નિર્દોષ ગુનેહગાર
बरसों पहले की बात है। बात, बरसों पहले की है।
जब अनंत की चहेती एक के बाद एक उसे छोड़कर चली गई...
तब जाके बहुत परेशान होकर उसने जो महसूस किया वो लिखा...
बस..!
तब वो बेबस था..! सो उसने लिखा कि:
एक के बाद एक सब मुझे अकेला छोड़कर चली गईं.....
पहले 'दिल से' दिल जोड़ा, फिर दिल तोड़कर चली गईं...
और मैं बहुत ही तन्हा-तन्हा हो गया...
जिस मोहल्ले में रहता था...
जो कभी हँसता-खेलता था...
वो खंडहर-सा लगने लगा.....
मुझे वो खंडहर-सा लगने लगा....
और मैं रंगीन पानी, यानी कि, बेचैन होकर चैन से पीने बैठ गया...
जी हाँ.! कुछ पल मे चैन से जीने बैठ गया मैं..
मगर न जाने क्या हुआ..
पीते ही मैं और भी बेचैन हुआ...
सोचा था! पी के सब भूल जाऊँगा, लेकिन....
हाल कुछ उल्टा ही हुआ...
हुआ यूँ कि, बाद पीने के यादें वो गहेराई से और भी करीब आईं....
सारी बातें, जो कि भूल जाना चाहता था मैं, गलत तरीका था मेरा, उन सबको भुलाने का, जो मैं पीने लगा....
फिर "अनंत" मुझे महसूस हुआ तो मेरी रूह बोल उठी,
पीने से ग़म कम होती है यह मेरा भरम था ये राज खुल गया।
रूह की बात मेरी कलम ने सुनी और वो भोली भाली बोली..
कौन कहता है? कि शराब पीने से आग सीने की बुझती है?
"अनंत" मैंने पी के देखी है, आग सीने में और भी लगती है।
"अनंत" पीने के बाद सोए हुए जज़्बात फिर मचल उठते हैं।
और गहरी नींद में सोई हुई यादें पीने के बाद सुलग उठती हैं।
बरसों तक छुपाई बातें यूँ ही निकलने लगती हैं,
पता ही नहीं चलता बोले तो जबां, लिखे तो कलम और चले तो क्यूँ यूँ लड़खड़ाते हैं कदम...
फिर हाथ थामने वाला भी तो कोई नहीं मिलता..
जब पता चला, तब जाके मैंने पी के तय किया...
"अनंत" अब न पीएँगे हम कभी.....
यूँ मर-मर के न जीएँगे हम कभी.....
"अनंत"https://www.facebook.com/photo/?fbid=301011653341876&set=a.119481608161549&__tn__=%2CO*F
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