मंद, अकल
सोर्री
बंद, अकल
सोर्री
अकल, मंद
मे या तुं, तुं या मे?
तुं ये तो हो ही नहीं शकता तेरे हीशाब से,
तुं जीसका चेला है और जीसे तुं गुरु मानता है।
क्यों कि अंधी सोच अंधा दिमाग जो है तेरा ।
मेरे हीशाब से तो कुछ भी हो शकता है।
वो सच भी हो शकता है और मै जुठ भी।
होने को तो वो भी गलत हो शकता है और मै सही।
खैर ये बात मेरी तेरी या सीर्फ उनकी ही नहीं।
बात ये है की थोडा अपने दीमाग का इस्तेमाल कर के
जै सच है सीर्फ उनकी तह तक जाना।
होने को तो वो भी हो शकता है।
और ये भी हो शकता है कि,
मेरा सच जो तुजे जुठ लगता है वो सच भी हो, सच ही हो
और, तेरा, औह तेरा तो कुछ हे कहां,?
तुं या तो तेरा लबाड मन तो
एसै वैसे ऐरे गैरे कीसीकी भी बातो से प्रभावित हो जाता है।
और फिर उनके जुठ को भी सच मान कर जान लगाकर
दुसरो को भी वही सच मानने को लड पडता है।
मेरी बात और हे मे सोच समज के ही स्वीकार करता हुं।
फीर चाहे जो भी हो
मेरा सच जुठ या तेरा जुठ सच
कुछ भी..!
मै पकड कर नहीं रखता।
और ना हीं मै अकड कर रहेता हुं तेरी तरहा।
मे स्वीकार करता हुं अगर गलती से भी गलती हो मुजसे तो,
और तु जानबूझकर गलती करने पर भी मानता नहीं गलती अपनी।
होने को तो ये भी हो शकता है की। बडी मसकत करके मे जो सामने लाया वो बीलकुल गलत हो। और तुं ही सही।
चलो ये सारी बाते वक्त पर छोड देते है।
फीलहाल हमे सत्य को ढूंढना है, सो,,,
बर्षो पहेले अज्ञानी ने कहा था की,
"अज्ञानी" जुठ अटल अचल है।
और सच पल पल बदलता है।
*अज्ञानी*
*ब्लास्ट*
फिर कभी
*
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