"मै और मेरी चेतना"
चेतना....
बीना चेतना....
कोई जीता नही...
जब जिस्म से चेतना नीकल जाती है...
जां नीकल जाती है....
सांस रुक ही जाती हे...
और रुक गई....
लेकीन फीर भी...!
मै जिन्दा हु....
ऐसा एक रात अनंत ने कहा था...
एक दिन जब अचानक मै खंडर पर गया तो,,,,
मैने देखा अनंत अकेला अकेला कुछ युही,
बडबडा रहा था...
जब मैने उसे पुछा....
अनंत मुजे आज तु ये बता...
जब कभी हम मिलते नही...
तब तु ईस महोल्ले मे....
रात के घने अंधेरे मे....
तन्हा तन्हा अकेले मे....
रात के घने अंधेरे मे....
तन्हा तन्हा अकेले मे....
क्या बडबडाता रहेता है...
तु कीस से बाते कराता है...?
तब जाके अनंत ने बताया,
जब कभी हम मिलते नही.
मे तन्हा हो जाता हु, "पर होता नही"
और तब मै, रात के अंधेरे मे,
अपनी ही चेतना से बाते कर लेता हु....
फीर वो बोला...
बर्षो पहेले एक रात मुजे ऐसा महसूस हुवा....
जैसे मुजसे कोई रुठा...
जैसे मुजसे कोई छुटा...
जैसे मुजसे कोई छुटा...
उसने हाथ नही पकडा था...
हाथ तो उसने पकडा ही नही था....
लेकीन फीर भी ऐसा लगा जैसे...
हाथो से मेरे कुछ छुटा....
ना वजै बताई ना कुछ पुछा....
ना कुछ कहा ना कुछ सुना....
ना कुछ कहा ना कुछ सुना....
मुजे पता तक नही अाज भी..!
ऐसा भी क्या कीया मैने गुनाह...?
ऐसा भी क्या कीया मैने गुनाह...?
बे वजै कुछ भी होता नही...!
वजै क्या थी मै जानता नही..!
वजै क्या थी मै जानता नही..!
लेकीन एक दिन....
वजै के साथ वो सामने आयेगी...
वजै वो खुद ही आके बतायेगी...
वजै वो खुद ही आके बतायेगी...
तु देखना...
मै और मेरी चेतना....
तन्हाई मे....
अकसर यु बाते करते है....
"अनंत"
ऐसा उसने बर्षो पहेले कहा था.....
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