ख़ैर...
वैसे भी आखीर तो मै गैर....
अब मगर...
तेरे बगैर ...
बहोत कुछ !
और कुछ भी नहीं !
सुख मिलता है दू:ख मिलाता है .
“अनंत” और भी बहोत कुछ मिलता है.
इन्सान जब महोब्बत करता है.
बहोत खुश होता हे ...
वो नहीं होती जब बहोत दू:ख होता है ...
उनके होते वो बहोत कुछ वो खुद होता हे ...
वो नहीं होती यो जैसे ना वो कुछ होता हे...
फिर कहे बिन रहा नहीं जाता ..
जब तू मेरे सामने होती हे तब !
कुछ ना होते हुवे भी बहोत कुछ होता हे पास मेरे ...
और जब तू दूर जाती है तब !
बहोत कुछ होते हुवे भी कुछ भी नहीं होता पास मेरे
"अनंत" कुछ अजीब सा खालीपन महेसुस होता है ...
तू सामने होती है तो जैसे दिल मेरा महेफुझ होता है ...
"अनंत"

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