"अनंत" अकसर मैने सच बोलने की सजा पाई है।
फिर भी जूठके सहारे कोई भी रिश्ता मुझे मंजूर नहीं।
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मेरी सच्चाईका मुझे ये सिला मिलेगा अब।
रूठा रूठासा कोई मुझसे रहेने लगेगा अब।
मेरी सच बोलनेकी कोशिश हर बार नाकाम
रही,बात उडादी मेरी सच बोलना चाहा जब।
अब वो रूठके ना मिलनेकी कसम खा चुकी।
उसे जाना ही था अच्छा बहाना वो बना चुकी।
वो एक पंछी मगर शातिर बड़ा और में भोला।
में इक पेड़ जेसा भला उसे केसे रोक शकता।
चलो जोभी हुवा अच्छा हुवा मेंने अपना दामन
बचा लिया, क्या होगा आगे ये नहीं सोचता अब।
मुझे दुःख हे उसे गवानेका मगर खुशी भी हे।
में खामोस हू चुप हू मेरी आँखों में आंसू भी हे।
इन आंसूओसे मेरा रिश्ता आज कलका नहीं हे।
रिश्ता जोभी हे पुराना हे इक इस पलका नहीं हे।
“अनंत” हर बार होता आया हे बस यही साथ मेरे।
मेंरा सच बोलना कभी भी क्यों मुझे फलता नहीं हे ?
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***"अनंत"***
प्यारे चिराग "अनंत" कीये पुरानी रचना तेरे लिए...
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