जीने का तब मजा है "अनंत"
जब दोनोकी हो एक जैसी पसंद.
कुछ तेरी पसंद, कुछ मेरी पसंद.
'अनंत' मिलके बनी अपनी पसंद .
तुम जो वहा सोचती हो में वो यहाँ करता हु .
में जो यहाँ सोचता हु तुम वो वहा करती हो .
गीत तुम्हारी पसंदके यहाँ में गाता हु जब कभी .
मेरी पसंद के गीत तुम वहा गुनगुनाती हो .
तुम्हारे खयालो में हरदम में रहेता हु .
मेरे खयालो में तुम पल पल रहेती हो.
तू क्या बोलोगी ये तुम्हारे बोलनेसे पहेले में बता देता हु
मेरे सवाल पूछने से पहेले ही तुम जवाब आजकल देती हो.
"अनंत" शुरू ये सिलसिला तो उसी दिन से हुवा था ...
ये अनंत कौन हे ऐसा जब तुमने मुझे अचानक पूछा था...
वो में नहीं वो कोई और है ऐसा जो मेने उस वक्त कहा था.
आज भी में वही कहुगा की अनंत से महेरा गाहेरा याराना था .
"अनंत"
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