पाऊ ...
क्योकि ..
में जब इश्के गहेराई में डूबता हु
"अनंत" तैरना भूल जाता हु ...
मेरे दरो-ओ-दीवार पर वही दस्तक दे ..!
"अनंत"
जिसे डूबने का डर ना हो !
और वो तहेरना भी ना जाने ...
और फिर में
"अनंत " डूबते को बचा ना पाऊ ...
"अनंत"
एक ही शेर कई बार, बार बार , वो तब तलक लिखता रहेता था !
जब तक की उस शेर में जान ना आये ...
वो शेर कैसा ! जो किसी की आह, या ,जा ,ना ,निकाल पाए ..
बस इस लिए ही मुझे जो जो मिला...
मेने उनकी याद में यहाँ रख दिया ...
उन्ही के लिखे कुछ -
"अनंत"
एक ही शेर कई बार, बार बार , वो तब तलक लिखता रहेता था !
जब तक की उस शेर में जान ना आये ...
वो शेर कैसा ! जो किसी की आह, या ,जा ,ना ,निकाल पाए ..
बस इस लिए ही मुझे जो जो मिला...
मेने उनकी याद में यहाँ रख दिया ...
उन्ही के लिखे कुछ -
ब्लास्ट :-
दिखते हे , छिपते हे !
कभी पुरे के पुरे ..कभी आधे अधूरे , और कभी आधे से भी कम
और कभी गुम .!
क्या समजी तुम ..!
वो छिपे तो अँधेरा ..
वो निकले तो उजाला ....
ऐसा ही कुछ उसका चहेरा ....
"अनंत"
कुछ लोग चाँद के जेसे होते है ...!
और चाँद में दाग भी तो होता है...!
"अनंत"
छोटा सा ब्लास्ट :-
कुछ लोग रात को जिल मिलाते है .
आशमा के सीतारो की तरहा ...
और "अनंत" कुछ दिनमे खिल जाते है ..
बागोमे बहारो की तरहा...
"अनंत"



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