न वो मजा हे न वो मस्ती है
न वो नशा हे, न तो खुशी है
कहने को तो सबकुछ है महेफील मे
मगर वो प्यारी सी हस्ती नही है
देख के जीसको मुर्दे जाग उठते थे
वो बहोत ही खुबसुरत बे कशी है
नही लगता उसके बगैर दील मेरा
ले चलो कोइ मुजे प्यार की बस्ती मे
की यहा भरी भरी महेफील हे 'अनंत'
मगर अब दील ये मेरा खाली खाली है
No comments:
Post a Comment