कर्मात्मा ही परमात्मा !
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વર્ષો પહેલાં મધરાતે ખંડેરના એકાંતમાં...
અમે ત્રણેય આત્મ સખાઓ
આત્મ ગોષ્ઠી કરતા હતા ત્યારે...
બંને ભાઈબંધો ના આતમથી...
જાણેઅજાણે,
નીકળી હતી આ આતમ વાણી...
कर्म ही कु बुध्धी सुजावे।
कर्म से ही आवै सद बुध्धी।
"अनंत" कर्म से ही हो शके।
"अज्ञानी" आत्मा की शुध्धी।
अच्छे बुरे कर्म से अच्छे बुरे कर्म बढै।
और अच्छे भले कर्म से ही कर्म कटै।
"अज्ञानी" कर्म से होता है मन मेला
या होता मन मैला कर्म से।
कीये है अगर कुछ बुरे करम तो,
स्वीकार ले।
ना छुप ना छुपा शर्म से।
भोगत ले कर्म गर्व से।
कर्म ही कु बुध्धी सुजावे।
कर्म से ही आवै सद बुध्धी।
"अनंत" कर्म से ही हो शके।
"अज्ञानी" आत्मा की शुध्धी।
"अज्ञानी"
*બ્લાસ્ટ*
कर्म हमसे तुमसे ज्यादा
शक्तिशाली होता है।
अच्छे बुरे कर्म हम खुद ही पैदा करता है।
और इसलिए वो हमारे पीछे पीछे या फिर हमारे साथ साथ ही चलता हे।
कर्म रहेता है एसे पास।
जैसे हमारी सांस।
अच्छा करम साथ चले तो
अच्छा लगता है।
बुरे करम साथ चले तो
बहोत बुरा लगता हे।
कर के करम बुरे बाद मे उनसे
छुटकारा पाने कि कोशिश करते है।
लेकिन ये तो अपने ही करम है।
और ये जो करम है
ये तो हमने ही पैदा कीये है।
सो, ऐसे केसे दुर होंगे।? भला।?
जब बुरे करम साथ चलते है तो हम
उनसे बचने के लिए तेज चलते हैं।
लेकिन मैंने कहां ना कि,
करम बडे शक्तिशाली होते है।
तुम जीतना उनसे भागने की कोशिश करोगे उतना ही तेजी से
वो तुम्हारे पीछे दौड़ेगा।
कृष्ण को नहीं छोड़ा,
तुम्हें कैसे छोड़ेगा।
तुं जीतना तैजी से दौड़ेगा।
कर्म उतनी तेजी से दोडेगा।
दौड़ कर तुम्हारे सामने
आकर खड़ा हो जायेगा।
और तुम भाग नहीं पाओगे ।
"अज्ञानी" अपने कर्मो से तुम
कतै बच ना पाओगे।
कर्म तुम्हारा किसी भी तरह से
तुम्हें दबोच लेगा।
कर्मो ने ना कीसीको छोडा है,
ना की किसी को छोड़ेगा।
"अज्ञानी"
આટલુ કહીને અજ્ઞાનીએ
મૌન ધારણ કરી લીધું.
ઉપર જે વાત અજ્ઞાનીએ કહી
નીચે એનો જ સાર એને કહ્યો છે.
અને સાર એજ છે કે,
तु अपने कर्मो से भाग मत।
ठहेर जा।
और अपने अंदर झांक।
अपने कर्मो को देख परख।
और ये समज ले कि,
कर्म ही कु बुध्धी सुजावे।
कर्म से ही आवै सद बुध्धी।
"अनंत" कर्म से ही हो शके।
"अज्ञानी" आत्मा की शुध्धी।
अच्छे बुरे कर्म से अच्छे बुरे कर्म बढै।
और अच्छे भले कर्म से ही कर्म कटै।
"अज्ञानी" कर्म से होता है मन मेला
या होता मन मैला कर्म से।
कीये है अगर कुछ बुरे करम तो,
स्वीकार ले।
ना छुप ना छुपा शर्म से।
भोगत ले कर्म गर्व से।
कर्म ही कु बुध्धी सुजावे।
कर्म से ही आवै सद बुध्धी।
"अनंत" कर्म से ही हो शके।
"अज्ञानी" आत्मा की शुध्धी।
ईसलीए करो ऐसे कर्म।
जो साथ चले तो
कोई परेशानी ना हो
और ना आयै शर्म।
ऐसे कर्म करो कि
चले साथ तो हो खुद पे गर्व।
"अज्ञानी"

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